अर्जुन के तीर

09 अगस्त 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (434 बार पढ़ा जा चुका है)

अर्जुन के तीर

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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼


🏹 *अर्जुन के तीर* 🏹


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*यह संसार जितना विचित्र है उतने विचित्र यहाँ के प्राणी हैं फिर इन प्राणियों सर्वश्रेष्ठ मनुष्य की विचित्रता की तो थाह ही नहीं लगायी जा सकती है | यहाँ लोग एक दूसरे पर तञ्ज कसने के अवसर को कदापि नहीं छोड़ते हैं | यदि किसी को ईश्वर ने परिवार , धन सम्पत्ति आदि कुछ भी कम दिया है तो उसकी हिम्मत बढ़ाने की अपेक्षा लोग समय समय पर उस मनुष्य को उस कमी का एहसास कराते रहते हैं ! उवके इस कृत्य से उनको स्वयं को तो अवश्य आनन्द मिल जाता होगा परंतु जिसके ऊपर वे तञ्ज कसते हैं वह भीतर से टूट जाता है | ऐसा करने वालों के साथ ईश्वरीय न्याय भी विचित्र ही होता है जिसकी कल्पना भी नहीं होती है | यदि हम किसी के दु:ख को कम करने का साधन नहीं बन पाते हैं तो हमें किसी को दु:खी करने का भी अधिकार नहीं है | ईश्वर के विधान एवं मनुष्य के कर्मों के अनुसार ही उसको सब कुछ प्राप्त होता है इसका ध्यान सभी को प्रतिपल रखना चाहिए |*


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*शुभम् करोति कल्याणम्*


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सही बात है

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