एक था बचपन भाग 1(संस्मरण)

09 जुलाई 2020   |  Arun choudhary(sir)   (345 बार पढ़ा जा चुका है)

मेरी कार भुसावल शहर से सुनसगांव के रास्ते पे तेजी से दौड़ रही थी,और मेरे दृष्टिपटल पर अतीत के सारे दृश्य एक एक कर फिल्म की भांति लगातार अंकित होते जा रहे थे।आसपास के चलते मकानों और पेड़ों को देख पुरानी यादें सामने खड़ी हो गई।आज 25 साल बाद मैं अपने ननिहाल जा रहा था ,क्योंकि नानी जी के स्वर्गवास के बाद वहां कोई नहीं था ।तीनों मामा नाशिक शहर में आ कर बस गए थे।हम तीनों भाई मम्मी के साथ बस से इसी रास्ते से जाते थे।खिड़की वाली सीट सम्हालने का मजा ही कुछ और था।बाहर झांकते हुए चलते हुए मकानों,पेड़ पौधों,जानवरों ,इंसानों को देख बड़ा ही आनंद आता था।आज कल के बच्चे तो कार में बैठ कर मोबाइल हाथ में ले रास्ता काट लेते हैं।प्रकृति के वास्तविक सौंदर्य का आनंद लेने का उन्हें समय कंहा।अचानक मेरे पैर ब्रेक पर जा टिके,और कार तुरंत एक खेत के पास पहुंच कर रुक गई।मै नीचे उतर कर पास ही कुंए की मुंडेर पर जा बैठा । घिर्री ,बाल्टी रस्सी सब गायब था।अब इन सबकी जरूरत क्यों,बस बटन दबाओ पानी बाहर।भरी दुपहरी में गर्मी के दिनों में आम के झाड़ के नीचे मटके में रखे ठंडे पानी को पीकर गला इतना तर हो गया जितना कोल्ड्रिंक्स से कभी ना होता।कब एक गहरी झपकी आ गई पता ही ना चला।क्या बात है भाऊ, खाना खाओगे क्या?

इतना सुनते ही मेरी तंद्रा भंग हुई।मैंने अपना परिचय दिया,तो उसने बताया कि वो मधुकर मामा की खेती सम्हालता है।तुरंत उसने एक बड़ा सा पपीता और कुछ कच्चे आम कार में रखवा दिए। मेरी कार एक बार फिर सड़क पर दौड़ रही थी ।तभी ऊंचाई पर अरविंद मामा का खेत दिखाई दिया ,और आगे मोड़ पे प्रकाश हाइस्कूल दिखाई दिया ।बस कुछ ही दूरी के फासले पे सुनस गांव

है। गांव में जैसे ही प्रवेश किया ,बहुत कुछ बदला सा पाया।जगह जगह टपरियों (गुमटियों) की जगह कुछ पक्की दुकानें सज गई थी।फिर भी कुछ सुना सा लग रहा था ।नयी पीढ़ी मुझे ना पहचान पाने को विवश थी,और मुझे पहचानने वाले गांव रिश्ते के मामा मामी अंदर घरों में कूलर की हवा का आनंद ले रहे थे।पहले कंहा कूलर होते थे।पेड़ के नीचे चारपाई (खाट) बिछा आराम हो जाता था।आई , मैं और दोनों भाई बस से उतरते,वैसे ही मैं तुरंत नानी (आजी) की हवेली की ओर दौड़ लगा देता।बीच में नशिराबादकर की दुकान के पास की संकरी गली से रिश्ते के मामा मामी, मासी,नाना नानी से बतियाते हुए सीधे नानी के डेहलक पे जा के कदम रुकते थे।(डेहलक ,एक बड़ा दरवाजा जो हवेली के सामने बड़े बरामदे में खुलता है।) वहां पंहुचते ही सबसे पहले पेमा मामा के दर्शन होते और रसोई में से चंद्रा मामी की मामा को कुछ हिदायत देती आवाजें आती।एक सांस में चार सीढ़ी चढ़ कर सीधे अंदर पहुंच आवाज लगा देता "आजी अम्हि आलो।"

हमारे बड़े मामा के बेटे बेटी, विजू दादा और अक्का ताई

हमारा इंतजार ही कर रहे होते।

आगे जारी है। भाग 2 में ।

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