मुक्तक

20 जुलाई 2020   |  आलोक सिन्हा   (325 बार पढ़ा जा चुका है)

मुक्तक

भाग्य में अपने क्या बस काली रात है ,

नयन ने पाई आंसू की सौगात है |

बस ऊंचे पेड़ों तक आता उजियारा ,

गाँव में अपने उगता अजब प्रभात है

मैंने उगता छिपता सूरज देखा है ,

क्षितिज नहीं कुछ भी बस भ्रम की रेखा है

तुम शासन के प्रगति आंकड़े मत बांचो ,

भोग रहे जो बस वह असली लेखा है |

आलोक सिन्हा ---

http://aloksinha1508.blogspot.com/2020/07/blog-post_20.html

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Shashi Gupta
01 अगस्त 2020

वाह ! सादर प्रणाम

आलोक सिन्हा
22 जुलाई 2020

मनोज जी कहाँ हैं आप
शब्द नगरी बिलकुल सूनी हो गई है ।

अति सुन्दर गुरु जी, प्रणाम

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