कल्पना का धीर, भाग -१

28 जून 2020   |  मंजू गीत   (278 बार पढ़ा जा चुका है)

कल्पना को आज भी वह शब्द याद है। "साथी" सच इस शब्द के इर्द गिर्द उसने अपनी जिंदगी को बुनना शुरू कर दिया था। जिंदगी है क्या कभी जाना ही नहीं था। रात के अंधेरे में धीरज का मेसेज का स्करीन पर टू टू की आवाज के साथ आना। आज भी कल्पना की धडकनों में रमा है। शाम 8 बजे के बाद जब भी मेसेज की ट्यूनिंग आती। उसे विश्वास होता कि सिर्फ धीर ने उसे याद किया है। बहुत से सवाल, बहुत से जवाब होते। यह निजता के नहीं, समाज संसार के होते लेकिन यह दोनों एक दूसरे को समझाते हुए कब एक दूसरे को खुद से बेहतर समझने लगे मालूम ही नहीं चला। चाहें अनचाहे कल्पना धीर का मन बन गई और धीर कल्पना का सब्र। सबसे अहम रहा वो आइना जिसे उन दोनों के सिवा कोई और न देख सका। वो आइना आंखों से झांक कर एक की नजर का दूसरे की आंखों में उतर जाना था। वक्त के साथ समझ, शक, सम्मान, हर पड़ाव में इन दोनों की जिंदगी साथ हिलोरें लेती आगे बढ़ी। बात कुछ भी नहीं होती, बस जिंदगी को समझ और उसे हर रूप में संभालने, मायने देने के लिए कभी कभार गहराई में गोते खाते तो कभी मजाक में टीस को गुनगुना कर दूर कर लेते। याद आता तो बांट लेते थे यादें। साथ खाना खाते तो बांट लेते रोटी, चावल आधे आधे। ये आधा पूरे से ज्यादा अच्छा लगता था। जब ये पूरा खुद में समेटते तो यह पूरा तकलीफ देता था निगलने में, लेकिन बंटवारा खुशी देता।

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