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धन्धा

26 जनवरी 2015

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भोर का समय था। ट्रेन के स्टेशन पर रूकते ही लोगों का चढना-उतरना शुरू हो गया था। उतरने वालों में कुछ लोग वे थे जिनका गंतव्य आ चुका था और कुछ वे जो गर्मी के मारे बेहाल थे तथा प्लेटफार्म पर ठंढी हवा में जी भर साँस लेना चाहते थे। चढनेवालों में कुछ यात्री थे तथा कुछ चायवाले, दातुन वाले, खोमचे वाले थे, जो सामान बेच रहे थे। शोरगुल काफी बढ गया था । शोर सुनकर मेरी आँखें खुल गईं। मैं जागकर बैठ गया। तभी मैंने देखा- चढनेवालों में एक भिखारी भी था, जो दुबला-पतला था और मैला कपडा पहने था। वह गूंगा था । ताली बजाकर लोंगो का ध्यान आकृष्ट कर वह उनके सामने खडा हो जाता था। जब वह मेरी पत्नी के सामने खडा हुआ तो उसे दया आ गई। उसने पर्स से दस रूपये का नोट निकाला और उसके डब्बे में रख दिया। उसके बाद वह आगे बढ गया। अगला आदमी उसे टरका दिया, “ जा हट, आगे बढ ”। वह आगे बढता गया, किसी ने पाँच रूपये, किसी ने दो रूपये.... किसी ने एक रूपये, लगभग सभी ने कुछ न कुछ अवश्य दिया। माँगते हुए वह कम्पार्टमेंट के अंतिम छोर पर पहुंच गया था । वहां एक आदमी उसे देखते ही भडक गया, “इसे कोई कुछ मत दो, स्साला ढोंगी है।... तू गूंगा है रे.... ? ” पहले तो वह भिखारी सहम गया, लेकिन अचानक उसके तेवर बदल गये। वह क्रोधित होकर बोल उठा, “तुझे नहीं देना है तो मत दे, पर धंधे पर लात मत मार....”। ...और वह तेजी से कम्पार्टमेंट से बाहर चला गया। हमारी आंखें खुली कि खुली रह गईं, हम आश्चर्यचकित रह गये और ठगा-सा महसूस करते हुए एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे।

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