कंधा

26 जून 2020   |  मंजू गीत   (423 बार पढ़ा जा चुका है)

अर्थ जीते जी तो लोग नजर चुराते हैं, उंगली उठाने में खोए रहते हैं और मरते ही लोग कंधा देने चले आते हैं। चार का रिवाज कम सा हो रहा है। क्योंकि अब के इंसान का शरीर बेदम हो गया है। सिर्फ मुंह में जुबान और हाथ में कमान रह गई है। घरों से कई तानें बाने में बुनी चारपाई हट गई है। जिस पर बैठ लोग कितनी ही बातें किया करते थे। मूंज, सनी, जूट, नारियल से बुनी चारपाई हुआ करती थी लेकिन अब कौन उठाए बिछाएं , अंदर बाहर करें। लोग एकांकी हों चले हैं, किसी को किसी से मतलब नहीं, मतलब है तो अपने मतलब से। यहीं मतलब परस्ती विचार डिप्रेशन बन गया है। ना कहते बनता है, ना सुनने वाला कोई मिलता है।अब एक हवा में सांस लेने वाले रह गये है। कूलर, ऐ.सी में बैठ लोग मोबाइल में खोए रहते हैं। अब वो लोग कहां?जो भरें पूरे पेड़ के नीचे, छत के नीचे चारपाई पर बैठ एक कप चाय के साथ कितना कुछ अपना कह जाते थे और दूसरे का सुन लेते थे। अब तो फट्टे, तख्ती के बेड, तख्त आ गये है। एक बार डाल कर छुट्टी। इंसान की जल्दी छुट्टी में इन कठोर फट्टों और नरम गद्दे का कमाल भी पूरा हैं। इसने इंसान की कमर को कमजोर कर छोड़ा है। प्रभा की सास गुजर गयी। जैसे ही वह गुजरी तो आज उसने अपने पूरे घर परिवार को एक साथ देखा। एक छत, एक चुल्हे के पास। प्रभा सास की तेरहवीं के बाद अकेली बैठी सोचने लगी। इंसान जब तक जीता है तब तक वह लोगों को खुश करने, मनाने, रूठने में ही लगा रहता है। मन में गांठ पर गांठ बांध कर उन्हें वक्त बेवक्त फेरता रहता है लेकिन मरते ही लोग उसकी अच्छाई खोज लाते हैं और जीते जी उसकी गलतियां। अर्थी बूढ़े की हों, जवान की हों,अर्थी औरत की हों या मर्द की हों। एक के नीचे लगें चार कंधे लगते देख प्रभा के मन में ख्याल आया कि आख़री मुकाम में वो कंधे सहारा दे रहे हैं। शायद इनमें से किसी के कंधे को छुआ भी नहीं है या छुने का हक भी नहीं हों। या हो सकता है कि जीतें जी छूते तो यही चार लोग बेअदबी के इल्ज़ाम लगा देते। खासतौर पर एक स्त्री जात के लिए। कंधे का रोल ही जीवन को नया अर्थ देता है। बच्चे को मिलें तो झूला, पालकी में मिलें तो पिया घर, प्रितम का मिलें तो प्रेम, अर्थी में मिलें तो अंत यात्रा। प्रभा अपनी आंखों के पानी को पोंछने लगी। प्रभा ने खुद से कहा कि खुलकर रोने के लिए भी इंसान कंधा खोजता है।

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