मानसिक असन्तुष्टि और अशान्ति

20 जून 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (296 बार पढ़ा जा चुका है)

मानसिक असन्तुष्टि और अशान्ति

मानसिक असन्तुष्टि और अशान्ति

हमारा मन वास्तव में स्वयं को किसी न किसी रूप में अपूर्ण - अधूरा - असन्तुष्ट मानने के लिए स्वतन्त्र है । लेकिन क्या डिप्रेस होकर - स्वयं से अथवा समाज या व्यवस्था की ओर से निराश होकर आत्महत्या कर लेना ही इस समस्या का समाधान है ? संसार तो पहले से ही नाशवान है, स्वयं उस दिशा में क़दम उठा लेना क्या सही है ? सुशान्त सिंह राजपूत के जैसी अनेकों घटनाएँ आज के भाग दौड़ और आवश्यकता से अधिक बढ़ती प्रतियोगिता के समय में घटती रहती हैं । हमने अभी कुछ दिन पूर्व ही इस विषय में लिखा था । आज फिर कुछ मन में आ गया ।

वास्तविकता तो यह है कि हमें हमारे बचपन से यही सिखाया जाता है कि कुछ भी हो जाए - यदि तुम जीवन में आगे बढ़ना चाहते हो - तरक़्क़ी चाहते हो - तो चाहे कुछ भी हो जाए - कभी सन्तुष्ट होकर मत बैठ जाना, क्योंकि सन्तोष प्रगति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है । यदि व्यक्ति के मन में अपनी सफलताओं के प्रति सन्तोष का भाव आ गया तो वह वहीं सिमट कर रह जाएगा । आगे और बढ़ने की इच्छा उसकी समाप्त हो जाएगी । जब कोई इच्छा ही नहीं रहेगी तो व्यक्ति कर्म ही क्यों करेगा ?

हमारे माता पिता, हमारे गुरुजन सदा हमारे व्यवहार, हमारे रहन सहन, हमारी बोली, हमारे प्रयास अर्थात हर बात के लिए हमें अपूर्ण ही अनुभव कराते आ रहे हैं - हमारी हर बात में कमियाँ ही निकालते आ रहे हैं - ताकि हम और अच्छा कर सकें । और इस प्रकार अनजाने में ही हमारे मन के साथ बहुत बड़ी नकारात्मकता जुड़ती चली जा रही है । न तो हम स्वयं अपने मन, हमारे विचारों, हमारी सम्भावनाओं और क्षमताओं को समझने का प्रयास करते हैं न ही हमारे गुरुजन ।

जाने अनजाने हमें एक ही शिक्षा दी जाती है कि हमें दूसरों को प्रभावित करना है - दूसरों को इम्प्रेस करना है । हमारी सारी सोच और सारा जीवन दूसरों को प्रभावित और प्रसन्न करने में ही निकल जाता है और हम भूल जाते हैं कि वास्तव में हमें क्या पसन्द है या हमारी स्वयं की क्या इच्छाएँ हैं । दूसरों को प्रभावित और प्रसन्न करने के प्रयास में हमें यही भूल जाते हैं कि हम जीवन में किस बात या किस व्यक्ति या परिस्थिति के साथ स्वयं को सहज अनुभव करते हैं ।

हम नित्य प्रति स्वयं की तुलना दूसरे व्यक्तियों से करते रहते हैं और स्वयं को उनकी तुलना में कम करके आँकते रहते हैं । और आजकल तो मीडिया का युग है - फिर चाहे वो टेलीविज़न हो, मीडिया या सोशल मीडिया हो - इस प्रकार के कार्यक्रम परोसते हैं जिन्हें देखकर हमें लगने लगता है कि हम वास्तव में imperfect यानी अपूर्ण हैं ।

असल में तो हमें पूर्णता और अपूर्णता जैसे भारी भरकम शब्दों की परिभाषा ही नहीं मालूम । आज के इस "भेड़तन्त्र" के युग में "भेड़ों" यानी भीड़ यानी अधिकाँश लोगों ने जिसे पूर्ण या सही मान लिया वो हमारे लिए भी पूर्णता की तराज़ू बन जाता है । समाज यदि प्रमाणपत्र दे दे हमारी पूर्णता या हमारे कौशल का तभी हम पूर्ण या कुशल कहलायेंगे । उदाहरण के रूप में पूरी बुद्धिमत्ता से बनाया गया नक़ली विज्ञापन किसी भी वस्तु को perfect सिद्ध कर सकता है और हमें उसके परफेक्शन के कारण उसे ख़रीदने को विवश कर सकता है ।

हमें यह जान लेना चाहिए कि इस संसार में पूर्णता या परफेक्शन के रूप में कुछ भी स्थाई नहीं है । जो आज हमें perfect दिखाई देता है वही कल imperfect हो जाता है और उसका स्थान कोई अन्य वस्तु या व्यक्ति या परिस्थिति या योग्यता ले लेती है । हम आज कोई मोबाइल ख़रीदते हैं और शाम तक पता चलता है कि अरे ये तो लेटेस्ट मॉडल नहीं है, अभी कोई दूसरा मॉडल आ गया है - और दिन में जिसे हम लोगों को गर्व से दिखाते नहीं थकते थे शाम तक वही एक ओर रख दिया जाता है । अभी हम कोई ड्रेस ख़रीदते हैं - कल पता चलता है वो तो फैशन में ही नहीं है - और हम उस "आउट ऑफ फैशन" हो चुकी ड्रेस को पहनना ही नहीं चाहते । विज्ञापन तथा मार्केटिंग के गुरु हमें कभी परफेक्शन यानी पूर्णता का अनुभव होने ही नहीं देना चाहते, क्योंकि यदि ऐसा हो गया तो हम नया सामान - नए प्रोडक्ट्स कैसे ख़रीदेंगे । और इस सबका परिणाम होता है कि हम धीरे धीरे डिप्रेशन, खीझ, क्रोध और निराशा के शिकार होते जाते हैं और आत्महत्या की स्थिति तक पहुँच जाते हैं ।

और यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हर क्षेत्र में है । क्योंकि हम कभी अपने भीतर झाँक कर नहीं देखते । क्योंकि हम सतही जीवन जीने के अभ्यस्त हैं । हमारा मन इस सीमा तक इच्छाओं और कामनाओं के आधीन हो चुका है कि हम भूल चुके हैं कि मन की शान्ति और सन्तुष्टि का भी कोई अर्थ होता है । हम अपनी इच्छाओं पर नियन्त्रण न रख पाने के कारण अनजाने ही अपने सम्बन्धों तक में दरार बना लेते हैं । अपना स्वास्थ्य ख़राब कर लेते हैं । और अन्त में डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं या अपना जीवन ही समाप्त कर लेते हैं ।

दूसरों से अपनी तुलना मत कीजिये । आपके गुरुजनों को भी चाहिए कि वे किसी की किसी से तुलना करना बन्द करें । क्योंकि हर व्यक्ति की सामर्थ्य और सम्भावनाएँ अलग होती हैं और हर कोई स्वयं में पूर्ण होता है । आपको केवल वही करना या बोलना है जिसमें आप सहज यानी कम्फर्टेबल अनुभव करें । महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि दूसरे आपसे क्या अपेक्षाएँ रखते हैं, महत्त्व इस बात का है कि आपकी स्वयं से क्या अपेक्षाएँ हैं । कोई आवश्यकता नहीं है दूसरों को इम्प्रेस करने की ।

इसके लिए आवश्यकता है अन्तर्मुखी होने की । इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्तर्मुखी होने की प्रक्रिया में समाज से कट जाएँ । बल्कि समाज के अनुरूप व्यवहार करते हुए भी स्वयं से प्रश्न करें कि आप चाहते क्या हैं ? ऐसा क्या आप कर सकते हैं जिसे करने से आपको आनन्द का - सन्तुष्टि का - पूर्णता का अनुभव हो । जीवन तो स्वयं ही बहुत छोटा है - इसे असमय समाप्त न होने दें । प्रकृतिस्थ रहें यानी अपना स्वभाव न छोड़ें । अपनी आत्मा को पहचानने का प्रयास करें । और योग तथा ध्यान के अभ्यास इस कार्य में हमारी सहायता कर सकते हैं | जिस दिन मनुष्य ने स्वयं को पहचान लिया उस दिन से वह दूसरों के साथ तुलना बन्द कर देगा, दूसरों को इम्प्रेस करने की अपेक्षा स्वयं अपने मन की अपनी आत्मा की सन्तुष्टि और आनन्द पर ध्यान देने लग जाएँगे । जब हम स्वयं को इम्प्रेस कर लेंगे तो विश्वास कीजिये - संसार अपने आप हमसे इम्प्रेस हो जाएगा - हमें इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ेगा ।

कल अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस है | तो इस अवसर क्यों न हम सब संकल्प लें कि योग, प्राणायाम और ध्यान के अभ्यास को अपनी दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण अंग बनाएँगे ताकि हम सन्तुष्ट और प्रसन्न रहें | ध्यान रहे यदि हम स्वयं अपने जीवन से सन्तुष्ट और प्रसन्न होंगे तो किसी प्रकार का अवसाद अथवा नैराश्य हमें विचलित नहीं कर पाएगा और हम अपने साथ साथ अपने प्रियजनों को भी प्रसन्न रखने में सफल हो सकते हैं...

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