"सत्याग्रही हिंदी और विकास "

17 जुलाई 2020   |  सुखमंगल सिंह   (306 बार पढ़ा जा चुका है)

"सत्याग्रही हिंदी और विकास "

"सत्याग्रही हिंदी और विकास "

हिंदी बढती लो बिंदी चढती और हमें सिखाती |
समूह बना बोलियाँ मिलाती औ बाजार बढ़ाती ||
हिंदी पर बात हो, भाषा पर विचार हो ऐसे में बाल गंगाधर तिलक को कौन भूल सकता है | उनहोंने कहा है कि-'मैं उन लोगों में से हूँ जिनका विचार है और जो चाहते हैं कि हिंदी ही राष्ट्र भाषा हो सकती है '|
हिंदी को लेकर अब बिलाप करने की जरूरत नहीं है |हिंदी अब बाजार की भाषा बन गई है |(१) हिंदी संबैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा हिंदी है |चीनी और अंग्रेजी के बाद सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली हिंदी है | यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक भाषा है |(२) हिंदी को भारत में अमरीकी ,चायनीज और यूरोपीय कम्पनियां यह बेहतर ढंग से समझ रही हैं | वह जानते हैं कि जिस देश में अपना माल बेचना है |
अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए उनके स्थानीय भाषा में विश्वास करना होगा | उनकी भाषा को समझना होगा | यही कारण होगा कि यूरोप ,अमेरिका और चीन सहित विश्व के अन्य देशों के विश्व विद्द्यालयों में हिंदी के विभाग भी खुल चुके हैं | पढ़ाई होने लगी है | भारत में, विश्व के लगभग चालीस देशों के लोग हिंदी की शिक्षा ग्रहण करने भारत आ रहे हैं |
हिंदी की बढती चलन से व्यापार ,अनुवादक ,दुभाषिया ,पर्यटन क्षेत्र और मीडिया भी तेजी से हिंदी को बढाने वाला क्षेत्र होता जा रहा है |सोशल मीडिया हिंदी को बढाने में संवाहक का कार्य कर रहा है |(३)

"सत्याग्रही हिंदी और विकास "
विविध भाषाओं को समेटे चलती मचलती हिंदी | विविध भाषाओं को समेटे चलती मचलती हिंदी |
चारो दिशाओं को महकाती गमकाती हिंदी - विंदी ||
हिंदी की विशेषता यही है कि वह सभी भाषाओं को खुद में समाहित कर समृद्ध होती रही है | विद्वानों में भी हिंदी और हिन्दुस्तानी भाषा को लेकर विविधता है | हिंदी भाषा जहां संस्कृतनिष्ठ है वहीं हिन्दुस्तानी भाषा में अरबी,फारसी ,उर्दू और अब तो अंग्रेजी भी समाहित है | मगर हिंदी इससे कमजोर कतई नहीं हो रही है बल्कि सशक्त ही हो रही है |(४)
हिंदी को विश्व में समझने वालों की संख्या ८० करोड़ को पार कर गई है | जब की हिंदी के तथाकथित कुछ विद्वान् आज भी हिंदी राज भाषा है राष्ट्र भाषा नहीं का रोना रोते रहते हैं | सच भी है भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश की अपनी कोई राष्ट्र भाषा आजादी के अडसठ साल बीत जाने के बाद भी एकता की कमी से नहीं बनाई जा सकी है |
हिंदी को हिंदी भाषी विद्वानों ने ही बढ़ने में बाधा पहुचाई कारण जागरण की कमी रही | हम अब आपको साहित्य लेखन में पाली भाषा के (पाली के 'समण' ) शब्द की तरफ ले जाने की आवश्यकता समझता हूँ ,सार्थक सिद्ध होंगे जिसका मूल अर्थ है श्रम करने वाला ,और जिसने श्रम किया और फल प्राप्त किया है | कहने का अर्थ है श्रम से लक्ष तक पहुंचा जा सकता है | 'समण' (श्रमण) नामक संस्था बौद्ध काल से पहले से ही कार्य रूप में थी |यह शब्द सर्व प्रथम बृहदारण्यक में आता है |(५) कहने का तात्पर्य है कि हमें हिंदी को और बुलंदी पर ले जाने हेतु श्रम करना होगा | हमें त्यागी महापुरुषों से भी सीख लेने की आवश्यकता है , संगठनात्मक तरीके से हिंदी को बढाने पर बल देना होगा |
चारो दिशाओं को महकाती गमकाती हिंदी| हिंदी की विशेषता यही है कि वह सभी भाषाओं को अपने में समाहित कर चलती है |

"सत्याग्रही हिंदी और विकास "
हिंदी भाषी लोगों की संख्या निरंतर बढती रहेगी | वाराणसी गजेटियर में दर्ज रिपोर्ट वर्ष १९५१ की जनगणनानुसार हिन्दुस्तानी और उर्दू से सत्तरह गुना अधिक समृद्ध कही गई है |दस्तावेज में दर्ज सूचना के आधार पर हिंदी शुद्ध रूप से बोली और जानी जाने वाली भाषा है | जब कि हिन्दुस्तानी भाषा उर्दू और हिंदी का सम्मिश्रण है जो हिंदी को समृद्ध बनाने में मददगार साबित हुई है | वाराणसी के एक समाचार पात्र में पिछले वर्ष एक विद्वान् ने मत व्यक्त करते हुए कहा - 'हिंदी के में जब तक हिंदी राज्य भाषा से राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार नहीं की जायेगी तब तक हिंदी का विकास संभव नहीं '(६) उन्हें यह कहना चाहूंगा कि विश्व के विविध विश्व विद्यालयों में किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाने वाली भाषा हिंदी विदेशियों को भरतीय संस्कृति ,ज्योतिष ,वास्तु शास्त्र ,चित्रकला ,लोक - संगीत,गीत हिंदी फिल्में आदि में रुचि रखने वाले ही समझ सकते हैं | समझने वाले सुन रहे,देख रहे और समझ रहे हैं | वह हिंदी जो १५-२० वर्षों पहले पिछड़ेपन की निशानी समझी जाती रही आज बाजार के बल बूते पर बुलंदी की और बढ रही है |पृष्ठ ४

हिंदी भारत के बहुत बड़े भाग की साहित्यिक भाषा है | इस भू -भाग की अनेक ब्प्लियों से उत्तम साहित्य का निर्माण होता रहा है | इस देश के निर्माण में जनजीवन का साहित्य में बहुत बड़ा हाथ रहा है |(७)

स्वदेशी आन्दोलन ,बन्द्विच्छेद के विरोध में छिड़ने के बाद शक्तिशाली होता गया और उसने अखिलभारतीय रूप ले लिया जिससे राष्ट्रीय भावना बहुत व्यापक और सुदृढ़ बन गई | जन जागृति फैली शिक्षित समाज का ध्यान हिंदी की ओर बढ़ा |

इस जनजागरण आन्दोलन ने साहित्य और भाषा,संस्कृति,अपना शिल्प ,अपनी संस्कृति ,अपनी संगीत कला में पुनरुत्थान किया |(८)

हिंदी यद्यपि भारत की भाषा रही है परन्तु इसके विकास में विदेशियों के योगदान को कमतर नहीं आंका जा सकता है | विद्वान एडम गिलक्राइस्ट ने वर्ष १७८७ -९१ में इंग्लिश डिक्शनरी नाम से शब्दकोश 'हिन्दोस्तानी -इंगलिश डिक्शनरी 'दो खंडो में प्रकाशित कराया | गिलक्राइस्ट ने हिंदी का पहली बार वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया था | इसी क्रम में फ्रेंच विद्वान् गार्सा द तासी ने हिंदी साहित्य का पहला इतिहास लिखा और सर विलियम जोन्स ने बंगाल एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की |(९)

इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिंदीभाषी विद्वानों की कहीं न कही हिंदी को बढ़ाने में जागरण की कमी रही है | प्राय :युवाओं को मंचों से वंचित रखना ,बोलने की आजादी न देना ,समीक्षा ,पुस्तकों पर शुभकामना देने में विलम्ब ,युवा कवि/लेखकों के पांडुलिपियों को बहुत दिनों तक रोके रखना ,और उसपर नुक्ता निकाल कर लौटाना आदि से भी हिंदी साहित्य को आगे बढ़ने में रुकावट आई |

विद्यालयों में अकुशल अध्यापकों का दबाव में चयन ,आरक्षण से प्रभावित तथाकथित विद्वानों का प्रमोशन , कम अंक प्राप्त भी अध्यापको का चयन ,सहयोगात्मक भावनाओं की कमी रुकावट की कारण हो सकती है |

भारत में जो अंग्रेजी आज से लगभग दो सौ वर्ष पहले नहीं थी वह अंग्रेजी आज प्रगति और विज्ञान की महत्वाकांक्षी भाषा के रूप में जानी जा रही है | इसका प्रमुख कारण तेजी से बदल रहे युग का प्रभाव कहा जा सकता है | युग के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की अभिलाषा को पूर्ण करने में हिंदी सेतु का काम करे इसके लिए तकनीकी क्षेत्र में अंग्रेजी के अंग्रेजियत को थोड़ा कम कर हिंदी भाषा को बढाने के प्रयाद में हिंदी पर और ठोस कार्य करने की आवश्यकता पर बल देने की जरूरत है |

१- दैनिक जागरण पृष्ठ २,सितम्बर १४,२०१७ से साभार |
२- हिंदी विकिपीडिया जनवरी १६,२०१८ से साभार |
३- नंदकिशोर पाण्डेय ,निदेशक केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा |

प्रो. श्रद्धानन्द ,महात्मा काशी विद्या पीठ पूर्व विभागाध्यक्ष से साभार |
५- हिन्दू -सभ्यता पृष्ठ २५८ ले.राधा कुमुद मुखर्जी से साभार |

६- दैनिक जागरण सितम्बर १४,२०१७ से साभार |

7-प्राकथन ,हिंदी साहित्य का बृहद इतिहास सोलहवां भाग |

८-वहीअंक १,पृष्ठ ७ से साभार |

९-वाराणसी / दैनिक जागरणवर्ष २०१७ पृष्ठ २ से साभार |

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