ज़िंदगी कुछ ऐसे सिखाती है।

21 जून 2020   |  शिल्पा रोंघे   (310 बार पढ़ा जा चुका है)

मुझे ज़िंदगी ने ये सिखाया कि जिन चीज़ो पर मेरा नियंत्रण नहीं उन पर सोचना नहीं मैं क्या कर सकती हूं बस ये सोचना मेरा काम है।

जो पेड़ बारिश में धूप से बचाता है उस पेड़ के नीचे बारिश से बचने के लिए खड़े होना यानि बिजली के प्रकोप को न्यौता देना है अगर कोई आपकी मदद नहीं कर पाता हो तो ज़रुर कोई वजह होगी, जिसने मदद की उसका आभार जीवन भर नहीं भूलना, जो नहीं कर पाया उसके लिए बुरी भावना रखनी नहीं। मदद पैसों से हो ज़रुरी नहीं सहानुभूति के चार शब्द भी व्यक्ति का दिन बना सकते है, हत्तोसाहन का एक शब्द इंसान के कई दिन बिगाड़ सकता है।

गर कोई आपकी बेवजह आलोचना करता है, झूठ बोलता है, या बार बार अपनी बात बदलता है तो ये उसके व्यक्तित्व की कमजोरी है मेरी नहीं।

कुछ चीज़े विधिलिखित होती है जिन्हें टाल पाना संभव नहीं तो अतिविश्लेषण करके कोई फ़ायदा नहीं कि ऐसा क्यों हुआ, किसलिए हुआ, अगर ऐसा किया होता तो ऐसा नहीं होता। कोई भी अच्छे और बुरे की गारंटी नहीं दे सकता है कोई भी व्यक्ति खुद का जानबुझकर बुरा करे ये ज़रुरी नहीं, लेकिन जान बूझकर आंखों पर पट्टी बांध लेना सही नहीं। दुर्घटनाएं होती है सड़क पर फिर भी लोग घर से निकलना छोड़ते नहीं।

छूट जाते है जिनके देश आपदा या युद्ध के कारण वो भी कहीं और लग जाते है बस्ती बनाने में नई, क्योंकि ये दुनिया संभावनाओं से भरी पड़ी है। फ़र्श से अर्श का सफ़र तय करते है लोग कई।

हर कोई दिल का दर्द बयां करे ये ज़रुरी नहीं लेकिन कर दे दर्द जो बयां अपना उससे दोस्ती निभानी है मुझे निस्वार्थ रुप से। जो दिल दुखाए उससे दूर हो जाना लेकिन बैर भाव रखना नहीं जो दोस्ती निभाए उसे याद रखना ताउम्र मुझे।

शिल्पा रोंघे

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धन्यवाद

बहुत अच्छा लेख है | समझने के लिए भी और दूसरों को समझाने के लिए भी | ग्रहण करने के लिए भी और दूसरों को ग्रहण करने के लिए प्रेरित करने के लिए भी |

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