कुछ अधूरी ज़िन्दगी,जो पूरी हुई

05 जुलाई 2020   |  Arun choudhary(sir)   (433 बार पढ़ा जा चुका है)

मै जब यह लिखने बैठा तो एक एक कर अतीत के पन्ने खुलते चले गए। मै आखिर एक सरकारी मुलाजिम रहा,मुझे सीमित आय में घर को व्यवस्थित चलाना पड़ता।उसके बाद कुछ बचा कर गांव में घर पर भेजना पड़ता । अजी सुनते हो कि आवाज़ आते ही मैंने झट लिखना बंद कर डायरी के पन्ने पलटने लगा। मुझे जरा बेसन ला दो,तो भजिए बना दूं। बेसन लाने के बाद फिर से लिखना शुरू किया।नौकरी के एक साल बाद ही शादी हो गई।रमा एक अच्छी पत्नी साबित हुई। गांव में सभी बोलते कि रमेश बड़े नसीब वाला है,जो ऐसी बीबी मिली।

समय के बीतने के साथ ही मै एक बेटे और एक बेटी का बाप बन गया।घर के खर्चे बढ़ते चले गए।मैंने एक पार्ट टाइम नौकरी और कर ली।रमा ने भी सिलाई करनी शुरू कर दी।बहुत ही संतुलित तरीके से गृहस्थी चल रही थी।दोनो बच्चों को कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाया।दो दो नौकरी करते हुए जल्दी ही मुझ पर बुढ़ापा हावी होने लगा।लेकिन क्या करता बच्चों को अच्छे कॉलेज में एडमिशन जो करना था।भगवान की कृपा से दोनों बच्चे पढ़ने में होशियार थे। इसी बीच मेरे मां बाप चल बसे।बेटे ने इंजीनियरिंग में और बेटी ने मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया।बेटे के लिए बाइक और बेटी के लिए स्कूटी की व्यवस्था करने के लिए लोन लिया। गांव की खेती जो थोड़ी बहुत ही थी ,बेच दी।और शहर में एक अवैध कॉलोनी में छोटा सा मकान बना लिया।रमा और मै सारी व्यवस्थाएं जुटाने में लगे रहे,भूल गए कि हमारी भी कोई ज़िन्दगी है।बेटे को बड़े महानगर में नौकरी लग गई।बेटी एम एस करने महानगर चली गई।हम दोनों अकेले ही समय काटने लगे।जल्दी ही रिटायरमेंट हो गया।अब तक मै पुरा थक चुका था। पर मुझे सुकून था कि मैंने फ़र्ज़ पूरे किए।अचानक बेटी ने लव मैरेज कर चौंका दिया।फिर भी सामाजिक तौर तरीके से उसका ब्याह तुरंत रचाया क्योंकि उसे पति के साथ अमेरिका पढ़ाई के लिए जाना था। लोन ले कर बेटे की भी शादी कर निवृत्त हो गए।

बेटे बेटी दोनों के यहां संतानें आ गई ,लेकिन पोते पोतियों का मुंह नहीं देख पाए अभी तक। उन्होनें आना जरूरी नहीं समझा और हम लोन की किस्तें भरने में लगे रहे।फिर आने जाने का खर्च कैसे वहन करते।बेटे से कभी पैसे मांगने की हिम्मत नहीं हुई और ना ही उसने कभी पैसे के लिए पूछा।मुझे शिकवा उनसे नहीं क्योंकि वो उनकी ज़िंदगी जी रहे हैं। घूमना फिरना , हॉटेल्स में खाना पीना,मूवी देखना,विदेश हो आना समय के साथ कर रहे है।मैंने मेरी ज़िन्दगी जी नहीं बल्कि खपा दी।साथ ही रमा की ज़िन्दगी खपाने का दोषी भी मै ही हूं।

लो जी फिर ख्वाबों में डूब गए भजिए तैयार है,चाय भी बना देती हूं। सुनते ही मेरी तंद्रा टूट गई।मैंने आंखों के कोरों से निकलते मध्यम आंसुओं को धीरे से पोछा और हाथ धोने चल दिया।मुझे बहुत खोफ्त महसूस हुई कि इसे देखो जरा भी मलाल नहीं । उसे बच्चों का सुख चैन देख कर बहुत खुशी है।लेकिन मैंने सोच लिया और हिम्मत कर घूमने के लिए ट्रैवल्स की बुकिंग करा ली। कल सुबह 5 बजे पूरी तैयारी से बस में बैठना है।सुन रही हो सामान पैक कर लो और हां दो हल्के कंबल जरूर साथ रख लेना।आज लगा मैंने रमा और मेरी ज़िन्दगी का फ़र्ज़ भी पूरा कर दिया।अब चैन से सुबह 4 बजे का अलार्म लगा कर सोऊंगा। गुड नाईट इसी के साथ डायरी बंद कर लैंप स्विच ऑफ कर दिया।


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ये सब अब 'नार्मल' सा हो गया है. आगे बढ़ते चलें अब पीछे क्या देखना है.

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