भावनाओं का अत

01 अगस्त 2020   |  nishu ghanghoriya   (290 बार पढ़ा जा चुका है)


रक्षाबन्धन का र्पव समीप आ गया हैं जो भाई बहन के रिश्ते को पवित्र बनाता हैं परन्तु आज जिस तरह से लोगों के अंदर भावनाओं का विनाश हो रहा है उस तरह ये रिश्ते भी आखिरी सांस गिन रहें है ऐसा नहीं हे कि लोग समझते नही है वो जानते तो सब है, लेकिन अनजान बन के रहना चाहते हैं उन्हें ऐसा लगता है कि हमें किसी की जरूरत नहीं है बल्कि ये भूल जाते है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसे हर समय अपनो की जरूरत होती है मुझे तो अफसोस है कि हम आने वाली पीढ़ी को विरासत मे ये खोखलापन दे रहे तभी तो हमारी पीढ़ी भावनात्मक रूप से इतनी कमजोर है जो थोड़ी परेशानी से झिलाती है हमारा दायित्व है कि हम रिशतों को समझें और युवाओं को उनसे अवगत करवाये!

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tarun chadokar
19 अगस्त 2020

very nice keep writing

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