मौलिक कर्तव्य और संविधान के आदर्श

20 मई 2020   |  डॉ. देशराज सिरसवाल   (423 बार पढ़ा जा चुका है)

दोस्तों, "मौलिक कर्तव्य" भारतीय संविधान के भाग IV क में अनुच्छेद 51 क में सम्मिलित किया गया है। वर्ष 2002वके 86वें संशोधन के द्वारा मौलिक कर्तव्यों की संख्या 10 से बढ़ा कर 11 कर दी गयी है। देखा जाए तो अधिकारों से पहले कर्तव्य की समझ जरूरी है। हमें सोचना चाहिए कि क्या हम आने मौलिक कर्तव्यों के बारे अच्छे से जानते है? उनका अनुसरण करते हैं?
भारतीय संविधान के निम्नलिखित आदर्श हैं:
1 न्याय: सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक
2 स्वतन्त्रता: विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की
3 समता: प्रतिष्ठा और अवसर की तथा उन सब में
4 बन्धुता: जिसमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित हो।

उपरोक्त आदर्शों का चिंतन मनन बहुत आवश्यक है अगर हम एक आदर्श राष्ट्र चाहते हैं।

मौलिक कर्तव्यों में से एक बहुत ही महत्वपूर्ण है आज की परिस्थितियों के अनुसार । वो है वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास। देश के विकास के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना बहुत आवश्यक है। हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में संकीर्ण मानसिकता, अंधविश्वास व हठधर्मिता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिये।

जब भी हमसे ये प्रश्न किया जाता है कि क्या हम अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन करते हैं सामान्यतया सभी हाँ में जवाब देंगे। पर यह हम सब के लिए आत्म निरिक्षण का विषय है।

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