मुसकुराहट भाग -५

29 जून 2020   |  मंजू गीत   (297 बार पढ़ा जा चुका है)

अगले दिन कल्पना धीर से मिली। वह अपनी खुशी से लाए हुए सामान को देना चाहती थी फिर यह सोच कर रूक गई कि धीर अभी तो यही है। दो दिन बाद दे दुंगी लेकिन मन में सपना की शंका और धीर के सवाल के डर से वह उसे बता ही नहीं पाई। हालांकि वह खुश थी। कल्पना का मन होता कि वह उसे बनवाने के लिए दें दे कि आप दोनों इस तैयार करके पहन कर बच्चों के साथ एक फोटो भेजना। धीर कल्पना को अक्सर अपने परिवार की वह फोटो भेजता जो उसे पसंद होती। एक हंसती खिलखिलाती दुनिया की खनक सुनाई देती थी। जिसे धीर ने सपने सा नहीं हकीकत में माली बन बाग़ को संवारा सजाया होता। कल्पना यहीं सोच कर रह गई कि अभी आफिस में एक बहुत खास के बेटे की शादी है। और करवा चौथ का समय भी पास में है। दूसरा सपना का शक। पता नहीं दोनों इसें कैसे सोचें? साथ में दिवाली जैसे त्यौहार की लड़ी है। धीर दो दिन के लिए घर गया और सपना को करवा चौथ से लेकर दीवाली तक की काफी तैयारी करवा आया था। आते ही धीर ने कल्पना को सपना को खरीदवाई हुई साड़ी दिखाई। जिसमें लाल और हरी बार्डर वाली साड़ी देख कल्पना मन ही मन मुस्कराई। उस समय वह धीर से कहना चाहती थी कि आप दोनों के लिए मैंने कुछ लिया है पर कहने में संकोच कर गयी। कल्पना सिर्फ इतना ही कह पाई कितने की ली। धीर ने कहा बस न‌ पूछो , ले ली । अब जितने‌ की हों। अब काम में बिजी हूं इस बार जल्दी तो जा नहीं पाऊंगा। सपना से बोल आए हैं कि जल्दी ही आ जाऊंगा तब तक तैयार करके रखना। कल्पना खुश थी। वह धीर से कहना चाहती थी कि। मैंने खरीद कर रखी है। मैं बता भी ना पाई और आप झट पट खरीद कर दे भी आए। लेकिन वह खुश थी। कुछ दिन बाद शाम को शादी में जाना था तो कल्पना को लगा कि जब शाम धीर लेने या छोड़ने आएगा तो तब वह उसे वह साड़ी और पजामा दे देगी। लेकिन साथ में और दो लोगों को देख, कल्पना ने उस दिन भी बाहर में रखा वह सामान छोड़ दिया। कल्पना जब शादी से आई तो कल्पना की मम्मी ने पूछा कि तू ये साड़ी पजामा ले तो आई , इसे देकर तो अभी तक नहीं आई। कल्पना ने कहा कि यह जिस को देना है, उसे अभी दे ही नहीं पा रही हूं। किसी दिन जाकर दे आउंगी। दिन, त्यौहार भी बीत गए। दीवाली की शाम एक फोटो तो आई लेकिन अभी वह फोटो नहीं जों कल्पना के मन में थी। दिवाली से आने के बाद धीर को साड़ी और कुर्ता पजामा तो देना दूर कल्पना ने उसे मिठाई भी नहीं खिलाई। देने की हसरत कल्पना के मन में ही रह गई। कल्पना ने कभी सोचा नहीं था कि किसी को कुछ देना इतना मुश्किल कैसे होता है? कल्पना देने के लिए हाथ बढ़ाती लेकिन क्या कह कर दें बस यही सोच कर वह उस साड़ी पजामे को वापिस अलमारी में लाक कर देती। छठ के दिनों शाम को धीर उसके साथ था। कल्पना सोच रहीं थीं कि वह कल हर हाल में उस साड़ी और कुर्ता पजामा को दे देगी। वो कड़े बिंदी सब दे देगी। अगले दिन कल्पना ने एक बड़े से बैग में वह सब सामान रखा और निकल ली घर से, लेकिन स्टैंड पर वह एक घंटे तक खड़ी रही, बस ही नहीं आई। वह वापिस अपने घर लौट गयी। और एक बार फिर से उस सामान को अलमारी में रख वह ११ बजे की बस से काम में पहुंची। आज कल्पना उदास थी कि खुशी बांटना भी आसान नहीं होता है। कल्पना मन ही मन सोच रहीं थीं कि धीर की जगह अगर सपना उसके करीब होती तो वह कभी इतना न हिचकती। वह उसी शाम उसे जाकर दे देती लेकिन धीर को देना उसको संकोच से भर देता। यह संकोच इसलिए भी था कि वह एफ बी, वाट्स अप में आज के परिवेश के कपड़ों में छाई दिखाई देती थी। एक बार कल्पना ने सपना की तारीफ की नजर से कहा कि क्या बात मैडम छाई रहती है। तो धीर ने पलट कर कहा कि सब कोई तो कहता है कि तुम सपना को ज्यादा छूट दे रखें हों। अब तुम भी आग में घी डालने का काम कर रही हों। कल्पना ने कहा कि अगर धीर भी लोगों की बातों में आकर अपनी सपना को नहीं समझेगा तो वह और किससे उम्मीद करें। छूट दें रखीं हैं तो खुद को परेशान मत करो उसके साथ खुश हो ताकि उसकी खुशी दोगुनी हो कर उसके चेहरे की चमक को बढ़ाती रहें। एक दिन कल्पना के घर के पास किराए पर रहने वाली लड़की रंजना अपनी मम्मी के साथ उसके घर आई। कल्पना की मम्मी ने शादी के बाद घर आई रंजना को विदाई देने की बात कल्पना को बताई। पहले तो बात हुई कि 100 रूपए दे दिए जाएं। लेकिन कल्पना की मम्मी ने कहा कि रंजना बहुत सालों से घर आ जा रही है। अगर यह अलग जगह की है तो क्या हुआ, कम से कम एक सूट और पैंट शर्ट तो दे ही दे। कल्पना ने कहा कि इनके यहां पर यह सब पहनते नहीं है। अगर लेना ही है तो साड़ी दे दो। कल्पना की मम्मी ने कहा कि अब एक दम से कहां से साड़ी आएगी। कल्पना ने एक नजर नहीं बल्कि कई बार उस साड़ी और कुर्ता पजामा को देखा जिसे बड़े चाव से वह उसे बड़ी दूर और जतन से ढूंढ कर धीर और सपना के लिए लाई थी। कल्पना ने वह सब सामान निकाल कर अपनी मम्मी को दे दिया और कहा कि रंजना को यह सब देदे। उसे पसंद आएगा। एक बार के लिए कल्पना की मम्मी ने कहा कि इतना महंगा देकर क्या करेंगी कोई और देख ले। कल्पना ने कहा कि लोग हजारों, लाखों रुपए कन्या दान में भी तो दे देते हैं। आप इस पांच छह हजार को लेकर सोच रही हों। कल्पना सोच रहीं थीं कि धीर को मैं दे पाऊंगी, मुझे लगता नहीं। अगर दे पाती तो नवरात्रि से लेकर छठ के तीन दिन बाद तक यह मेरे पास रखा ना रहता। कल्पना उस सामान को लेकर रंजना के सामने रख दिया। कल्पना की मम्मी खुश तो नहीं हुई पर कुछ कह भी नहीं पाई। वह रंजना को 101 रुपए देकर बोली कि रंजना तुने शादी ही झारखंड में जाकर की है। बेटा हम इतनी दूर तों आ नहीं सकतें, इसलिए आज दे रही हूं। रंजना और उसकी मम्मी साड़ी और बिंदी, चूड़ियां, कड़े, कुर्ता पजामा देख कर कहने लगी कि कल्पना इतना सुंदर आप कहां से लेकर आई हों। यह तो बहुत महंगा है। कल्पना की मम्मी से वह कहने लगी कि यह सब कल्पना के लिए आप रखिए हम इसको नहीं लेंगे। बाप रे बाप इतना ये सब देना कोई जरूरी नहीं है। यह सब कल्पना की शादी के लिए रखिए। यह 101 रुपए ही बहुत है। और कुछ मत दीजिए। रंजना ने कहा कि आंटी आप यह सब वापिस ले लिजिए। मुझे यह कड़े बहुत मस्त लगे हैं। यह कड़े मैं रख लेती हूं। कल्पना ने कहा कि रंजना हाथ से दिया हुआ उपहार वापिस नहीं लिया जाता। हम लोगों की तरफ से अपनी शादी का पहला गिफ्ट सोच कर लें लो। कल्पना की मम्मी ने रंजना को देकर रंजना के सिर पर हाथ रखते हुए कहा कि बेटा जिसके नसीब को जों होता है। उसे वहीं मिलता है। कल्पना खुद पसंद करके लाई है। महिनें भर से रख कर बैठी है। कल्पना ने कहा कि यह दोनों के लिए है। इसे पहनना और मुझे फोटो भेजना नहीं तो तेरी खैर नहीं। रंजना उसे लेकर बहुत खुश हुई। कल्पना ने जिस छवि को देख उसे पूरा करने की सोची वह उसके मन की छवि से मेल न करपाई । जो सोचा वो होता कहां है। होता वही है जो होना होता है।

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