लक्ष्मण चरित्र भाग- ३१ :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

15 मई 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (242 बार पढ़ा जा चुका है)

 लक्ष्मण चरित्र भाग- ३१ :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🐍🏹 *लक्ष्मण* 🏹🐍


🌹 *भाग - ३१* 🌹


🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸


*➖➖➖ गतांक से आगे ➖➖➖*



दुर्वासा के श्राप से श्रापित कबंध राक्षस का वध करके श्री राम एवं *लक्ष्मण जी* मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे जहां परम भक्ता शबरी जी श्री राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थी | शबरी माता भक्ति , प्रेम एवं त्याग की अद्भुत उदाहरण थीं | जब उनके गुरु मतंग जी परम धाम जाने लगे थे तब वे शबरी से कह कर गए थे कि एक दिन नारायण अवतार श्री राम तुम्हें दर्शन देने यहां स्वयं चलकर आएंगे | तब से लेकर आज तक शबरी नित्य भगवान श्रीराम की प्रतीक्षा में दिन रात व्यतीत कर रही थी | आज भगवान श्री राम स्वयं मुनियों से शबरी के आश्रम का पता पूछते हुए वहां जा रहे हैं | *भगवत्प्रेमी सज्जनों !* विचार कीजिए कि जिस परमात्मा श्री राम को तपस्वी अपनी तपस्या में , योगी अपने योग में , पुजारी अपनी पूजा में , याज्ञिक अपनी यज्ञ में , कथाकार अपनी कथा में और भक्त की भक्ति में खोजता रहता है वहीं श्री राम आज अपनी परम भक्ता शबरी के आश्रम को खोज रहे हैं | कितना विचित्र संयोग है कि :----


*आगम निगम पुरान सबै ,*

*जेहि ईश के भेद को पार न पावैं !*

*शेष सुरेश महेश सबै ,*

*जिहिके दर्शन को नित ललचावैं !!*

*योगी तपस्वी यती जेहि को ,*

*ध्यावैं तबहुँ नहिं दर्शन पावैं !*

*"अर्जुन" सोइ श्रीराम स्वयं ,*

*खोजत शबरी कर आश्रम जावैं !!*


*सज्जनों !* ईश्वर की भक्ति करने वाले तो बहुत हैं , ईश्वर को खोजने वाले भी बहुत मिल जाएंगे परंतु ईश्वर स्वयं जिनको आज खोज रहा है वह है शबरी माता | भगवान स्वयं कहते हैं :---


*ये यथा मां प्रपद्यंते , तांस्तथैव भजाम्यहम् !*

*मम् वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: !!*


योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि *हे अर्जुन !* जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजता है मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूं क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं | *मित्रों !* जो निरंतर भगवान को ही खोजते रहते हैं एक दिन भगवान स्वयं उनको खोजने निकल पड़ते हैं | आज माता शबरी को खोजते हुए श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ उनके आश्रम पहुंच गये | शबरी माता ने जब देखा कि स्यामल गौर दो पुरुष उनकी कुटिया पर आये हैं तो अपने गुरु के वचनो को याद करके प्रेम से विह्वल हो गई | तुलसीदास जी लिखते हैं :----


*प्रेम मगन मुख वचन ना आवा !*

*पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा !!*

*सादर जल लै चरन पखारे !*

*पुनि सुंदर आसन बैठारे !!*


शबरी भगवान के चरणों से लिपट गई , प्रेम में मगन शबरी के मुख से कोई वचन ही नहीं निकल रहा है बार-बार श्री राम के चरणों में प्रणाम करके शबरी ने दोनों भाइयों के चरण पखारे तथा सुंदर आसन पर बैठाया | मित्रों इस संसार में यह कथानक बहुत ही प्रसिद्ध है कि शबरी ने भगवान को *जूठे बेर* खिलाए परंतु विचार कीजिए क्या कोई भक्त अपने आराध्य को अपना जूठा भोग लगा सकता है ?? यदि बाल्मीकि रामायण का दर्शन किया जाए तो वहां किसी *बेर* नामक फल का वर्णन नहीं मिलता है | बाल्मीकि जी कहते हैं :----


*मया तु विविधं वन्य संचितम् पुरुषषर्भ !*

*तवातर्थे पुरुष व्याघ्र पम्पायास्तीर सम्भवं !!*


अर्थात शबरी ने दोनों भाइयों का पुरुषश्रेष्ठ कहकर स्वागत किया और जो फल - फूल , कंदमूल वह पंपा सरोवर के पास लाई थी उससे उसने श्री राम एवं *लक्ष्मण* का आतिथ्य किया | कहने का अर्थ है कि बाल्मीकि जी ने *बेर* का वर्णन नहीं किया है , उन्होंने कंदमूल फल ही लिखा है | यदि तुलसीदास जी की रचना श्रीरामचरितमानस का अवलोकन किया जाय तो वहां भी किसी *बेर*;का वर्णन नहीं मिलता है तुलसीदास जी भी बाल्मीकि जी के पद चिन्हों का अनुसरण करते हुए लिखते हैं :---


*कंदमूल फल सुरस अति , दिए राम कहुँ आनि !*

*प्रेम सहित सब खाए , बारंबार बखानि !!*


यहां भी कोई *बेर* का वर्णन नहीं है | परंतु मैं इस बात का कदापि खंडन नहीं करता कि भक्तसमाज में *जूठे बेरों* का वर्णन ही नहीं है | इस प्रसंग को लिखने का मेरा उद्देश्य मात्र यह है कि कुछ लोग इस प्रसंग को लेकर *लक्ष्मण जी* पर आक्षेप लगाते हैं कि श्रीराम ने तो *शबरी के जूठे बेर* बड़े प्रेम से खा लिए परंतु *लक्ष्मण* ने उसे *अछूत* मानकर के उन फलों को नहीं खाया | कुछ विद्वानों का यह मत है कि *लक्ष्मण जी* ने फल *बेर* उठाए तो परंतु श्रीराम से छुपा कर उन फलों को दूर फेंक दिया और वहीं पर जाकर के संजीवनी नामक औषधि बनी जो *लक्ष्मण* की प्राणरक्षक हुई |


*भगवत्प्रेमी सज्जनों ! लक्ष्मण जी* ने शबरी के दिए फलों का सेवन नहीं किया यह तो सत्य है परंतु उसका कारण शबरी का अछूत होना कदापि नहीं था यदि *लक्ष्मण* ने शबरी के दिए हुए फलों को नहीं खाया इसमें बड़ा गूढ़ रहस्य है | विचार कीजिए कि जो *लक्ष्मण जी* श्री राम की प्रत्येक आज्ञा का पालन बिना कुछ विचार किये ही करने को तत्पर हो जाते थे उन्होंने श्री राम के कहने पर भी शबरी के फलों को क्यों नहीं खाया ? इसका कारण बहुत ही गूढ़ हैं | जिस प्रकार लंकापति रावण परम शिव भक्त था उसी प्रकार उसका बली पुत्र लंका का युवराज *मेघनाथ* भी कठोर तपस्या करके अनेकों वरदान प्राप्त कर चुका था | तपस्या में बहुत बड़ा बल होता है कहा भी गया है :---


*सृष्टि में बल तो अनेक कहे ,*

*पर तप बल कहँ कोउ पार न पावैं !*

*तप के बल सृष्टि रचइं विधिना ,*

*तप के बल ही शिव सृष्टि नशावैं !!*

*तप के बल ते श्री हरि नारायण ,*

*पालन करि यह सृष्टि चलावैं !*

*"अर्जुन" करि तप देव दनुज ,*

*मानव वरदान अनेकन्हं पावैं !!*


तपस्या के बल को समझकर *मेघनाथ* ने भी अपने जीवन की रक्षा के लिए भगवान भोलेनाथ की तपस्या करके वरदान प्राप्त किए थे | *मेघनाद* को जो वरदान प्राप्त था यद्यपि उसका संबंध *शबरी के बेरों* से नहीं है परंतु *लक्ष्मण जी* ने शबरी के आश्रम में जो किया (फलों का त्याग) उससे अवश्य था | क्योंकि *मेघनाद* ने वरदान पाया था कि उसको वही मार सकता है :-- जिसने चौदह वर्षों तक स्त्रीसंग न किया हो , निद्रा के वशीभूत न हुआ हो एवं इस अवधि में कुछ भी ना खाया हो | यह वरदान प्राप्त करके *मेघनाद* समझता था कि संसार में इतना बड़ा त्याग ना कोई कर सकता है और ना ही उसकी मृत्यु होगी | *लक्ष्मण जी* का जन्म ही *मेघनाथ* का वध करने के लिए हुआ था | *लक्ष्मण जी* उसी वरदान के अनुसार स्वयं को ढाल रहे थे इसीलिए उन्होंने फलों को नहीं खाया | *लक्ष्मण जी* भक्ति , ज्ञान एवं वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे | साक्षात शेषजी भगवान की लीलाओं में सहयोग करने की कामना से इस धरा धाम पर *लक्ष्मण* के रूप में आए हुए थे | शबरी को भगवान ने *नवधा भक्ति* का अद्भुत ज्ञान प्रदान किया | उसके बाद राघवेंद्र सरकार शबरी से कहते हैं :---


*जनक सुता कइ सुधि भामिनी !*

*जानहिं कहु करिबरगामिनी !!*


भगवान कहते हैं कि :- हे भामिनि ! मेरे दर्शन करने से आज तेरे जन्म जन्मांतर की इच्छा पूरी हो गई | अब यदि तुम हमारी सीता की कुछ खबर जानती हो तो हमें बता दो | शबरी ने कहा हे भगवान ! आप यहां से पंपा सरोवर जाइए वहां आपको सुग्रीव मिलेंगे और वही आपके आगे का मार्ग प्रशस्त करेंगे | ऐसा कहने पर श्री राम एवं *लक्ष्मण जी* वहां से पंपासर की ओर चल पड़े |



*शेष अगले भाग में :----*


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आचार्य अर्जुन तिवारी

प्रवक्ता

श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी

(उत्तर-प्रदेश)

9935328830


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 लक्ष्मण चरित्र भाग- ३१ :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

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