तुम्हारे प्रेम के नाम-३

03 मई 2020   |  विजय कुमार तिवारी   (295 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी

तुम्हारे प्रेम के नाम-3

विजय कुमार तिवारी

तुमने अनेकों बार कुरेदा है मुझे,"कैसे मैं अपने को बचाता रहा और कैसे इस मतलबी दुनिया की शातिर चालों को समझ पाया।"तुमसे खुलकर कहना चाहता हूँ,सच बयान करता हूँ कि यह कोई मुश्किल काम नहीं है।हर व्यक्ति को थोड़ा सजग रहना चाहिए।थोड़ी सावधानी,थोड़ा धैर्य हो तो कोई भी सामने वाले की मंशा समझ सकता है।हम प्रतिक्रिया देने में देर नहीं करते और उलझ जाते हैं।मजेदार बात यह है कि कोई भी पहले तीर-तलवार लेकर नहीं निकलता,वह हमारे करीब बहुत संकोच-भाव से आता है,पास बैठता है,मधुर और अच्छी बातें करता है और धीरे-धीरे अपनी मंशा जाहिर करता है।हमें भी वैसा ही करना चाहिए।उन्हें बैठायें,चाय पिलायें, उनके जीवन की बातें करें,कुछ अपनी सुनायें और उनकी बातों को पूरे ध्यान से सुने। सावधानी यही रहे कि मुश्किल को छोड़िये,सहज-साधारण मांग हो तो भी तुरन्त उतावलापन ना दिखायेंं,निर्णय लेने के लिए कुछ समय लें.थोड़ा सोच-विचार कर लें और सम्भव हो तो किसी से सलाह भी ले लें।इतना ही मैंने जीवन भर किया है।यदि कुछ उल्टा भी हुआ है तो बड़ी हानियाँ नहीं हुई हैं।

एक बात और कहना चाहता हूँ।प्रेम और वैर के भाव पहले भी थे।आज जैसी स्थिति नहीं थी।आज का प्रेम मर्यादाहीन हो गया है।तब रिश्ते बड़े जीवन्त होते थे और सम्बन्धों में लोक-लाज और मर्यादा का पूरा निर्वाह होता था।बाग-बगीचों में फलों के मौसम में और फसल तैयार होने पर खेत-खलिहानों में समवयस्क जवान लड़के -लड़कियाँ बेर-कुबेर बेधड़क,बिना किसी भय के जाते थे और काम करते थे।मिलना-जुलना होता था,सहयोग-सहकार होता था परन्तु लड़के भाई होते थे और लड़कियाँ बहनें।इसके अलावा दूसरे किसी रिश्ते की कोई सोच नहीं थी।मर्यादित प्रेम की भावना से पूरा गाँव बँधा रहता था।

कभी-कभी मर्यादायें टूटती भी थीं और बड़ी विभत्स स्थिति पैदा होती थी।तब मैं समझदार नहीं था या उन सम्बन्धों की गहराई नहीं समझ पाता था।एक दिन गाँव में पुलिस आ गयी और बरगद के पेड़ के नीचे उनका दरबार लगा।देखने में सीधे-सादे लड़के को पकड़ा गया जिससे मेरी भी दोस्ती थी।हालांकि वह मुझसे उम्र में बड़ा था परन्तु हम साथ ही,एक ही कक्षा में पढ़ते थे।मेरी समझ में नहीं आया कि उसने कौन सा अपराध किया है।गेहूँ के फसल की कटाई हो रही थी।बहुत से मजदूर लगे थे।उसने किसी जवान मजदूरनी के साथ कोई शरारत की।मामला रफा-दफा किया गया।मेरी समझ में नहीं आया कि उसने ऐसा क्या किया कि लोग हंस भी रहे थे और उसे दण्ड भी देना चाहते थे।

ऐसे ही एक सुबह गाँव की एक बहन की मर्यादा टूटने से बच गयी।आम पकने लगे थे और लोग अपने-अपने बगीचों में दिन भर जमे रहते थे।समस्या रात की थी।कुछ हिम्मती लोग रात में ही बहुतों के पेड़ों के आम चुन ले जाते थे।लड़के-लड़कियाँ भोर-भोर में,कभी-कभी रात अंधेरे अपने बगीचों में पहुँच जाते थे और आमों की रखवाली करते।ऐसे ही किसी रात मैं भी अपने बगीचे में पहुँच गया।रास्ते में कोई नहीं मिला।मुझे खुशी हुई कि आज बहुत पहले पहुँचा हूँ।मैंने गमछा बिछाया और पसर गया।आँखों पर नींद की खुमारी छाने लगी थी।

तभी अचानक बगल वाले बगीचे के मालिक की जवान लड़की भागती हुई आयी।वह डरी हुई थी,हांफ रही थी और अपने बगीचे की ओर दिखाकर बोली,"कोई मुझे पकड़ना चाहता है।"मेरी नींद उड़ गयी,मैंने अपना डंडा सम्भाला,उठ खड़ा हुआ,"कौन है,किधर है?"हम उसके बगीचे में गये,चारो तरफ ध्यान से देखा,खोजा,कोई नहीं मिला।वह भी मेरे साथ लौट आयी।अभी भी डरी हुई थी।थोड़ी सामान्य हुई,बोली,"पहचान नहीं पायी।उसने मुझे पकड़ ही लिया था अपनी बाँहों में।"वह शरमा गयी।उत्तर-पूर्व के कोने में उगते सूर्य की लाली से भोर का उजास फैलने में अभी देर थी।मैंने उस बहन को देखा,उसका सम्पूर्ण चेहरा क्रोध एवम् भय से रक्ताभ हो उठा था।मैंने कहा,"अभी भोर होने में देर है,थोड़ा आराम कर लो।निःसंकोच वह लेट गयी।

अक्सर तुम पूछा करती थी।अब तुम्हें,तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर मिल गये होंगे।आज मैं ऐसी परिस्थितियों को याद करता हूँ तो खुशी होती है।कम से कम ऐसा तो था कि कोई बहन भरोसा कर सकती थी।उन दिनों में मेरी मनोदशा कैसी रहती थी,बताऊँ तो तुम विश्वास नहीं करोगी।मैंने कहीं पढ़ा था कि अबोध बच्चा बहुत दिनों तक अपने पूर्व-जन्म की स्मृतियों में खोया रहता है।निश्चित तौर पर तो नहीं कह सकता परन्तु इतना तो सत्य है कि मेरी रुझान साधु-सन्तों के प्रति आदर-भाव की ओर था।इतनी कोशिश जरुर रहती थी कि कोई मुझे बुरा न समझे और कभी भी कोई मेरी शिकायत लेकर पिता के पास न जाये।एक अच्छा इंसान बने रहने और दिखने की सजगता ने मुझे बहुत सी शरारतों से बचाया है।कोई मेरे गुणों की चर्चा करता तो बहुत अच्छा लगता था।इसका सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह हुआ कि किसी ने मुझे तिरस्कार की दृष्टि से नहीं देखा,सबने स्नेह और प्रेम किया।

तुम पूछा करती थी ना कि असली सौन्दर्य कहाँ होता है?शायद मैं भी उस असली सौन्दर्य से अपरिचित रह गया होता यदि जीवन के इस मोड़ पर गाँव नहीं आया होता।नित्य ही भोर में जागकर झुरमुटों के पीछे से सूर्य को उगते देखना और सन्ध्या में पश्चिमी छोर पर डूबते देखना विचित्र अनुभूतियों से भर देता है।मैंने पहली बार महसूस किया कि हम भी उसी तरह विराट् हैं जैसे यह आसमान,धरती और सारा ब्रह्माण्ड।प्रकृति की एक-लय गतिशीलता,जीव,वनस्पति,धरती,आकाश का एक-दूसरे से गहरे तौर पर जुड़ा होना और सबके भीतर की आत्मा का उस परम चेतना से अटूट सम्बन्ध मेरे हृदय को जागृत करता रहता है।पुष्ट और बड़े-बड़े थनों वाली गाय-भैंसें,खेतों की हरियाली,चिड़ियों का सुबह-शाम मधुर गायन और इतराती-इठलाती बहुओं की गोद में खेलते,मचलते नन्हें-नन्हें बच्चे,यदि किसी को इनमें सौन्दर्य नहीं दिखता तो मैं मानता हूँ कि उनमें सौन्दर्य-चेतना विकसित ही नहीं हुई है।ऐसे लोग परमात्मा द्वारा प्रदत्त नैसर्गिक सौन्दर्य को छोड़कर आज के बनावटी संसार में रस खोजते हैं।सच्चे प्रेम की तिरछी चितवन छोड़कर भोड़े शृंगार में सुख-शान्ति की तलाश करते हैं।

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