वटसावित्री (बरगदही अमावस) :- आचार्य अर्जुन तिवारी

22 मई 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (393 बार पढ़ा जा चुका है)

वटसावित्री (बरगदही अमावस) :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से लेकर आज तक संसार में सबके हित की बात सोचने एवं पुरुष समाज के लिए समय-समय पर अनेकों व्रत एवं उपवास करके नारियों ने पुरुष समाज का हित ही साधा है | हमारे देश में नारियों का दिव्य इतिहास रहा है | समय-समय पर कभी भाई के लिए , कभी पति के लिए तो कभी पुत्र के लिए नारियाँ कठिन उपवास रखकर के उनके कल्याण की ही कामना करती रही है परंतु दुख इस बात का है कि पुरुष समाज ने कोई भी व्रत नारियों के लिए नहीं किया | इसी व्रत की कड़ी में जेष्ठ कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पति की लंबी आयु एवं सुखद वैवाहिक जीवन की कामना से नारियां "बट सावित्री" का व्रत करती हैं | पौराणिक कथा के अनुसार महाराजा अश्वपति की पुत्री सावित्री के पति सत्यवान कि जब असमय मृत्यु हो गई और यमराज उसके प्राणों को लेकर चले तब सावित्री भी पीछे पीछे चल पड़ी | उसके पतिव्रत धर्म को देखकर कि यमराज ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा | प्रथम दो वरदान में अपने सास ससुर की नेत्रज्योति तथा खोया हुआ राज्य मांग कर सावित्री ने तीसरे वरदान में स्वयं को सौ पुत्रों की माता होने का वरदान मांगा | अपनी धुन में यमराज ने तथास्तु तो कह दिया परंतु बिना पति के पुत्र कैसे होंगे सावित्री के कहने पर उन्हें सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े | सत्यवान के प्राण लेकर सावित्री उसी बरगद के पेड़ के नीचे आई जहां उनके पति का मृत शरीर पड़ा हुआ था | इस प्रकार एक पतिव्रता स्त्री ने यमराज को भी परास्त कर दिया तथा ब्रह्मा के विधान को परिवर्तित कर दिया | नारियां सृष्टि की मूल है आज यदि पुरुष समाज फल फूल रहा है तो इसका कारण एकमात्र नारी ही है | सावित्री एवं सत्यवान की कथा का आधार लेकर तब से लेकर आज तक सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु एवं वैवाहिक जीवन को सुखद एवं सरल बनाने के लिए वट सावित्री का पूजन एवं व्रत रखती हैं | उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में वट सावित्री को बरगदही अमावस्या भी कहा जाता है | यह व्रत उत्तर भारत में तो जेष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है परंतु दक्षिण भारत में यही व्रत जेष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को करने का विधान देखने को मिलता है | दिन या तिथि कोई भी हो दर्शनीय एक स्त्री की पतिपरायणता ही होनी चाहिए | इसीलिए नारी को धन्य कहा गया है |*


*आज आधुनिकता के रंग में जिस प्रकार सभी त्यौहार , व्रत / उपवास रंग गए हैं उसी प्रकार वट सावित्री का व्रत भी आधुनिक हो गया है परंतु आधुनिक होने के बाद भी प्राचीन परंपरा स्वयं में समेटे रखना ही भारतीय संस्कृति का गौरव है | बट सावित्री का पूजन हमारे पूर्वजों के द्वारा किए जा रहे प्रकृति पूजा का ही एक अंग है वस्तुतः कामना यह होती है कि जिस प्रकार बरगद का वृक्ष सघन एवं विस्तारवादी होता है उसी प्रकार परिवार भी विस्तृत एवं सुखी तथा संपत्तिवान हो | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि आज के दिन प्रत्येक सौभाग्यवती स्त्री को अपने पति एवं परिवार की प्रसन्नता के लिए यह व्रत अवश्य करना चाहिए पूजन करने के बाद सावित्री माता को अर्घ्य देते समय निम्न श्लोक का पाठ करें :-- "अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते ! पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोस्तुते !! माता सावित्री को अर्घ्य देने के बाद वटवृक्ष की प्रार्थना करते हुए कहना चाहिए :-- "यथा शाखा प्रशाखाभिर्वृद्धो$सि त्वं महीतले ! तथा पु्त्रैश्च पौत्राश्च सम्पन्नम् कुरु मम सदा !!" अर्थात बट वृक्ष से प्रार्थना करनी चाहिए कि जिस प्रकार इस पृथ्वी पर आपकी शाखा एवं उपशाखा निरंतर वृद्धि प्राप्त कर रही हैं उसी प्रकार हमारे पति पुत्र एवं पौत्रों को आप संपन्न कीजिए | आज के दिन गांव से लेकर शहर तक सनातन धर्म को मानने वाली सौभाग्यवती स्त्रियां वट सावित्री का व्रत अवश्य करती है | व्रत लगभग संपूर्ण भारत में करने का विधान एक ही है परंतु आंचलिक क्षेत्रों में कुछ परिवर्तन भी देखने को मिल सकता है , क्योंकि कुछ लौकिक परंपराएं भिन्न होती हैं | आज इतना आधुनिक परिवेश होने के बाद भी यदि नारियां करवा चौथ , हरतालिका तीज एवं वट सावित्री का व्रत कर रही है तो वह अवश्य ही पूज्यनीय एवं वंदनीय है |*


*पुरुष समाज के लिए सदैव समर्पित रहने वाली नारियां अनेकों व्रत उपवास के माध्यम से सदैव इनके सुख की ही कामना करती रही है इसीलिए हमारे शास्त्रों में नारियों को उच्च स्थान प्राप्त है |*

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