धीर का अर्धांग,भाग -२

28 जून 2020   |  मंजू गीत   (279 बार पढ़ा जा चुका है)

कल्पना सपना से अबोध नहीं थी। कल्पना ने सपना को अपनी बातों की खनक से हमेशा धीर के सामने रखा। हालांकि वह दोनों के साथ नहीं होती थी लेकिन वह दोनों से कभी दूर भी नहीं थी। सपना धीरज का अर्धांग है और अर्धांग सांस, आस, विश्वास, से जुड़ा होता है। यह सच भी कभी झूठ नहीं हो सकता। लेकिन औरत भाषा और भाव में पुरुष से हर कदम में आगे होती है। इधर कल्पना धीर को सपना से जोड़ने की कोशिश करती तो उधर सपना का शक कल्पना से धीर को जोड़ने की कोशिश करता। धीरज दोनों ही तरफ को बेहतर समझता। लेकिन सच पर विश्वास जल्दी टिकता कहां है? कल्पना और धीर ढलती रात में ज्यादा बातें भी नहीं करते थे क्योंकि धीर को नींद का नशा और कल्पना अपनी ही सोच में सिमट करवटें बदल कर देर सवेर से सो जाती। पर दिनभर की कोई बात दिल में होती तो अपना समझ दोनों एक दूसरे से कहकर हल्के हो जाते। यह उन दोनो के लिए सुख की बात थी। 22 दिसम्बर 2016 की सुबह 7 बजे के करीब कल्पना धीर को उसके बेटे की जन्मदिन की याद और बधाई के लिए याद किया। इस वक्त फोन धीर के हाथ में नहीं सपना के हाथ में था और दिमाग दूसरी ही सोच में, शक के किड़े ने काटा था। कल्पना धीर से बात कर रही थी पर बात तो बेस्वादी के रुख में ढलने लगी थी। सपना ने कल्पना को फोन लगाया। यह पहली बार था कि सपना से बात हो रही थी।कल्पना सपना की बातों से आती शक की चिंगारी को समझ गई थी और कल्पना ने कह भी दिया कि भाभी शक से नहीं समझ से काम लेना। उधर से जवाब आया कि ठीक है हम बाद में रिजल्ट देंगे। कि ये है क्या? अभी तो तुम अपना काम करो। कल्पना ने सपना की तरफ भाभी कहकर हाथ बढ़ाया। कभी फेसबुक तो कभी वाट्स अप पर बात करने के लिए, लेकिन कभी जवाब न आया। कभी धीर कल्पना और सपना के बीच कड़ी बन जाता तो भले ही जवाब मिल जाए। कल्पना ने सपना के मन को समझ फिर भाई, भाभी शब्द के मायने खुद में समेट लिए। रिश्ते बनाए और निभाने के नाम और मायने वहां दिए जाते हैं जहां दूसरे के दिल में भी उतनी ही चाहत हों। कल्पना धीर के साथ कई सालों से साथ रही लेकिन अब बदलते वक्त में बदल गया है सब। दोनों के बीच विश्वास की डोर थी एक बेहतर साथी के रूप में, पर पता नहीं रिश्तें की या काम को लेकर ऐसी कौन सी डोर कमजोर हुई कि दोनों के बीच साथी शब्द टूट कर बिखर गया। धीर का अब यह कहना हो गया कि हम सिर्फ काम की वजह से जुड़े हैं, वरना क्या लेना-देना। इस लाइन ने कल्पना को उसी दिन बेगाना बना दिया। वरना दोनों के बीच इतनी समझ और अपनापन होता था कि एक ने सोचा दूसरा कर देता था, नहीं लफ़्ज़ों को जहमत देने की बात थी। जिसके दोनों सिरों से बंधकर दोनों मैं आप "हम" शब्द बोलने लगे थे। यह हम वापिस तुम्हारा तुम जानों और अब मैं नहीं पर आकर ठहर गया। दोनों को देख यूं लगता है जैसे बात साथ की नहीं जरूरत की थी। हक कभी रहे नहीं, शब्दों का‌ भी क्या है ? वह भी खेल की बिसात थी। विश्वास और सिर्फ विश्वास की बात थी। धीर का कहना है कल्पना झूठ बोलती है। हां ! कहने से पहले कल्पना भी अपने शब्दों को नहीं तोलती थी एक लय में बस बोलतीं ही चली जाती थी। बेनाप, के बोले शब्द चुभते बहुत है, तो क्या यह शब्द धीर को ना चुभे होंगे। होंगे जरुर चुभते रहे हैं उसे यह शब्द तभी तो कल्पना उसे धीर कहती है सब्र कहता है क्योंकि वह उसकी हर कड़वाहट को कुछ नहीं कहकर पीता रहा है। धीरज की इसी सहनशीलता ने उसे कल्पना से जोड़ा था।

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