उपेक्षा

18 जुलाई 2020   |  मंजू गीत   (291 बार पढ़ा जा चुका है)

वक्त की पुरानी अलमीरा से एक याद.. वक्त आने जाने का नाम है लेकिन आप अपने काम से वक्त के हिस्से से कुछ यादें संभाल कर रखते हैं। यही यादें हैं जो आपको बदलाव का आइना दिखाती है। कमरें के कोने से लेकर छत की धूप तक ले जाता था यह काम। खैर काम तो सर्द दर्द है। यही काम ही तो नहीं हो पा रहा था। काम का रोना ही तो वजह रही। काम के नाम पर वक्त के कोने के सिरों में सिर्फ झूठ बताया गया। सच था उसका भी कहना। उपेक्षा सच और झूठ के बीच की कशमकश में फंस कर तिलमिलायां करती। लेकिन व्यवहार उसे शांत कर ही लेता था। अनुभव जो था उसे। एक दोपहर उपेक्षा व्यवहार की जगह से बिन बताए उसी की दुनिया में होकर उससे दूर थी। आधा वक्त बीत गया था वह जब वह व्यवहार तक पहुंची। आज व्यवहार झल्लाकर कमरे में बैठे अपने मित्र बलराम के सामने अपना अबूझ दर्द बयान करने लगा। मुझे कोई ढंग का एम्प्लॉय नहीं मिला। मेरे विश्वास पर कोई खरा न उतरा। अगर मैं यहां वक्त से ना आऊं, आकर ताला ना खोलू तो इस जगह में ताला लग जाए। कोई भी काबिल नहीं मिला। मै अपने जैसा चाहता हूं पर सब कोई मुझे टापी पहनाने वाला मिला। सबको पैसा चाहिए कोई काम करने को तैयार नहीं। उपेक्षा व्यवहार की नजर से पहले उतरी या विश्वास से क्या फर्क पड़ता है? उसका तिरस्कार तो पहले ही हो चुका था। अब जरूरत भी कहां रह गई थी? खैर बहुत कुछ दिमाग में होता है पर कह नहीं पाते क्योंकि कहने वाले तेवर भी रखते हैं और तरीके भी। तजुर्बा और सबक उम्र नहीं हालात और साथ देने, छोड़ देने वाले दे जाते हैं लेकिन लोग कभी ग़लत नहीं होते। गलत सिर्फ वक्त, और अहम, वहम, समझ, फैसले होते हैं। वक्त ही बतायेगा कि ना जाने कब कौन आपके पीठ पीछे खंजर लिए खड़ा है या आपकी खुशहाली की कामना लिए परमात्मा के चरणों में हाथ जोड़कर बैठा है। किसी को ग़लत समझना उचित नहीं। सच्ची भावनाएं अगर गुस्से में निकल जाएं तो उन्हें यह मानकर स्वीकार किजिए कि विष निकल जाने के बाद सिर्फ अमृत बचता है। व्यवहार मन का सच्चा साथी है जो सच से अवगत करा जीवन सबक समझाया करता है।

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ए जिंदगी तू है तो रहस्य... तुझे तरस कहूं ,तुझे ओस कहूं तुझे पारस कहूं, तुझे नूर कहूं तुझे धारा कहूं, तुझे किनारा कहूं तुझे धानी चुनर कहूं , तुझे काली ओढ़नी कहूं तुझे आस कहूं, तुझे विश्वास कहूं तुझे रंग कहूं, तुझे जंग कहूं तुझे पतंग कहूं, तुझे बहता नीर कहूं तुझे उपहार कहूं, तुझे अभिशाप कहूं तुझे कर्म
21 जुलाई 2020
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