मुस्कुराहट भाग-४

29 जून 2020   |  मंजू गीत   (291 बार पढ़ा जा चुका है)

कल्पना को फिर सपने की वह लाल साड़ी और कुर्ता याद आया। कल्पना ने धीर से काम की दुनिया से छुट्टी ली मंगलवार की। आज कल्पना ने अपनी मामी को फोन करके रोहतक आने के लिए कह दिया। वह अपने आस पास के तीन चार बाजार में गयी। कल्पना साड़ी, कुर्ता पजामा पसंद करना चाहती थी। यह चाह धीर और सपना के लिए थी। नवरात्रि थी इसलिए बाजार में भीड़ भी थी। कल्पना व्रत में थी इसलिए सिरदर्द से परेशान भी थी लेकिन जिद थी वहीं मुस्कान पाने की। जिसे ढुढने का वादा वह अपने इष्ट गौरीशंकर से कर आई थी। ऊं नमः शिवाय का जाप कर वह उस दिन लाल साड़ी, कुर्ता पजामा पसंद करने के लिए दुकान दर दुकान ढूंढती रही। जब दुकान में जाती तो कल्पना को नीला रंग पसंद आता क्योंकि कल्पना को रंग तो और भी पसंद है पर नीले रंग पर उसका मन न जाने क्यों ठहर सा जाता। दुकान वाले कल्पना को यह सोच कर साड़ी दिखाते कि उसे करवा चौथ पर खुद पहननी है। हर दुकानदार कल्पना को पहले करवा चौथ का पर्याय समझ मोटे बार्डर की नग से जड़ी झिलमिलाती टमाटरी लाल साड़ी दिखाता। एक दुकान पर उसे लाल साड़ी पर नीले बार्डर की नग जड़ी साड़ी दिखाई दी। जिसका कटांरास कल्पना को पसंद आया। जिसका बिलाउज, साड़ी का पल्ला साड़ी पर और भी फब रहा था। यह 2875 के रेंज की साड़ी थी। जो डिस्काउंट के बाद 2650 की पड़ी। कल्पना को साड़ी तो पसंद आ गयी थी। अब उसे कुर्ता पजामा भी लेना था। कल्पना ने रेडिमेड कुर्ता पजामा देखें लेकिन कल्पना को कुछ जंचे नहीं। कल्पना महरूम, या हल्का नीले रंग का कुर्ता और सफेद पजामा ढूंढ रही थी। जब उसे नहीं मिला तो उसने खादी में हल्के नीले रंग का कुर्ता और सफेद पजामा का कपड़ा खरीदा। कल्पना की मामी सुबह 11बजे से लेकर शाम के तीन बजे तक उसकी पसंद को ढूंढते ढूंढते थक गई थी। वह बार बार पूछती किसके लिए ले रही हैं। कल्पना कहती यह दोनों चीजें किसी को देना है। मामी यह कहकर हंसने लगी कि जब दूसरे को देना है तब इतनी दुकान और बाजार बदले हैं। कल्पना अगर तुम को अपने लिए खरीदना होगा तो कितने दिन लगाती। मैंने देख लिया कल को तेरी शादी होगी तो खरीदारी करनी आसान नहीं है। मैं अकेली तो तेरे साथ अब आने से रही। मामी ने कहा कि मुझे चूड़ियां मैच करवानी है। चल फिर घर चलते हैं। चूड़ियां लेने से पहले दोनों ने एक एक गिलास गन्ने का रस पिया। और इसके बाद उस गली में घुस गई जहां पर बिंदिया और चुड़ियों के सिवा कोई चीज कल्पना को नजर नहीं आ रही थी। मामी ने अपना सूट देकर गाजरी और नीली चूड़ियों का मैच तैयार करवाया। इस मैच को देख कर अब कल्पना के मन में आया कि क्यों न इनके साथ भी चूड़ियों का मैच करवाया जाए। कल्पना ने काफी चूड़ियां देख परख कर दो दर्जन चूड़ियां मैच करवा ली। जब चूड़ियों के पैसे दे दिए तो कल्पना को कुछ याद आ गया। कल्पना ने सपना की कलाई में ज्यादातर सिंपल दो कड़ो को ही पाया है। कल्पना ने दुकानदार से कहा कि भैय्या क्या आपके पास कांच वाले डबल शेड के कड़े होंगे। जो रोजमर्रा में पहन लें। उसने बहुत से कड़े दिखाएं 2, 2 के साइज में उसने कांच के मल्टी शेड के कड़े पसंद किए जों सूट साड़ी हर ड्रेस के साथ मैच हो सकते थे। कल्पना ने चार कड़े पैक करवाएं। इस तरह के कड़े वह अपने लिए भी लेना चाहती थी। यह कड़े कल्पना के मन को भा गये थे लेकिन वह अपनी खाली कलाई और खाली जीवन को देख उन कड़ो को वापिस कर दिया। इन कड़ो को मामी ने थाम लिया और कहा कि आज तो कंवारी लड़कियां भी पहनती हैं। आफिस जातें समय एक एक डाल लें। जब पसंद आ गये है तो क्यों छोड़ रही है। कल्पना ने मुस्करा कर ना में गर्दन हिला दी। मामी ने कहा कि ठीक है तुझे नहीं लेने तो मत ले। मैं ले रही हूं। कल्पना ने कहा कि ठीक है मामी तुम ले लो। कभी मन हुआ पहनने का तो मैं मांग लूंगी। मामी पैसे देने लगी तब तक कल्पना की नजर दूसरी दुकान में लगी बिंदी के एक पैकेट पर गयी। जिसमें सिर्फ दो ही बिंदी थी। छोटी सी दो गोल नग की बिंदी जो एक नग पर लाल नीले नग जड़ी थी। कल्पना को यह बिंदी ही थी जो पहली नजर में पसंद आ गयी थी। कल्पना ने उस दुकान वाले से उंगली के इशारे से कहा भैय्या यह बिंदी का पत्ता निकाल देना। दुकान वाले ने निकालने से पहले उसका रेट बता दिया। मैडम 35 रुपए का है यह पत्ता। अगर लेना है तो निकालू। कल्पना ने मामी से कहा कि मामी देखना मुझे यह बिंदी पसंद आई है। कैसी लगी? मामी ने कहा कि 35 रूपये की बिंदी एक महिना चलेगी। तू दो बिंदी के पीछे परेशान हो रही है। कल्पना ने कहा कि इस साड़ी पर अच्छी लगेगी। मामी ने कहा कि हां अच्छी तो लगेगी लेकिन तू करेंगी क्या? कड़े तो तुझसे पहने ना जातें तो बिंदी लगानी, और ये बिंदी लगानी तो तेरे बस से ही बाहर है। कल्पना ने 35 रूपये निकाले और वह पत्ता लें ही लिया। पत्ता लेने के बाद मामी उस गली से निकलते हुए कहने लगी कि कल्पना तुझे कोई पसंद है क्या? कल्पना तू अगर सच्चे मन से माता के व्रत कर रही है तो मेरी कसम तू सच सच बता। यह सब तू किसी और के लिए ही ले रही है या कहीं। कल्पना ने कहा कि मामी कहीं और क्या? मामी ने कहा कि तू कहीं बिना बताए किसी से ब्याह तो नहीं कर लेंगी। क्योंकि इतना महंगा सामान कोई किसी को देने के लिए तो नहीं लेता। कल्पना ने कहा कि नहीं मामी ऐसा नहीं है। यह सब देने के लिए ही खरीदा है। मेरी जिंदगी में अभी कोई ना आया है जो तुम्हारे जमाई का हक रखता हों। मामी ने कहा कि तू सांची कह है ना। कल्पना ने कहा कि मामी हां सच, जिस दिन अगर ऐसा कोई होगा तो कल्पना डंके की चोट पर उसे अपनाएगी। वह उसे कभी नहीं छिपाएंगी। लेकिन अभी कोई नहीं है। तुम खामखां डर रही हों। उस दिन मामी अपने घर और कल्पना अपने घर आ गयी। कल्पना ने घर में सब सामान अपनी मम्मी को दिखाया और कहा कि यह किसी के लिए लाई है। मम्मी ने कहा कि तेरी पसंद किसी दूसरे को पसंद आए ये जरूरी है क्या? सब इतना महंगा भी ले आई। कल्पना ने किसी को यह नहीं बताया था कि यह सब धीर और सपना के लिए है। वह सपने की मुस्कुराहट के पीछे दौड़ रही थी। यह बात धीर भी नहीं जानता था। कल्पना की मम्मी ने कहा कि अपने लिए भी कुछ लायी है। कल्पना ने कहा कि कुछ पसंद ही नहीं आया। कल्पना को पसंद तो आया था ‌ वह कड़े लेकिन वह हिचक में छोड़ आई। घर में सबको ही वह चार कड़े बहुत पसंद आए। मम्मी ने कहा कि ये कड़े मेरे लिए भी ले आती। कांच के है ज्यादा भारी भी नहीं है। मुझे तो यह बहुत पसंद आए। अबकी बार कभी जाए तो कड़े लेतीआए।

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