कोरोना तो करोना, सांप भी पीछे नहीं!

14 जुलाई 2020   |  एंटोनी जोसफ   (2676 बार पढ़ा जा चुका है)

कोरोना तो करोना, सांप भी पीछे नहीं!




कोरोना तो करोना, सांप भी पीछे नहीं!

इस समय कोरोना ही नहीं सर्प भी लोगों का दुश्मन बना हुआ है. देश में इस समय मानसून और कोराना का दौर चल रहा है.कोरोना और सर्प का विष दोनो ही मनुष्य पर हावी है. कोरोना से मौत का सिलसिला हमारे देश में इस साल शुरू हुआ किन्तु पिछले बीस सालों में सांप के काटने से तकरीबन 12 लाख लोगों की मौत का अनुमान शोधकर्ताओ ने लगाया गया है जो कि चौकाने वाला है. शोध में इस बात का रहस्योदघाटन करते हुए कहा गया है कि सांप के काटने या सर्प दंश से मरने वाले तकरीबन आधे लोगों की उम्र 30 साल से 69 साल के बीच थी. मरने वालों में एक चौथाई बच्चे भी थे.सर्प दंश से होने वाली ज़्यादातर मौतों के लिए रसेल्स वाइपर (दुबोइया), करैत और नाग प्रजाति के सांप जि़म्मेदार हैं.इसके अलावा बारह ऐसी प्रजातियां भी हैं जिनसे कुछ अन्य लोगों की मौत हुई.सांप काटने के ज़्यादातर मामले इसलिए भी जानलेवा बन जाते हैं क्योंकि ये घटनाएं उन इलाकों में होती हैं जहां चिकित्सकीय सेवा आसानी से लोगो को नहीं मिल पाती. देश के कई इलाकों के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ भी सर्प काटने और उनसे होने वाली समस्या से जूझ रहा है. सर्प दंश की तकरीबन आधी घटनाएं मॉनसून के मौसम में होती हैं, यानी जून से सितंबर के बीच सर्प का आंतक सबसे ज्यादा होता है- माना जाता है कि इस दौरान सांप अपने बिलों से बाहर निकलते हैं.अधिकांश मामलों में सांप अपने शिकार के पैर में ही काटता है. भारत और दक्षिण एशिया में पाए जाने वाले रसेल्स वाइपर जिसे दुबोइया सांप भी कहते हैं. ख़तरनाक प्रजातियों में गिना जाता है.ये चूहे, गिलहरी जैसे कतरने वाले जानवर खाकर अपना पेट भरते हैं, अक्सर रिहाइशी इलाकों के आस-पास पाए जाते हैं.भारत में पाया जाने वाला करैत दिन की रोशनी में अमूमन शांत रहता है लेकिन रात ढलते ही ये ख़तरनाक़ हो जाता है. इसकी लंबाई पौने दो मीटर यानी पांच फुट नौ इंच तक हो सकती है. नाग सांप प्राय:अंधेरे में ही हमला करते हैं. सर्प दंश इतना ख़तरनाक़ होता है कि इंटरनल ब्लीडिंग की संभावना रहती है और फौरन मेडिकल हेल्प की ज़रूरत पड़ती है.रिसर्च स्टडी में ये भी पाया गया कि साल 2001 से साल 2014 के दरमियान सर्प दंश के तकरीबन 70 फीसदी मामले आठ राज्यों में हुए.ये राज्य हैं- बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना समेत), राजस्थान और गुजरात.इस स्टडी में यद्यपि छत्तीसगढ़ का नाम नहीं है लेकिन छत्तीसगढ़ के बहुत से इलाके सर्पदश से पीडि़त हैं तथा यहां इतने सांप है कि वह सर्पलोक से भी जाना जाता है. हाल में जब छत्तीसगढ़ में कोविड़ 19 की शुरूआत हुई थी तब यहां बाहर बनाये गये क्वावरेंटाइन सेंटरों में संाप के काटने और उससे होने वाली मौत का सिलसिला तो इतना बड़ गया था कि कोविड़ 19 से होने वाली मौत का आंकड़ा पीछे छूट गया था. छत्तीसगढ़ क्वारंटाइन सेंटरों में सांप काटने से मौत के ताजा आंकड़े तो प्राप्त नहीं हो पाये हैं लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि यहां के क्वारन्टाइन सेंटरों में अब तक सांप काटने से बीस से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. छत्तीसगढ़ में क्वारंटाइन सेंटरों में कोराना से बड़ा खौफ बने करैत (जहरीला सांप) रहे हैं. जांजगीर चांपा जिले के ग्राम पंचायत बुडग़हन के क्वारंटाइन सेंटर में जमीन पर सो रही महिला को सांप ने डस लिया. उसकी जान नहीं बचाई जा सकी. देशभर में संापो के काटने व उसके काटने से मरने वालों पर किये गये शोध से यह पता चला कि 70 साल से कम उम्र के लोगों की सर्प दंश से मृत्यु की संभावना 250 में से एक मामले में रहती है. लेकिन कुछ इलाकों में ये ख़तरा 100 में से एक मामले तक बढ़ जाता है.शोधकर्ताओं का कहना है कि बारिश के मौसम में गांवों में रहकर खेती-बाड़ी करने वालों पर सर्प दंश का सबसे ज़्यादा जोखिम रहता है.उनका कहना है कि इन इलाकों में लोगों को खेती-बाड़ी के दौरान सांप से सुरक्षित रहने के सामान्य तौर तरीके सिखाए जाने चाहिए. रबर के जूते, दस्ताने और टॉर्च से ख़तरा कम रहता है.विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा है कि सर्प दंश अब वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकता है. संगठन का निष्कर्ष है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के देशों में सर्प दंश के मामलों को नजऱअंदाज़ करने का चलन रहा है.डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़ दुनिया भर में हर साल सर्प दंश से 81 हज़ार से 138,000 लोगों की मौत हो जाती है. इस संख्या से तीन गुना बच तो जाते हैं लेकिन उनमें कुछ न कुछ स्वास्थ्य समस्या रह जाती है.





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