मायानगरी के सपनें

20 मई 2020   |  शिल्पा रोंघे   (462 बार पढ़ा जा चुका है)

सचिन को सुबह-सुबह उसके दोस्त का फ़ोन आया वो कहने लगा “अरे वाह तूने तो सच में शहर का नाम रोशन कर दिया”

सचिन ने कहाअरे क्या हुआ ऐसा

नवनीत ने कहा “तेरा इंटरव्यू छपा था जबलपुर के एक अखबार में”

सचिन ने कहा ओह उसकी बात कर रहा है तू

हेडलाईन छपी शहर की प्रतिभा ने मायानगरी में बनाई पहचान, मिला एक फ़िल्म में काम

सचिन उसकी बात से कुछ खास खुश नहीं हुआ क्योंकि 3 साल के स्ट्रगल के बाद भी उसे ऐसा रोल मिला जिसकी अवधि मुश्किल से 5 मिनिट रही होगी। इससे पहले वो दो तीन एड फ़िल्म में ही काम कर चुका था, इतने सालों में उसने एक दो लाख से ज्यादा नहीं कमाए थे।

फ़ोन पर बातचीत ख़त्म होते ही वो फ़्लैशबैक में चला गया कि कैसे मुंबई के एक पॉश इलाके में वो बड़े- बड़े सपने लेकर आया था, स्कूल और कॉलेज में वो कई डॉसिंग और मॉडलिंग कॉम्पीटिशन जीत चुका था, देखने में भी खूबसूरत था और कद काठी भी अच्छी थी, बीकॉम पूरा करने के बाद सीए के लिए भी ट्राय किया लेकिन इंटरमिडियट लेवल पूरा करने के बाद भी आगे उसका पढ़ाई में मननहीं लगा और वो मायानगरी में हीरो बनने का ख़्वाब अपनी आंखों में बसाकर चला आया।

एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर काटना बस यही उसकी ज़िंदगी हो गई थी अब तक करीब 300 ऑडिशन दे चुका था लेकिन वो कामयाबी नहीं मिली जो वो चाहता था।

यहां आकार देखा कि उसके जैसे हजारों खूबसूरत नौजवान स्ट्रगल कर रहे है, जैसे कि उसका कोई अस्तित्व ही ना हो।

उसके पिता प्राईवेट कंपनी में इंजिनियर थे उसकी तीन बहनें थी, दो की शादी हो चुकी थी और एक पढ़ाई कर रही थी, सचिन के पिता पहले उसके इस फ़ैसले के लिए तैयार नहीं थे लेकिन वो जिद पर अड़ा रहा, कुछ एक्टिंग के कोर्स भी किए जहां उसका काफी पैसा खर्च हुआ उसकी एक्टिंग में तो निखार आ गया लेकिन फिर उसके पास काम का अकाल था।

उसके पिता हर महीने उसके अकाउंट में करीब 10-15 हजार डाल देते थे जिससे उसका खर्चा- पानी निकल जाए लेकिन मायानगरी में सिर्फ खर्चा पानी से कहां काम चलता है लाइफ़स्टाइल भी तो मेन्टेन करना पड़ता है।

महंगे- महंगे कपड़ें और उसके दोस्तों की पार्टियों के बीच उसकी स्थिती आमदनी अठन्नी और खर्चा रुप्पया वाली हो गई थी।

उपर से तो वो खुद को बेहद खुश दिखाता लेकिन अंदर ही अंदर घुट रहा था, उसके पिता भी फ़ोन पर उसे वापस आने की ज़िद करते थे और एक दिन फ़ोन करके कहा तुम पढ़ाई में इतने अच्छे हो तो क्यों नहीं अपने सीए का फ़ायनल राउंड भी कंपलीट करने के लिए प्रयास करो। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद फिर मुंबई चले जाना मैं तुमको रोकूंगा नहीं

लेकिन सचिन का मन नहीं कर रहा था कि वो वापस आए लेकिन एक दिन उसे ख़बर आई कि उसके पिता का हार्ट अटैक से निधन हो गया।

अब मां और बहन की जिम्मेदारी सचिन पर ही थी तब उसके मन में ख़्याल आया कि इतना स्वार्थी होना भी ठीक नहीं है अपने पिता को अग्नी देने के बाद वो जबलपुर से मुंबई लौटा ही नहीं और अपनी पढ़ाई पूरा करने में जी जान से जुट गया और कुछ साल मेहनत करने के बाद सीए का एक्ज़ाम पूरी तरह क्लीयर कर लिया। अपने आप को बदनसीब समझने वाला सचिन अब खुद को भाग्यशाली समझने लगा।

शिल्पा रोंघे

© सर्वाधिकार सुरक्षित, कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है जिसका जीवित या मृत व्यक्ति

से कोई संबंध नहीं है।


मायानगरी के सपनें

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