अपनी भूलों से घबराएँ नहीं, उनसे शिक्षा लें

13 जुलाई 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (274 बार पढ़ा जा चुका है)

अपनी भूलों से घबराएँ नहीं,  उनसे शिक्षा लें

अपनी भूलों से घबराएँ नहीं, उनसे शिक्षा लें

हमारे पास किसी समस्या से त्रस्त होकर कंसल्टेशन के लिए जो लोग आते हैं तो कई बार वे प्रश्न कर बैठते हैं कि डॉ पूर्णिमा, हमने तो जीवन में कभी कोई भूल नहीं की – कभी कोई अपराध नहीं किया – फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है ? कल भी कुछ ऐसा ही हुआ | किन्हीं सज्जन से फोन पर बात हो रही थी और उनका यही प्रश्न था कि हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया, न ही कोई ऐसा कार्य किया जो हमें नहीं करना चाहिए था – फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है ? हमारा ऐसे लोगों को यही उत्तर होता है कि हर व्यक्ति जीवन में कुछ न कुछ ऐसा कर बैठता है जो उसे नही करना चाहिये | भूल करना, ग़लतियाँ करना मनुष्य का स्वभाव है – हममें से कोई भी इससे अछूता नहीं है | हम सभी जीवन में कभी न कभी जाने अनजाने ऐसा कर बैठते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए | देखा जाए तो ये भूलें - ये ग़लतियाँ मनुष्य की सबसे बड़ी गुरु होती हैं | ग़लतियाँ करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन बार बार उनको दोहराना वास्तव में अपराध की श्रेणी में आता है |

साथ ही हमें अपनी भूलों को हृदय से स्वीकार करना भी आना चाहिए | हमने कोई भूल की और उस भूल के लिए स्वयं को अपराधी मान लिया, या किसी अन्य व्यक्ति को उसके लिए अपराधी मान लिया, या परिस्थितियों पर उस भूल का ठीकरा फोड़ दिया तो ऐसा करके हम और एक भूल कर रहे हैं - और एक ग़लती कर रहे हैं | क्योंकि इससे हमारे द्वारा किया गया वह अपराध या वह भूल भूतकाल में जाकर सुधारी नहीं जा सकती | ऐसा करने की अपेक्षा उचित तो यही रहेगा कि हम अपनी उस भूल से एक सीख लें और भविष्य में उस भूल को यदि सुधारा भी नहीं जा सकता है तो कम से कम उसकी पुनरावृत्ति न करके अपने व्यवहार और स्वभाव में सुधार अवश्य कर सकते हैं |

जीवन में उन्नति के लिए – आगे बढ़ने के लिए - भूलें करना आवश्यक है | उनसे हमें शिक्षा प्राप्त होती है, कुछ अलग करने की – कुछ नया करने की - प्रेरणा प्राप्त होती है, हमारी बुद्धि और हमारे स्वभाव तथा व्यवहार में परिपक्वता आती है | प्रकृति का हर प्राणी अपनी उन्नति के क्रम में कभी न कभी कोई न कोई भूल अवश्य करता है - जब तक कि वह अपने कार्य में निपुण नहीं हो जाता |

कोई भी व्यक्ति प्रथम दिन से ही कुशल नहीं होता है | बार बार गिरता है, बार बार उसकी भूलों के लिए उसका तिरस्कार किया जाता है - उपेक्षा की जाती है – उसकी भूलों के कारण बार बार उसकी भावनाएँ आहत होती हैं - तब कहीं जाकर उसे अपने प्रयास में सफलता और कर्म में कुशलता प्राप्त होती है |

कुछ लोग अपनी बार बार होती भूलों और समस्याओं के कारण इतने भयभीत हो जाते हैं कि वे परिस्थितियों का सामना करने से ही घबराने लगते हैं - दूर भाग जाना चाहते हैं | एक बार असफल होकर फिर से प्रयास ही नहीं करना चाहते | जबकि शारीरिक स्तर पर नहीं, लेकिन मानसिक स्तर पर वे उसी कार्य को कर रहे होते हैं जिसमें उनकी किसी भूल के कारण उन्हें असफलता प्राप्त हुई है | हर पल वे इसी का विश्लेषण मन ही मन कर रहे होते हैं कि उनसे ऐसी क्या भूल हो गई जो उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा | तो क्यो न शारिरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर उस परिस्थिति को स्वीकार करके उस कार्य को पुनः करने का प्रयास किया जाए ? जो भूल पहले हुई है, प्रयास किया जाए कि वो फिर से न हो | उस भूल को सुधारने का प्रयास किया जाए और भूतकाल में न देखकर वर्तमान और भविष्य के विषय में विचार किया जाए |

वास्तविकता तो यह है कि हम लोग परिणाम की चिन्ता करते हैं इसलिए घबराते रहते हैं - भयभीत रहते हैं कि हमसे कुछ ग़लत न हो जाए | हम अपनी प्रतिष्ठा के प्रति इतने अधिक सचेत रहते हैं कि असफल हो जाने या उपेक्षित हो जाने के भय से प्रयास ही नहीं करना चाहते | जबकि होना यह चाहिए कि हम अच्छे से अच्छा प्रयास करें, परिणाम की चिन्ता किये बिना – या इस बात की चिन्ता किये बिना कि जो कार्य हम कर रहे हैं वह छोटे स्तर का है या बड़े स्तर का | स्तर का लेबल जहाँ लग गया वहाँ फिर प्रयास करना कठिन हो जाता है – क्योंकि वहाँ प्रश्न प्रतिष्ठा का हो जाता है |

ध्यान रहे कोई भी लक्ष्य छोटा या बड़ा नहीं होता, लेकिन उसके लिए जब प्रयास करते हैं तो मार्ग में इतने कुछ रोमाँचक क्षण होते हैं जो हमारे उत्साह वर्धन के लिए आवश्यक होते हैं | जब हम केवल लक्ष्य की ओर देखते हैं और मार्ग के समस्त रोमाँचों से भय खाते हैं तो बहुत कुछ नहीं कर पाते | इसलिए यदि जीवन में सफलता की कामना रखते हैं तो लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में हुई भूलों से घबराए बिना उनमें सुधार करते हुए और उनसे शिक्षा लेते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिये | ये ग़लतियाँ - ये जाने अनजाने की हुई भूलें - जीवन में उन्नति के मार्ग में चुनौती हैं, इनसे घबराकर इन्हें अपनी दुर्बलता न बनने दें, बल्कि इनसे सीख लेकर इन्हें अपनी शक्ति बनाएँ... जैसे एक नन्ही सी चींटी बार बार गिरकर भी अन्त में अपना भोजन अपने बिल तक पहुँचाने में समर्थ हो ही जाती है...

हम सभी अपनी भूलों से सीखते हुए आगे बढ़ते रहें यही कामना है..

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