प्रेम का आखिरी पड़ाव

16 मई 2020   |  शिल्पा रोंघे   (343 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रेम का आखिरी पड़ाव

शशांक ने कहा हैलो स्मिता मैं बैंगलुरु पहुंच गया हूं। यहां की एक फ़ार्मा कपंनी में मैनेज़र के तौर पर मेरा प्रमोशन हो गया है,30 साल का हो गया हूं। कोई अच्छी सी लड़की बताओं ना बिल्कुल तुम्हारी तरह

”।


मैं क्या कोई फ़ोटोकॉपी मशीन हूं, जो मेरी तरह लड़की चाहिए तुमको, बहरहाल मुझसे कई गुना अच्छी लड़की मिल जाएगी तुमको और बताओं क्या हाल है तुम्हारा?” स्मिता नेये कहकर फिर बात को टाल दिया, वो जानती थी कि शंशाक शायद उसके जैसी लड़की की नहीं, उसकी ही बात कर रहा है लेकिन वो सिर्फ उसे अपना अच्छा दोस्त ही मानती थी और सोचती थी दोस्ती में अगर प्यार व्यार की बात आ जाए तो कभी कभी ना दोस्ती रहती है, ना प्यार। तो दोस्ती को दोस्ती ही रहने दो।

शशांक उसके घर की बिल्डिंग में सबसे उपर वाले फ्लैट में रहता था क्योंकि उसकी तनख़्वाह अच्छी ख़ासी थी तो वो अकेले ही फ्लैट लेकर रह रहा था।

वहीं 26 साल की मध्यम कद, छरहरी काया और बड़ी बड़ी आंखों वाली सांवले रंग की सुंदर सी लड़की स्मिता ने डिजिटल मार्केटिंग ट्रेनी की तरह अपने करियर की शुरुआत की थी, उसके लिए पुणे जैसे शहर में महंगा फ्लैट ले पाना बहुत मुश्किल था तो वो दो तीन लड़कियों के साथ रह रही थी।

दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिले और एक दिन स्मिता के फ्लैट का फ्यूज़ उड़ गया अब सबने सोचा किसे बुलाए रात के 10 बजे, स्मिता ने सकुचाते हुए अपने से दो माले उपर रहने वाले शशांक के फ्लैट पर दरवाजा खटखटाया सोचा बाकी फ्लैट में रहने वाली लड़कियां पता नहीं ये काम कर पाएं या भी नहीं शशांक ने दरवाजा खोला एक 5 फीट दस इंच का मध्यम काठी आदमी उसके सामने था जिसका रंग गेंहूआ और बाल घुंघराले थे नैन नक्श कुछ ख़ास नहीं थे लेकिन गालों पर पड़ने वाले डिंपल ने उसके चेहरे को ख़ास बना दिया था।

शशांक ने कहाक्या बात है इतनी रात को?

स्मिता जी हमारे घर का फ्यूज़ उड़ गया है

शशांक ने कहा मैं मदद कर सकता हूं

स्मिता तो यही चाहती थी, थोड़ी देर में शशांक ने उसके घर का फ्यूज़ ठीक कर दिया।

और जल्दी ही टाटा बॉय बॉय कह कर चला गया, उस वक्त ना स्मिता ने उसमें रुचि ली ना शंशाक ने ।

शशांक और स्मिता में बिल्डिंग की सीढ़ियों पर हाय हैलो ज़रुर होती थी।

दोनों ने सोसायटी का वाट्स अप ग्रुप भी ज्वाईन कर लिया।

शशांक के घर एक सुनहरे बालों वाली एक गोरी चिट्टी लड़की आया करती थी, उसे पीला रंग बहुत पसंद था अक्सर पीले सूट या पीली शर्ट पहने रहती थी शायद शशांक की ही कंपनी में काम करती थी।

स्मिता ने भी सोचा उसे भी शशांक के निजी जीवन से क्या लेना देना, तो उसने पूछा भी नहीं। एक दिन शशांक का ट्रांसफर हो गया और स्मिता के ऑफिस से आने से पहले ही वो बैंगलुरु के लिए निकल गया।

15 दिन बाद आए शशांक ने स्मिता को फ़ोन पर हाय हैलो करना शुरु कर दिया और बातों ही बातों में बता दिया कि वो पीले रंग की ड्रेस वाली लड़की उसकी गर्लफ्रेंड ही थी जिसने कंपनी के ही एक अधिकारी जो कि उससे पद में काफी उंचे ओहदे पर थे, से शादी कर ली है उसका दिल बहुत टूट गया है और रिश्तों से भरोसा भी उठ गया है, और वो अब प्यार व्यार के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता है।

स्मिता ने भी उससे सहानुभूति व्यक्त की, धीरे- धीरे शशांक के कॉल आने बढ़ गए और उसका स्मिता से दोस्ती से ज्यादा लगाव हो गया, वो उसे बिल्कुल अपनी मां की तरह लगती थी, ऐसा उसने कहा भी। उसके सहज व्यक्तित्व से वो काफी प्रभावित था।

स्मिता को भी लगने लगा कहीं वो उसे पसंद तो नहीं करता तो वो उसकी बातों को हंसकर टाल जाती, वो इन भावनाओं को मित्रता की सीमा से आगे नहीं ले जाना चाहती थी।

एक दिन शशांक के फोन भी आने बंद हो गए उसे लगा कि शायद स्मिता उसे नज़रअंदाज़ कर रही है ऐसे में उसे फोन करके परेशान करना सही नहीं है।

ऐसा दो साल तक चला। एक दिन शशांक ने स्मिता को फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी तो पता चला कि स्मिता ने बैंगलुरु की ही एक कंपनी ज्वाइन कर ली। स्मिता से चैट करते- करते बातों बातों में ही शंशाक ने उसे कॉफी पर आने का न्यौता दे डाला और स्मिता मना नहीं कर पाई।

शशांक ने कई दिनों से स्मिता को तो कॉल नहीं किया लेकिन उसकी दोस्त से सपंर्क में था जिसने बताया कि वो समीर नाम के पियानों टीचर को डेट कर रही है और रिश्ते को आगे ले जाना चाहती है लेकिन घर के लोग इस रिश्ते को स्वीकार करेंगे या नहीं इस उलझन में है, क्योंकि वो बिल्कुल ही अलग संस्कृति का था और स्वभाव में भी उससे बिल्कुल जुदा था कहते भी तो है अपोजिट एक्ट्रेक्ट इच अदर। इस बात को कई महीने बीत चुके थे। समीर मध्यम कद काठी का गौर वर्ण वाला और सौम्य मुस्कान और चमकदार आंखो वाला आकर्षक व्यक्ति था।

एक दिन दोनों कॉफी शॉप में मिले। शशांक ने सोचा वो बहुत ख़ुश होगी पर ये क्या, उसका चेहरे की चमक ही उड़ गई थी पहले से काफी दुबली हो चुकी थी उसने सोचा शायद प्रमोशन के साथ काम का बोझ भी बढ़ गया होगा।

स्मिता से शशांक ने पूछा "शादी कब कर रही हो अपने बॉयफ्रेंड से, मुझसे प्लीज़ कुछ मत छिपाओ मैनें भी तो तुम्हें अपना हमराज़ बनाया है, जब मैं पुणें में रहता था, तो समीर से मैं भी पियानो सीख चुका हूं काफी रईस घर का है वो अब तुम रानी बनकर रहोगी। घर वालों की चिंता मत करो मैं तुम्हारा गवाह बनूंगा कोर्ट में, चलो आज तुम मुझे इस ख़ुशी में मिठाई खिलाओ मुझे सब पता चल चुका है"।

स्मिता ने कहा "ऐसा कुछ भी नहीं जो तुम सोच रहे हो, मैंने बीच में ही उसकी पियानो क्लॉस छोड़ दी है तीन महीने भी पूरे नहीं हो पाए"।

"चलो कोई बात नहीं अब तो जीवन भर पियानो सीखना है तुम्हें क्लॉस क्या घर में ही सीख लेना"।

स्मिता अंतर्मुखी स्वभाव की थी अपनी बात अपने तक रखती थी लेकिन शशांक से कुछ छिपाना उसे ठीक नहीं लगा।

उसने बताया कि समीर मारिया नाम की एक लड़की के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहता था और ये बात उसने उससे छिपाई। उसकी मीठी मीठी बातों में आकर स्मिता ने कुछ जानने की कोशिश भी नहीं की और एक दिन समीर ने पियानो क्लॉस खत्म होते ही उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनने के लिए प्रपोज़ कर दिया।

स्मिता भी ना नुकूर करती रही लेकिन उस दिन उसने समीर से सोचने के लिए वक्त मांगा लेकिन वो सचमुच समीर को काफी पसंद करने लगी थी, समीर भी ये जान चुका था कि वो उसे लेकर काफी सीरियस हो चुकी है।

एक दिन स्मिता समीर को सरप्राईज़ देने के लिए उसके फ्लैट पर जा पहुंची, पर ये क्या दरवाजा एक लड़की ने खोला एक बेहद गोरे रंग की भूरे आंखों खूबसूरत वाली लड़की उसके फ्लैट से निकली उसने स्मिता से पूछा कि क्या काम है उसे, समीर अभी बहार गया है

समीर के फ्लैट पर लड़की को देखकर स्मिता चौंक गई उसने पूछा आप कौन तो वो बोली "मारिया' मैं उसकी लिव इन पार्टनर हूं

स्मिता ने कहा वो उसकी स्टूडेंट है उसका कुछ सामान क्लॉस में छूट गया था, लगा कि शायद समीर घर ले आया हो।

मारिया ने कहा तुम्हारा नाम ?”

तो स्मिता ने कहा मैं कल क्लॉस में ही मिल लूंगी उसकी बात टालकर निकल गई।

समीर की इस बात से स्मिता को काफी दुख हुआ और उसने क्लॉस जाना बंद कर दिया और एक दो बार समीर ने उसे क्लॉस आने को कहा भी लेकिन वो नहीं गई और उसकी नाराजगी की वजह भी नहीं बताई। समीर को इस बात कुछ ख़ास फ़र्क पड़ा भी नहीं मारिया के पहले भी वो कई लड़कियों को डेट कर चुका था।

दरअसल स्मिता उसे पूरी तरह समझी ही नहीं, समीर ने संघर्ष नाम की चीज़ अपने जीवन में नहीं देखी थी, इकलौता बेटा होने की वजह से उसकी हर ज़िद उसके माता पिता पूरी कर देते थे शायद इसी वजह से उसे अपने जीवन में प्यार की कमी खली नहीं। लड़कियां खुद उसकी जिंदगी में आती और अपना मतलब पूरा करके निकल जाती और वो ये बात समझ भी नहीं पाता था क्योंकि एक टूटे रिश्ते के बाद कोई और उसके पास आ जाती थी।

शशांक ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया था उसके पिता की नौकरी में पढ़ाई का खर्चा संभव नहीं था ऐसे में उसने खुद लोन लेकर दिन रात मेहनत करके अपने ज़िंदगी बनाई थी, साथ ही वो घर में बड़ा भी था और उसके छोटे भाई की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी उसने ले रखी थी, रिश्तों की टूटन और ज़िंदगी की कड़वी सच्चाईयों से वो वाकिफ़ था।

समीर ने स्मिता ने सहानुभूति व्यक्त की और फिर वही बात दोहराई कि जो उसने फ़ोन पर दो साल पहले कही थी। स्मिता ने सीधे सीधे मना करने के बजाए कुछ वक्त मांगा ताकि शशांक को बुरा ना लगे।

शशांक ने भी उसे फ़ोन नहीं किया लेकिन कुछ दिनों में स्मिता को ये लगने लगा कि शायद उसे जीवनसाथी के तौर पर कोई ना कोई मिल ही जाएगा लेकिन ज़रुरी नहीं कि वो शंशाक की तरह समझदार और उसे समझने वाला हो। शायद वही उसके प्रेम का आखिरी पड़ाव है।

एक महीना बीत जाने के बात शशांक ने ये उम्मीद छोड़ दी थी कि स्मिता उसकी बात मानेगी। तभी वो अचानक अपने घर चला गया और घरवालों के दिखाए हुए रिश्ते देखने लगा, तभी स्मिता का मैसेज आ गया कि वो उसका साथ जीवन भर के लिए चाहती है।

तभी शशांक की मां ने आवाज़ लगाई कहा बोल दूं लड़की वालोंको कि जो लड़की तुमने कल देखी थी वो तुम्हे पसंद है

तभी उसकी मां चौंक गई और कहने लगी अरे कल ही तो कहा था कि पसंद है अब क्या हुआ? आजकल के लड़के भी ना कब पलट जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है।"

तो वहीअपनी मां की बातों को अनसुना कर शशांक मन ही मन खुश हो रहा था और वापस बैंगलुरु जाने के लिए बेताब था।

शिल्पा रोंघे

© सर्वाधिकार सुरक्षित, कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है जिसका जीवित या मृत व्यक्ति

से कोई संबंध नहीं है।

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