आर्त्तनाद (लघुकथा)

10 जून 2020   |  विश्वमोहन   (313 बार पढ़ा जा चुका है)

आर्त्तनाद (लघुकथा)

रात भर धरती गीली होती रही। आसमान बीच बीच में गरज उठता। वह पति की चिरौरी करती रही। बीमार माँ को देखने की हूक रह रह कर दामिनी बन काले आकाश को दमका देती। सूजी आँखों में सुबह का सूरज चमका। पति उसे भाई के घर के बाहर ही छोड़कर चला आया। घर में घुसते ही माँ के चरणों पर निढाल उसका पुक्का फट चुका था। वर्तमान की चौखट पर बैठा अतीत कब से भविष्य की बाट जोह रहा था। दो जोड़ी कातर निगाहें लाचारी के धुँधलेपन में घुलती जा रही थी। सिसकियों का संवाद चलता रहा। दिन भर माँ को अगोरे रही।

पच्छिम लाल होकर अंधेरे में गुम हो गया था। अमावस का काजल धरती को लीपने लगा था। उपवास व्रत के अवसान का समय आ गया था। बरगद के नीचे पतिव्रताओं का झुंड शिव-पार्वती को नहलाने लगा था। कोयल कौए के घोंसले से अपने बच्चे को लेकर अपने घर के रास्ते निकल चुकी थी। कालिंदी अपने आर्त्तनाद का पीछा करती सरपट समुंदर में समाने भागी जा रही थी।

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रेणु
21 जून 2020

माँ बेटी के आत्मीय संबंध की मर्मकथा , जो शायद हर माँ बेटी के जीवन की दर्द भरी सच्चाई है। इससे मिलते जुलते पल पिछले साल मैंने भी मेरी माँ की गंभीर बीमारी के दौरान जीये। ये अटूट बंधन और इसकी अनकही व्यथा या माँ समझ सकती है या बेटी। जीवन की बुझती लौ लिए असहाय माँ की मर्मांतक वेदना के पल, एक बेटी के लिए कितने क्रूर होते हैं , उन्हें किन्हीं शब्दों में शायद लिखा जाना संभव नहीं। पर एक दूसरी बेटी भाभी क्यों इस रिश्ते के प्रति इतनी निष्ठुर साबित होती है, ये प्रश्न नितांत अबूझ है, शायद हमेशा से ही-----!!भावपूर्ण लघुकथा जो नारी मन की पीड़ा को पूर्णरूपेण कहने में सक्षम है । हार्दिक शुभकामनायें🙏🙏

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