‘‘फेक’’ ‘‘एनकाउंटर’’ को ‘‘वैध‘‘ बनाने के लिए ‘‘कानून‘ क्यों नहीं बना देना जाना चाहिए?

22 जुलाई 2020   |  राजीव खण्डेलवाल   (663 बार पढ़ा जा चुका है)

‘‘फेक’’ ‘‘एनकाउंटर’’ को ‘‘वैध‘‘ बनाने के लिए ‘‘कानून‘ क्यों नहीं बना देना जाना चाहिए?

‘‘विकास दुबे एनकाउंटर’’ (मुठभेड़) पूरे देश में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चित है। यह घटना न केवल स्वयं ‘‘सवालों में सवाल’’ लिये हुये है, बल्कि उपरोक्त ‘‘शीर्षक’’ प्रश्न भी पुनः उत्पन्न करता है। लगभग हर ‘एनकाउंटर’ के बाद उस पर हमेशा प्रश्नचिन्ह अवश्य लगते रहे हैं। उक्त ‘प्रश्नचिन्ह’ को कानूनी रूप से अप्रभावी करने के लिये ही एक कानून की आवश्यकता है, जिसकी चर्चा आगे कर रहा हंू। ‘विकास’ की जिस तरह व तरीके से एनकाउंटर में मौत (हत्या?) हुई है, उस घटना के पक्ष-विपक्ष में चर्चा होना लाजमी है। लेकिन अवश्य मैं यह मानता हूं कि, विकास के एनकाउंटर ने एनकाउंटर को वैधानिक रूप से ‘‘वैध’’ बनाने के लिए उसे कानून की सीमा में लाकर एक कानून बनाने की सोच व दृष्टि को जरूर पुनः उत्पन्न एवं ‘‘विकसित‘‘ कर दिया है। निश्चित रूप से अब यह समझ आ गया है जब कि, देश की केंद्र सरकार; प्रमुख कानूनविद; बुद्धिजीवी नागरिक वर्ग, रिटायर्ड वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गण और मीडिया सब मिलकर इस विषय (विवाद) पर गहनता से विचार विमर्श करें। ताकि एक ऐसा सही व अधिकतम लोगों को स्वीकार योग्य हल व रास्ता ‘‘विकसित’’ हो सकें, जिससे भविष्य में एनकाउंटर पर प्रश्नचिन्ह लगने या लगाने की कोई स्थिति ही न रह जाए। तब यह कानून या उस का भाग बनकर न्यायिक समीक्षा की विषय वस्तु हो जायेगी।

सबसे पहले इसके लिये आपको यह समझना होगा कि, आखिर एनकाउंटर होता क्या है? अपराधियों और पुलिस या अन्य सशस्त्र बलों के बीच हुई ‘हिंसात्मक झड़प’ में पुलिस द्वारा अपने ‘‘आत्मरक्षार्थ अपराधी को मार गिराना’’, ‘‘मुठभेड़ (एनकाउंटर)’’ कहलाता है। वर्ष 2014 में पी.यू.सील. विरूद्ध महाराष्ट्र राज्य में, माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा एवं आर. एफ. नरीमन की खंडपीठ ने एनकाउंटर के एक मामले में दिये गये अपने निर्णय में विस्तृत गाइड़लाइन दी है। जिसका पालन करना, एनकाउंटर करने वाली प्रत्येक पुलिस फोर्स या अन्य सशस्त्र बलों के लिए के लिए अनिवार्य है। इसमें अनिवार्य रूप से घटना की धारा 176 के अंतर्गत मजिस्ट्रीयल जांच भी शामिल है। मौत की सूचना मानवाधिकार आयोग को देना जरूरी है। सर्वप्रथम हवा में गोली चालन, फिर पैरा पर गोली मारना, तब उसके बाद मौत। एनकाउंटर में गोली चालन वाले पुलिस कर्मचारी को यह भी सिद्ध करना होता है कि, उसे आत्म रक्षार्थ गोली चलानी पड़ी। अन्यथा वह हत्या का दोषी पाया जा सकता है। साथ ही घटना में सीधी तौर पर शामिल पुलिस अधिकारियों को उनकी बारी आये बिना न तो ‘‘पदोन्नति’’ दी जायेगी और न ही ‘‘वीरता पुरस्कार’’। उपरोक्त उल्लेखित सहित कुल 16 दिशा निर्देशों के परिपालन करने की बात उक्त निर्णय में कही गई है।

विकास दुबे के मारे जाने को लेकर पूरे देश के नागरिकों का एक बड़ा वर्ग ‘‘उसकी ऐसी नियति को निश्चित एवं न्याय संगत मान कर ‘‘पुलिस द्वारा अपनाया गये तौर तरीके’’ से लगभग ‘‘एकमत’’ हैं। लेकिन यह एकमतता कैसी ? जब उनके बीच में से ही एक प्रभावी वर्ग विकास के एनकाउंटर में मारे जाने पर प्रश्नचिन्ह भी लगा रहा हो? ‘‘दर्शक दीर्घा’’ में बैठा हुआ तीसरा पक्ष, जिसमें अधिकांश रिटायर्ड पुलिस अधिकारी भी शामिल है, यह मानता है कि पुलिस के पास इसके अलावा अन्य कोई चारा (विकल्प) नहीं बचा था। एनकाउंटर के पूर्व खुखार दुर्दांत अपराधी विकास दुबे जिसके उपर 65 आपराधिक मुकदमें चल रहे थे, के द्वारा आठ पुलिस वालों की हत्या किए जाने से स्वाभाविकतः सर्वत्र गहरा छोभ उत्पन्न हुआ है। एक और दुस्साहस इसी दुबे का देखिये जब उसने लगभग 1़9 वर्ष पूर्व कोतवाली में ही स्टाफ के सामने राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त नेता संतोष शुक्ला की दिनदहाड़े हत्या कर दी थी। बावजूद इसके पुलिस के सिपाहियों की ही गवाहियाँ न मिल पाने के कारण न्यायालय से वह छूट गया था। इसीलिए त्वरित गति से की गई उक्त मुठभेड़ के द्वारा विकास दुबे का मामला निपटाये जाने से, ‘इन सब वीमत्स कांडो’ के कारण एक बड़ा वर्ग खुश हैं। वह उसे सही ठहरा रहा हैं। जिसे कुछ ‘ना नुकर’ के साथ उचित भी कहा जा सकता है।

लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के मुखिया, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘‘आपरेशन क्लीन’’ के तहत अभी तक 6126 एनकाउंटर द्वारा लगभग 2293 अपराधी सहित 122 से ज्यादा खंुखार दुर्दांत निर्दर्यी अपराधियों के मारे जाने को अपनी उपलब्धी बतलाई है। सिविल सोसाइटीज (सभ्य नागरिक समाज) में क्या लोकतांत्रिक शासन के स्तर पर फेक एनकाउंटर को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है? अतः यदि इसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना है तो, इसे कानूनन वैध बनाना ही होगा। वैसे भी नकली मुठभेड़ अंतर रेखा का न होकर आपकी सोच से उत्पन्न हुआ अंतर है। लेकिन इससे क्या एक खतरनाक व चिंताजनक निष्कर्ष यह नहीं निकलता है कि, खादी, खाकी व अपराधी के बीच परस्पर स्वार्थ का मजबूती के साथ जो गठजोड़ बना हुआ है, के कारण ही पूरी लचर होती न्याय व्यवस्था व प्रणाली न्याय दे पाने मंे असफल सिद्ध हो रही है? जहां अपराधी तो कानून की इन खामियों व विकलांगता का फायदा उठाकर न्यायालय से दोषमुक्त होकर स्वयं तो ‘‘न्याय’’ की प्राप्ति को महसूस कर लेता है। लेकिन ‘‘भुक्तभोगी’’ व नागरिकगण बिना किसी दोष व अपराध के ‘अन्याय’ का शिकार होकर भविष्य में भी शिकारी (अपराधी) के ‘‘शिकार’’ होते रहते है। शायद इसी कारण से न्याय का सरल सीधा उपरोक्त छोटा व (उपाय) रास्ता ‘एनकाउंटर’ का अपनाया जाता है। और इसीलिये अपराधी को अंततः न्याय पाने की गलियों के लम्बें रास्ते से मंजिल तक नहीं ले जाया जाता है। कभी-कभी तो न्यायालीन प्रक्रिया के चलने के दौरान ही अपराधी की मृत्यु भी हो जाती है। इसीलिए ‘‘न्याय में देरी न्याय से वंचित’’ की श्रेणी में आ जाती है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने आज ही विकास दुबे में सीबीआई जांच की मांग के संबंध दायर याचिका पर विचार करते हुये, तल्ख टिप्पणी की ‘‘हम इस बात से हैरान हैं कि विकास दुबे जैसे व्यक्ति को इतने सारे मामलों के बावजूद जमानत मिल गई......यह संस्थान की विफलता है.......यूपी सरकार को कानून का शासन बहाल रखना होगा। संस्थान की विफलता में क्या स्वयं न्यायपालिका शामिल नहीं है? इसी ड़र की वास्तविकता (परसेप्शन नहीं) व असफल न्याय व्यवस्था ने आज एनकाउंटर को सही ठहराने की अनुभूति (परसेप्शन) पैदा कर दी है। लगातार पूर्व में घटित ऐसी घटनाओं के होते रहने से, उपरोक्त घटना से तेजी से उत्पन्न ऐसे परसेप्शन से निपटने के दो ही रास्ते रह जाते हैं।

पहला, प्रथम सूचना पत्र (एफ.आई.आर.) दर्ज कर जांच से लेकर न्यायालय की अंतिम सीढ़ी तक अपराधी को अंतिम सजा दिलाने की जो लम्बी व वर्षो गुजरने वाली क्रिया, प्रक्रिया व न्यायिक प्रणाली है, उसमें ‘आमूल’ ‘चूल’ परिवर्तन किये जाने की तत्काल आवश्यकता है। ताकि न केवल भुक्तभोगी बल्कि अपराधी का भी न्याय देने वाली सुदृढ़ व त्वरित सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था पर आपराधी का विश्वास वापिस लाया जाकर उसका पूरा विश्वास अंतिम सीढ़ी तक बना रहें। सुदृढ़ न्याय व्यवस्था के रहते, (निर्दोष होने की स्थिति में) दोषमुक्ति के साथ-साथ अभियुक्तों के दिलों दिमाग में भी अपराध के प्रति सुनिश्चिित दंड की तलवार हमेशा लटके रहने से इतना भय ड़र अवश्य उत्पन्न होना चाहिये, ताकि अपराधी अपराध करने के प्रति विमुख होकर अपराध करने से बचे। मतलब अपराध करने के पहिले सौं-सौं बार वह अवश्य सोचे। लगभग निश्चित सजा होने के ड़र से वह अवश्य ही अपराध से दूर भागेगा। अब यह न्याय व्यवस्था कैसी ‘‘सुधरेगी’’। उसमें क्या-क्या सुधार होने चाहिए। इसके लिए एक पूरा लेख ही प्रथक से लिखना होगा, जिसकी फिर कभी चर्चा करेगें।

अतः अब दूसरा रास्ता क्या हो सकता है। जब तक कि न्यायिक प्रणाली में आवश्यक आमूल चूल परिवर्तन होकर वह वास्तविक न्याय देने में प्रभावी नहीं हो जाती है, तब तक फेक एनकाउंटर को ही वैध बनाने की कानूनी प्रक्रिया पूर्ण की जानी चाहिये। किन परिस्थितियों में, कितने गंभीर, वीभत्स, अपराध, के लिये अन्य खुखार अपराधी के साथ ही एनकाउंटर की भी विस्तृत रूप से परिभाषित कर देना चाहिए। तब एनकाउंटर पर कोई प्रश्न नहीं उठा पायेगां। साथ ही अपराधियों को दुर्दांत बनाने वाले गठजोड़ के समस्त सफेदपोश व्यक्तियों को भी भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी के समान उत्प्रेरक सहयोगी मानकर उन्हे भी दुर्दांत अपराधी के साथ ही एनकाउंटर की परिभाषा में शामिल करना चाहिये। ‘अपराधी’ के एनकाउंटर की परिभाषा की सीमा के निकट ंआने के ड़र से वह गहन अपराध करने से बचेगा, जिससे अपराध रूकेगें। एनकाउंटर को कानून द्वारा परिभाषित कर देने का एक फायदा यह भी होगा कि, राजनैतिक लोग अपने विरोधियों के खात्में के लिये पुलिस की सहायता से एनकाउंटर का दुरूपयोग नहीं कर पायेगें। उच्चतम न्यायालय ने भी अपने कई निर्णयों में (जैसा कि उपर उल्लेखित किया गया है) एनकाउंटर की परिस्थितियों के संबंध में जो व्यवस्था दी है, वह देश का कानून ही हो (माना) जाता है। तब प्रत्यक्ष रूप से कानून बना कर एनकाउंटर की स्पष्ट रूप से परिभाषित कर उसे वैध कर देने में क्या एवं क्यों आपत्ति होनी चाहिये? आज के समय की यह महती आवश्यकता है। जब हमारे देश में कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में एक व्यक्ति जिसे सामान्य रूप से अपराधी भी घोषित नहीं किया जाता है, बिना मुकदमा चलाये शांति व देश की सुरक्षा के खातिर एनएसए व अन्य निरोधक कानून के अंतर्गत पहली बार में अधिकतम छः महीनों के लिये निरूद्ध किया जा सकता है। इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के स्वतंत्रता के अधिकार को छीना जा सकता है। जब दुर्लभ से दुर्लभ परिस्थिति में हत्यारे को फाँसी (जीवन छीनना) दी जा सकती है। तब कोई दूसरा विकल्प न होने पर वही अनुच्छेद 21 के अधीन एक निर्दोष नागरिक के जीवन की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिये उन्ही दुर्लभ से दुर्लभ परिस्थतियों (को परिभाषित कर) में फरार या फरार होता हुआ अफराधी के ‘फेक’ एनकाउंटर को वैध क्यों नहीं घोषित किया जा सकता है, प्रश्न यह है?

कुछ लोग अवश्य इस आधार पर इस प्रस्तावित संशोधन पर आपत्ति कर सकते है कि, पुलिस के द्वारा इसका दुरूपयोग होने से निर्दोष व्यक्ति भी मारे (एनकाउंटर किये) जा सकते है। यह आशंकाएं व संभावनाएं, निर्मित हर कानून में अंर्तनिहित (विद्यमान) होती है। क्या अत्याचार अधिनियम का दुरूपयोग नहीं हो रहा है? क्या इसीलिए हमने उसको निरस्त कर दिया? इसीलिए वृहत समाज के हितों के निहितार्थ (रक्षार्थ) कुछ निर्दोषों के बलिदान की आशंकाओं के बावजूद भी कानून बनाये जाते थे, हैं, व रहेगें। इस सृष्टि में कोई भी प्रणाली पूर्ण सिद्ध नहीं है।

अब आप यह जरूर कहेगें कि फेक को वैध कैसे बनाया जा सकता है। दोनों शब्द विपरीत दिशा के है तो, उनके बीच गठजोड़ (फेक<->वैध) कैसे बनाया जा सकता है। वह इसलिये आवश्यक है कि हमारी आपराधिक प्रणाली में वर्त्तमान में भी एनकाउंटर (फेक नहीं) वैध है। एनकाउंटर के फेक होने का एक बड़ा कारण मुठभेड़ का लगभग एक से ही पैर्टन का होना भी है। वस्तुतः न्यायालय में पुलिस को प्रायः फेक को ही तो वैध सिद्ध करने का प्रयास करना होता है। एनकाउंटर नकली या नियमों के विरूद्ध ही होता है। यह बात महाभारत में कर्ण, दुर्योधन, भीष्म, द्रोणाचार्य, जयद्रथ के अधार्मिक तरीकें से मारे जाने से भी सिद्ध होती हैं। अधर्मी के साथ अधर्म करना, छल, कपट करना, व्यवहारिक नीति अपनाना सब नीति संगत है। विदुर नीति में भी यह कहा गया है। इसीलिए अधर्मी (घृणित अपराधी) को आधुनिक युग में मारने के लिये अधर्म (धर्म विरूद्ध) तरीके (मुठभेड़) को धर्म सम्मत (कानून का जामा पहनाकर) क्यों नहीं बना देते? ‘‘तब न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी’’!


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