मानव जीवन क्या है.....

जीवन क्या है..? या मृत्यु क्या है..? क्या कभी आपने इसे समझने की चेष्टा की है..? नहीं, जरूरत ही नहीं पड़ी। मनुष्य ऐसा ही है.. तो क्या सोच गलत है...जी बिल्कुल नहीं, ये तो मनुष्यगत स्वभाव है। जरा उनके बारे में सोचिए जिन्होंने हमें ज्ञान की बातें सिखाई। यदि उन्होंने चिंतन न किया होता तो हमें उनके अनुभवों का ज्ञान कैसे मिलता..? एक बात तो निश्चित है कि चिंतन मनन करना भी सबके बस की बात नहीं है। चिंतन वही कर सकता है जिसका आध्यात्मिक विकास हुआ है। जिन्हें अध्यात्म का ज्ञान है।

अध्यात्म से जुड़ते ही मनुष्य का सर्वांगीण विकास हो जाता है। उसके अंदर की सभी विसंगतियों का शमन हो जाता है। उसमें उदारता आ जाती है। वह स्वकेन्द्रित न होकर परमार्थ की ओर अग्रसर हो जाता है। उसे समझ में आजाता है कि सही मायने में ये 'जीवन और मृत्यु' क्या है?

मानव शरीर के बारे में संत तुलसीदास जी ने कहा है ➖

"बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा।

साधन् धाम मोक्ष कर द्वारा, पाई न जेहिं परलोक सँवारा।।"

अर्थात मनुष्य का शरीर बड़े ही भाग्य और जप - तप से प्राप्त होता है क्योंकि मानव शरीर पाना देवताओं के लिए भी दुर्लभ होता है अर्थात मानव शरीर के लिए देवता गण भी तरसते रहते हैं - लालायित रहते हैं | ऐसा इसलिए कि मानव शरीर एक ऐसा शरीर है जो जीव को मोक्ष के दरवाजे तक पहुँचाने के लिए समस्त मोक्ष साधनों का धाम या घर है। इस मानव शरीर को पाकर भी जो मनुष्य अपना परलोक सँवार नहीं लेता यानी अपने जीव का उद्धार तथा मुक्ति-अमरता नहीं पा लेता वही वहाँ परलोक में और यहाँ लोक में अपार दु:ख कष्ट पाता है। अर्थात उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।

आज भी अगर गोस्वामीजी के उपदेश को हम आत्मसात करते हैं और उनकी बताई हुई राह पर चलते हैं तो अवश्य ही अपने जीवन का उद्धार-कल्याण कराने में सफल हो सकते हैं। बहुत प्रयास और जप तप के पश्चात मानव शरीर प्राप्त होता है तो इसे व्यर्थ नहीं गवाना चाहिए। इसका सदुपयोग करना चाहिए। जीवन का सदुपयोग 'स्व' के त्याग में ही है अर्थात 'स्व' से ऊपर उठकर 'सर्व' या 'पर' को श्रेष्ठ मान लेना। ऐसे में स्वार्थ, अहंकार, लोभ, मोह - माया से मनुष्य रहित हो जाता है। सही मायने में यही जीवन होता है।

मैथिलीशरण गुप्त जी कहते हैं ➖

"विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,

मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।

हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,

मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।

वही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥"

अर्थात उस आदमी का जीना या मरना अर्थहीन है जो अपने स्वार्थ के लिए जीता या मरता है। जिस तरह से पशु का अस्तित्व सिर्फ अपने जीवन यापन के लिए होता है, मनुष्य का जीवन वैसा नहीं होना चाहिए। ऐसा जीवन जीने वाले कब जीते हैं और कब मरते हैं कोई ध्यान ही नहीं देता है। हमें दूसरों के लिए कुछ ऐसे काम करने चाहिए कि मरने के बाद भी लोग हमें याद रखें। साथ में हमें ये भी अहसास होना चाहिए कि हम अमर नहीं हैं। इससे हमारे अंदर से मृत्यु का भय चला जाता है। गुप्त जी ने कैसी मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ कहा है? जो मनुष्य दूसरों के लिए अच्छे काम कर जाता है उस मनुष्य को मरने के बाद भी लोग याद रखते हैं। ऐसी मृत्यु को ही सुमृत्यु कहा है।

ये तो हमारी चर्चा जीवन और मृत्यु को लेकर हुई। जीवन सार्थक बनाने के लिए क्या करना चाहिए…? और सुमृत्यु के लिए क्या करना चाहिए..? जन्म और मृत्यु के बीच के मँझधार में हर मानव फंसा हुआ है। गुत्थी सुलझती ही नहीं या यों कहें कि कोई सुलझाना ही नहीं चाहता है। हर कोई भौतिकता में ही संलिप्त है और उसी को सर्वोपरि मान लेता है। कुल मिलाकर कहा जाए तो परोपकार ही जीवन है और बुराइयों में संलिप्त रहना सदगति को बिगाड़ने और मृत्यु को वरण करने जैसा है। अतः मानवता का विकास अध्यात्म से ही संभव है।

"परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।"

गोस्वामी जी के अनुसार परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं और दूसरों को कष्ट देने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं है । परोपकार की भावना ही वास्तव में मनुष्य को ‘मनुष्य’ बनाती है । कभी किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते समय चेहरे पर व्याप्त सन्तुष्टि के भाव से जिस असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, वह अवर्णनीय है ।

किसी वास्तविक अभावग्रस्त व्यक्ति की नि:स्वार्थ भाव से सेवा और अभाव की पूर्ति करने के बाद जो सन्तुष्टि प्राप्त होती है, बह अकथनीय है । परोपकार से मानव के व्यक्तित्व का विकास होता है । इसीलिए तो मनीषियों ने परोपकार को ही जीवन बताया है। जो भी मनुष्य इन तथ्यों को व उसके मर्म को समझ जाता है उसका जीवन सँवर जाता है और वह सदभावना के साथ सत्कर्म की ओर अग्रसर हो जाता है। सही अर्थों में यही मानव जीवन का कर्म और धर्म है।

व्यक्ति ‘स्व’ की सीमित संकीर्ण भावनाओं की सीमा से निकलकर ‘पर’ के उदात्त धरातल पर खड़ा होता है, इससे उसकी आत्मा का विस्तार होता है और वह जन-जन के कल्याण की ओर अग्रसर होता है ।


प्रा. अशोक सिंह