श्री हन्मान चालीसा (तात्त्विक अनुशीलन) भाग - १ :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

26 जून 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (432 बार पढ़ा जा चुका है)

श्री हन्मान चालीसा (तात्त्विक अनुशीलन) भाग - १ :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *भाग - प्रथम* 🩸



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प्रातःस्मरणीय , परमपूज्यपाद , कबिकुल शिरोमणि , गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित *हनुमान चालीसा* देखने में तो सहज व सरल है किंतु *श्री हनुमान चालीसा* साधारण नहीं है | यह गंभीर भावों से समन्वित सिद्ध स्तुति है | *हनुमान चालीसा* में लिखे गए एक एक शब्द के भाव बहुत ही गूढ़ एवं स्वयं मे विस्तृत तत्वज्ञान समेटे हुए हैं |


माता पिता के आशीर्वचन एवं दीक्षागुरु/कुलगुरू *श्री श्री १००८ महंत श्री नृत्य गोपाल दास जी महाराज* मणिराम दास जी की छावनी श्री अयोध्या जी एवं हमारे आध्यात्मिक तथा साहित्यिक गुरु *सिद्ध पुरुष श्री श्री योगी ज्ञानीनाथ जी महाराज* महंथ राजराजेश्वरी मंदिर राजघाट बलरामपुर की कृपा दृष्टि से *हनुमान चालीसा* की शाब्दिक एवं तात्त्विक विवेचना करने का विचार अकस्मात हृदय में प्रकट हुआ | हनुमान जी की कृपा दृष्टि प्राप्त करते हुए एवं मैहर वाली महामाई शारदा मैया के आंचल तले बैठकर यह व्याख्यान लिखने का सूक्ष्म प्रयास कर रहा हूं | आशा है कि गुरुजन , मित्रजन एवं समकक्ष विद्वानों से आशीर्वाद रूपी प्रसाद अवश्य प्राप्त होगा |


तो आइए *श्री हनुमान चालीसा* का प्रारंभ गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक सुंदर दोहे से किया है , वहीं से इस श्रृंखला का प्रारंभ किया जाता है |


*श्री गुरु चरण सरोज रज ,*

*निज मन मुकुर सुधारि !*

*वरणौं रघुबर बिमल जसु ,*

*जो दायक फल चारि !!*


अर्थात :- श्री गुरु महाराज के चरण कमल कि धूल से (मैं) अपने मन दर्पण को स्वच्छ कर रघुवर का निर्मल यश वर्णन करता हूं जो कि चारों (धर्मादिक ) फको देने वाला है |


तुलसीदास जी के द्वारा लिखे गए दोहे पर दृष्टि डाली जाए यहां *श्री हनुमान चालीसा* मैं जो दोहा लिखा गया है उसका भाव इस प्रकार है |


*दोहा* यद्यपि छंद है जो बिना लिखे भी ज्ञात हो जाता किंतु जहां छंद के नाम का संकेत यहां *दोहा* लिखकर किया गया है वहां भक्ति प्रधान भाव में अनन्य भक्तिसूचक दो को ही (भगवान और भक्त) बताने के लिए *दोहा* लिखा गया जिसका अर्थ है कि *दो ही है* क्योंकि श्री रामचरितमानस में श्री हनुमान जी को भक्ति उपदेश के प्रसंग में इसी भाव को अनन्य भक्ति भाव कहा गया है | इसमें केवल *दो ही की* भाव स्थित रहती है एक भक्त व दूसरी भगवान की | तीसरा कोई भी सृष्टि में नहीं रहता | यथा :---


*सो अनन्य जाके असि ,*

*मति न टरइ हनुमंत !*

*मैं सेवक सचराचर ,*

*रूप स्वामि भगवंत !!*


इस प्रकार इस चालीस चौपाइयों से कृ स्तुति को अनन्य भक्ति परक बताने के लिए *दोहा* शब्द लिखा गया |


एक भाव यह है कि इस स्तुति में केवल *दो ही है* एक भगवान और दूसरा भक्त , अर्थात श्री राम जी एवं हनुमान जी | प्रारंभ में *दोहा* है अर्थात दो है (एक) श्री गुरुजी व (दो) श्रीराम एक साधन (गुर) व दूसरा साध्य (ईश्वर)


यही ध्यान में रखते हुए हुए गोस्वामी जी ने यहाँ *दोहा* शब्द का उल्लेख किया |


*शेष अगले भाग में :-----*


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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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