लक्ष्मण चरित्र भाग - ४४ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

28 मई 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (378 बार पढ़ा जा चुका है)

लक्ष्मण चरित्र भाग - ४४ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🐍🏹 *लक्ष्मण* 🏹🐍


🌹 *भाग - ४४* 🌹


🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸🍏🩸


*➖➖➖ गतांक से आगे ➖➖➖*


भगवान श्री राम अपने मित्र मंडल भार्या सीता एवं *अनुज लक्ष्मण* जी के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या पहुंचे | नगर वासियों ने जब अपने प्रिय राम को देखा तो उनके मुख से बरबस ही निकल पड़ा *"स्वागतं ते महाबाहो , कौशल्यानन्द वर्धक"* अर्थात हे माता कौशल्या के आनन्द बढ़ाने वाले महाबाहु श्री राम आपका स्वागत है | सर्वप्रथम भरत जी ने श्री राम की चरण पादुका उनके पावन चरणों में पहनाते हुए हाथ जोड़कर कहा :---


*अद्य जन्म कृतार्थं में संवृतश्च मनोरथ: !*

*यत् त्वां पश्यामि राजान् मयोध्यां पुनरातम् !!*

*अवेक्षणं भवान् कोशं कोष्ठागारं गृहम् बलम् !*

*भवतस्तेजसां सर्वं कृतं दशगुणां मया !!*


भरत जी कहते हैं:-- आज मेरा जन्म सफल हो गया , मेरा मनोरथ पूरा हुआ जो मैं आपको आपका राज्य वापस लौटा रहा हूँ | आपके पुनः अयोध्या लौटने पर मैं कृतकृत्य हो गया | हे महाराज ! आप देख लीजिए इन चौदह वर्षों में आपका राज्य , खजाना , कोठार , घर और सेना सब आपके प्रताप से दस गुनी हो गई है | श्रीराम ने भरत भाई को हृदय से लगा लिया | सबसे पहले श्रीराम माता कैकेयी से मिले | उसके बाद सारे नगरवासियों से मिलकर राजमहल में पहुंचे | शुभ मुहूर्त में श्री राम का राज्याभिषेक हुआ | पृथ्वी पर रामराज्य की स्थापना हुई |


श्रीराम के जीवन में एक समय ऐसा आया उन्हें जब सीता का त्याग करना पड़ा | *भगवत्प्रेमी सज्जनों !* कुछ लोग कहते हैं कि श्री राम ने सीता का गर्भावस्था में त्याग करके मानवता को लज्जित किया है | तो ऐसे लोगों को हमारे धर्मग्रंथों का अध्ययन करने की आवश्यकता है | मित्रों ! मनुष्य को सबसे अधिक प्रसन्नता तब होती है जब उसको यह पता चलता है कि उसकी पत्नी ने प्रथम गर्भधारण किया है | पिता बनने का सुख सबसे बड़ा सुख होता है | ऐसे समय में प्रत्येक पति अपनी पत्नी को मुंह मांगा भी देने को तैयार हो जाता है | उसी प्रकार मानवोचित लीला कर रहे श्री राम ने भी जब यह जाना कि महारानी सीता ने गर्भधारण किया है तो वे ही प्रसन्न होकर सीता जी से कहने लगे :- प्रिये ! आज मैं बहुत प्रसन्न हूं तुम्हारी जो भी इच्छा हो वह वरदान हम से मांग लो | सीता जी ने कहा कि स्वामी ! मेरी एक प्रबल इच्छा है कि :----


*गंगातीरोपविष्टानामृषीणामुग्र तेजसाम् !*

*फलमूलाशिनां देव पादभूतेषु वर्तितुम् !!*

*एष मे परम: कामो वन्मूलफल भेजिनाम् !*

*अष्येकरात्रिं काकुत्स्थ निवसेयं तपोवने !!*


सीता जी कहती हैं :- हे भगवन ! मेरी इच्छा एक बार उन तपोवनों को देखने की है जहाँ हम वनवास काल में घूमकर आये हैं | हे देव ! गंगा तट पर रहकर मूल फल खाने वाले तेजस्वी महर्षियों के समीप कुछ दिन रहना चाहती हूं | यही मेरी सबसे बड़ी अभिलाषा है | जो पत्नी पिता बनने की अभिलाषा पूर्ण कर रही हो उसकी अभिलाषा पूर्ण करने का दायित्व पति का होता है | यही विचार करके श्री राम ने सीता से कहा कि मैं तुम्हारी कामना पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता हूं |


*भगवत्प्रेमियों !* इस संसार के सारे कार्य परमात्मा द्वारा ही संपादित होते हैं परंतु वह परमात्मा कभी स्वयं के ऊपर ना तो दोष लेता है और ना ही प्रशंसा | परमात्मा मनुष्य को ही निमित्त बनाकर के वह कार्य संपन्न करवाता है | श्री राम को गुप्तचरों ने सीता के विषय में प्रजा में हो रही अनर्गल चर्चाओम की जानकारी दी तो उन्होंने भरत , *लक्ष्मण* , शत्रुघ्न को बुलाकर उनसे कहा कि हे भाई ! तुम सुन रहे हो कि प्रजा में महारानी सीता को लेकर क्या चर्चाएं हो रही है ? *लक्ष्मण* ने कहा :- भैया ! जो भी चर्चाएं हो रही हैं वे सब अनर्गल हैं ! माता सीता निर्दोष है इसका साक्षी मैं स्वयं एवं वानर मंडल है | सबके सामने माता सीता ने अग्नि परीक्षा दी है | भगवान श्रीराम ने कहा *लक्ष्मण !* यद्यपि तुम सत्य कह रहे हो परंतु यह भी सत्य है कि वह अग्निपरीक्षा अयोध्या के लोगों ने नहीं देखी | इसलिए *लक्ष्मण !* मैंने एक निर्णय लिया है कि मैं इस लोकापवाद को समाप्त करने के लिए सीता का त्याग कर दूँगा | श्रीराम की बात सुनकर तीनों भाई आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगे | श्रीराम ने कहा *हे लक्ष्मण !* :---


*जन्म से लइके आजु तलक ,*

*मोरा काज संवारेउ तुम सब भाई !*

*वन मां सहेउ सब कष्ट बराबर ,*

*"अर्जुन" कन्दमूल फल खाई !!*

*संकट मां हम आजु परेउ पुनि ,*

*तुम होय जाउ हमार सहाई !*

*लछिमन रथ बैठारि के छांडहुँ ,*

*राज्य के बाहर तुम भौजाई !!*


श्री राम ने कहा :-- *भैया लक्ष्मण !* बचपन से लेकर आज तक तुमने हर सुख दुख में मेरा साथ दिया है और मेरी प्रत्येक आज्ञा का पालन किया है | आज मेरी एक आज्ञा का और पालन कर दो | *लक्ष्मण !* तुम अपने रथ में अपनी भाभी सीता को बैठाकर अयोध्या की सीमा के बाहर छोड़ दो | *लक्ष्मण* की आंखों में आंसुओं की धारा बह निकली | *लक्ष्मण* ने कहा :- भैया ! ऐसा आदेश ना दें जिससे कि आपका यह दास *लक्ष्मण* इनकार करने को विवश हो जाय | भैया कुछ लोगों के कहने मात्र से आप हमारी माता सीता का त्याग नहीं कर सकते , मैं इसका विरोध करता हूं और आवश्यकता पड़ी तो विद्रोह भी करूंगा | *लक्ष्मण* की भावना एवं सीता के प्रति प्रेम देखकर श्रीराम गंभीर होकर के बोले :- *लक्ष्मण !*:--


*अप्रीतिर्हि परा मह्यं त्वयैतत् प्रतिवारिते !*

*शापिता हि मया यूयं पादाभ्यां जीवितेन च !!*

*ये मां वाक्यान्तरे ब्रूयुरनुनेतुं कथंचन !*

*अहिता नाम ते नित्यं मदभीष्टविघातनात् !!*


श्रीराम ने गंभीर वाणी में कहा :- यदि मेरे इस निश्चय में तुमने किसी प्रकार की अड़चन डाली तो *हे लक्ष्मण !* मुझे महा कष्ट होगा | मैं तुम्हें अपने चरणों एवं जीवन की शपथ दिलाता हूं कि तुम मेरे इस निर्णय के विरुद्ध कुछ ना कहो | *लक्ष्मण !* जो मेरे इस कथन के बीच में कूदकर मुझसे किसी भी प्रकार की अनुनय - विनय करने का प्रयास करेगा वह मेरे अभीष्ट कार्य में बाधक माना जायेगा और सदा के लिए मेरा शत्रु हो जाएगा | श्री राम की इस वचन को सुनकर भरत एवं शत्रुघ्न रोते हुए वहां से चले गए | बेचारे *लक्ष्मण* यह नहीं समझ पा रहे है कि इस समय उनका कर्तव्य क्या है ? माता की रक्षा करना या स्वामी के आदेश का पालन करना ? इन्हीं झंझावातों में *लक्ष्मण जी* ने विचार करना प्रारंभ कर दिया | *लक्ष्मण* को विचार मग्न देखकर श्रीराम ने कहा :- *लक्ष्मण !* लोकापवाद के साथ यह तुम्हारी माता सीता की भी इच्छा है कि वे वन में रहें | *लक्ष्मण* ने कहा :- भैया ! क्या माता ने अपना त्याग करने की इच्छा प्रकट की है ?? श्री राम ने कहा :- नहीं ! उन्होंने यह तो नहीं कहा परंतु :--


*पूर्वमुक्तो$हमनया गंगातीरे$हमाश्रमान् !!*

*पश्येयमिति तस्याश्च काम: संवर्त्यतामयम् !!*


*हे लक्ष्मण !* सीता ने मुझसे कहा था कि मैं गंगातट पर ऋषियों के आश्रम देखना चाहती हूँ | इसी बहाने उनकी इच्छा भी पूरी हो जाएगी | *लक्ष्मण* को धीरज बंधाते हुए श्री राम कहते हैं कि अनुज *लक्ष्मण !* तुम आधार हो और आधार को सदैव दृढ़ बने रहना चाहिए | यदि आधार ही इस प्रकार निर्बलता का प्रदर्शन करेगा तो संसार का क्या होगा ??? *लक्ष्मण !* तुम अपने कर्तव्य का पालन करो यही मेरी इच्छा है |


*शेष अगले भाग में :----*


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आचार्य अर्जुन तिवारी

प्रवक्ता

श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी

(उत्तर-प्रदेश)

9935328830


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