गीत

22 जून 2020   |  आलोक सिन्हा   (389 बार पढ़ा जा चुका है)

अब

अब देश का मौसम तुम्हें मैं क्या बताऊँ ,

जब हवा भी कुछ बोलने से डर रही है |

भोर तो आती यहाँ हर रोज लेकिन ,

फूल कोई भी तनिक हँसता नहीं है |

रुकते नहीं एक पल को अश्रु फिर भी ,

वेदना कोई तनिक कहता नहीं है |

अब किसी की जिन्दगी मैं कैसे सवारूँ

हर आत्मा जब खुदकशी खुद कर रही है

हो गई अध नग्न बेबस द्रोपदी पर , क्रूर दुश्शासन तनिक बदला नहीं है |

सब गदा, गांडीव धारी मौन बैठे ,

रक्त थोडा भी कहीं पिघला नहीं है |

अब न्याय की आवाज मैं कैसे उठाऊँ ,

जब पूर्ण नगरी चारणों से भर रही है

अब न कोई बांटता पीड़ा किसी की ,

सिर्फ सब अपने लिए ही जी रहे हैं |

मृत हुए प्राचीन गुण आदर्श सारे ,

स्वार्थ का धीमा जहर सब पी रहे हैं |

अब प्यार की सद भावना कैसे जगाऊँ ,

सम्वेदना जब हर ह्रदय में मर रही है |

अगला लेख: भोजपुरी, होली गीत



Shashi Gupta
01 अगस्त 2020

अब तो सौदेबाज़ी है, प्रणाम।

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x