कोख का अधिकार

08 मई 2020   |  शिल्पा रोंघे   (389 बार पढ़ा जा चुका है)

कोख का अधिकार

संगीता के विवाह को 6 साल हो चुके थे उसकी 4 साल की एक बेटी थी, वो फिर एक बार मां बनने वाली थी।

उसने ये खबर सबसे पहले अपने पति को सुनाई फिर अपनी सास को, जैसे ही उसकी सास ने ये खबर फोन पर सुनी वो बेहद ख़ुश हुई, संगीता गर्मियों की छुट्टियों में अपनी बेटी को लेकर अपने मायके जबलपुर आई हुई थी। उसके पति सतना की एक बैंक में मैनेजर थे। उसके परिवार वाले भी इस ख़बर से बेहद ख़ुश थे। फ़ोन पर अचानक बात करते-करते उसकी सास उसे ससुराल जल्द से जल्द आने के लिए दबाव बनाने लगी, तब संगीता ने कहा ऐसी भी क्या जल्दी तब उसकी सास ने कहा कि ख़ुश तो मैं भी हूं बेटा लेकिन तेरी पहले से ही एक बेटी है और अब ज़माना बदल चुका कोई दो से ज्यादा बच्चे रखता भी नहीं अब, बस मुझे चिंता हो रही है कि अगर फिर से बेटी हो गई तो कुल को कौन आगे बढ़ाएगा, बेटियां तो होती ही पराया धन है चलो मेरे साथ हम डॉक्टर के पास जाकर ये पता लगा लेंगे की तुम्हें लड़का होगा या लड़की, अगर लड़की हुई तो बात आगे बढ़ाना ही क्यों?

संगीता अपनी सास के इरादें भांप चुकी थी कि वो क्या करना चाहती है शायद वो उसके बच्चे को दुनिया में आने ही ना देगी अगर वो लड़की हुई तो। उसने अपने पति को फोन लगाया तो उसने भी बात टाल दी और इस मामले पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया।

संगीता हैरान थी जिस व्यक्ति ने सात जनम तक सुख दुख में उसका साथ निभाने का वादा किया था वो आज इस तरह से चुप्पी साधे बैठा है।

संगीता ने ये बात अपने माता पिता को बताई तो उन्होंने भी उसे समझाया कि ससुराल वालों की बात मानने में ही भलाई है।

उसके पिता कहने लगे इतनी लंबी उम्र तुम कैसे अकेले काटोगी वो भी दो दो बच्चों के साथ, तुम्हारे लिए ठीक यही रहेगा कि तुम अपने ससुराल लौट जाओ

संगीता अपने ससुराल में एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ा रही थी, तो आत्मनिर्भर और शिक्षित थी। उसने सोचा बच्चे उसके पति के भी तो है कानूनी रुप से वो भी तो उसके भरण पोषण के लिए जिम्मेदार हुआ। क्या हुआ अगर वो उसके साथ नहीं रह सकती लेकिन अपने जिंदगी के निर्णय तो खुद ले सकती है।

तब संगीता ने अपने पिता को फ़ैसला सुना दिया को अपने ससुराल से अलग रहकर अपने बच्चों का पालन पोषण करेगी।

उसके माता पिता फिर उसे समझाने लगे लेकिन वो नहीं मानी, घर में नवरात्री के वक्त कन्याभोजन चल रहा था, ऐसे में उसने कहा कि ये पूजा पाठ तभी सफल माना जाएगा जब समाज सिर्फ देवी पूजन करने के साथ महिलाओं को सम्मान देना शुरु करे और पुरूषों के बराबरी में दर्जा देना शुरु करे

उसकी दृढ़संकल्प के आगे सबको हार माननी पड़ी, संगीता ने अकेले ही ससुराल से अलग रहकर अपनी बेटियों का पालन पोषण किया और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। जिस संगीता को समाज के लोग ताने मारा करते थे वो ही अब उसकी मिसाल देने लगे। सचमुच उसे अपने कोख के अधिकार को पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

शिल्पा रोंघे


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