ऐसा भी दिन आएगा कभी सोचा न था....

16 अगस्त 2020   |  अशोक सिंह 'अक्स'   (379 बार पढ़ा जा चुका है)

ऐसा भी दिन आएगा कभी सोचा न था….


सृष्टि के आदि से लेकर आजतक न कभी ऐसा हुआ था और शायद न कभी होगा….। जो लोग हमारे आसपास 80 वर्ष से अधिक आयु वाले जीवित बुजुर्ग हैं, आप दस मिनिट का समय निकालकर उनके पास बैठ जाइए और कोरोना की बात छेड़ दीजिए। आप देखेंगे कि आपका दस मिनिट का समय कैसे दो से तीन घंटे में बदल गया और पता भी नहीं चला। इस दरम्यान बुजुर्ग महाशय ने निश्चित ही आपको अपने दादा-परदादा के जमाने की बात से लेकर आजतक का पूरा ब्यौरा विस्तार पूर्वक नई अनुभूति के साथ बतला दिये होंगें। बेशक आपको मजा भी आएगा और ज्ञान भी प्राप्त होगा। आप उन तथ्यों के बारे में जान पाएंगे जिसे आपने कभी इतिहास में नहीं पढ़ा होगा। चाहे मुगलों का अत्याचार रहा हो या अंग्रजों की ज्यादतियाँ। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम की अनोखी और संघर्षमय कहानियाँ व घटनाएँ एकदम नये तरीके से जानने को मिलेगा। जिसमें ज्यादातर दृश्य व घटनाएँ आँखों देखा या फिर संस्मरण सी होंगी। वे बुजुर्ग आपको बतायेंगे कि वर्तमान समय में जो कोरोना महामारी वैश्विक बीमारी आई है वह कितना घातक है। वे भी कितना और किस तरह सहमें हुए हैं। दरअसल उनका सहमना लाज़मी है। जरा समाचार का कोई भी चैनेल लगा कर आप आधे घंटे के समाचार सुन लीजिए। मेरा दावा है कि आप भी कोरोना के बारे में सुनकर दहशत में आ जायेंगें। बार-बार बताया जाता है कि कोरोना 60 वर्ष से अधिक वालों के लिए ज्यादा खतरनाक है। इसके अलावा जो भी व्यक्ति उच्चरक्तचाप, मधुमेह, गुर्दे या दिल की बीमारी से ग्रसित है उनके लिए तो कोरोना खतरे की घंटी है। धूम्रपान करने वाले व मद्यपान करने वालों को भी सावधान किया जाता है। हर उस व्यक्ति को सचेत किया जा रहा है जिसकी रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या फिर जो भी व्यक्ति दमा या फेफड़े की बीमारी से जूझ रहा है। पर ये सारी बातें बेमानी सी लग रही हैं। आजकल जितनी भी मौतें कोरोना से हो रही है उसमें 70 प्रतिशत युवा हैं। अब क्या कहेंगे आप....?


दूसरी तरफ का जो परिदृश्य व घोर आर्थिक मंदी हमें कोरोना काल में देखने को मिल रहा है उसने सभी अटकलों व अनुमानों को गलत साबित कर दिया। इतना ही नहीं इतिहास में कोविड-19 का काला अध्याय जुड़ गया और हमारे लिए तो सदैव अविस्मरणीय ही रहेगा।

एक से बढ़कर एक मुसीबतें और आपदायें आई हैं पर जनजीवन इतना बुरी तरह कभी प्रभावित नहीं हुआ था। सोचिए जरा घर में कैद रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। निकलें भी तो मुँह बांधकर। मानव जो कि श्रेष्ठ कहलाता है। विज्ञान व तकनीकी से सबकुछ मुमकिन है पर कोरोना के आगे सब के सब फिसिद्दी साबित होते जा रहे हैं। हवाई जहाज, ट्रेन, यातायात सबकुछ बंद करने की जरूरत आ पड़ी। शासन - प्रशासन सब पस्त, अमीर पस्त, गरीब पस्त, उद्योग जगत पस्त, ज्ञानी-विज्ञानी सब के सब पस्त। यहाँ तक कि मंदिरों को भी बंद करना पड़ा। इतना खौफ़ जिसका अनुमान लगाना मुश्किल है। देश में स्कूल - कॉलेज 15 मार्च से ही बंद कर दिए गए। परीक्षाएँ टाल दी गई, निरस्त कर दी गई, छात्रों को प्रोन्नति दे दी गई। लगभग छ महीने बीतने को है और स्थिति अभी भी कुछ ठीक नहीं लग रही है। ऑनलाइन पढ़ाई और वर्क फ्रॉम होम के तर्ज पर काम हो रहा है। अतिआवश्यक सेवाओं को जारी रखा गया है जिससे कि आवश्यक वस्तुओं व स्वास्थ्य सेवाओं का कार्य जारी रहे। एहतियातन सरकार ने बहुत ही ठोस कदम उठाए। तालाबंदी करके अच्छा कार्य किया और इस दौरान अस्पताल से लेकर मेडिसिन की समुचित व्यवस्था युद्धस्तर पर किया गया। पर छह महीने बीतने के बाद भी खतरा कम नहीं हुआ है बल्कि अब खतरा और बढ़ गया है। अब तो और अधिक सतर्क और सावधान रहने की आवश्यकता है। कोरोना से जुड़े कुछ घटनाओं की ओर आप का ध्यान खींचना चाहता हूँ।

पहले तो मैंने भी इसे हल्के में ही लिया था पर आस-पास व करीबी घटनाओं ने पूरी तरह से हिला कर रख दिया है। मेरे ही महाविद्यालय की एक छात्रा थी जो टीवाईबीएससी में पढ़ती थी। वह कोरोना से ग्रसित हो गई थी और उसे मुंबई के नामी अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में लगभग पंद्रह दिनों तक ईलाज चला और उसके स्वास्थ्य में सुधार भी हुआ। अस्पताल से दो दिन बाद छुट्टी मिलने वाली थी पर उससे पहले ही उसका स्वर्गवास हो गया। सभी तरह की सुविधाओं के बीच होने के बाद भी नहीं बचाया जा सका। जबकि उसकी आयु भी मुश्किल से 20 वर्ष की। क्या कोरोना इतना खतरनाक है…? हो सकता है। मनुष्य डरता है पर जल्दी मानता नहीं है। यह भी नहीं सोचता है कि सरकार क्यों परेशान है। आखिर सबकुछ क्यों बंद रखा गया है..?

हमारे ही बिल्डिंग का एक सुपरवाइजर था। उसकी आयु लगभग 40 वर्ष रही होगी। उसको हल्का फुल्का जुखाम हुआ। उसने डॉक्टर को दिखाकर तीन दिन दवा लिया। चौथे दिन साँस लेने में तकलीफ होने लगी। अस्पताल में एडमिट हो गया। ईलाज चल रहा था। डॉक्टर ने बताया कि सेहत में सुधार हो रहा है। बहुत जल्दी ठीक हो जाएगा। दो दिन बाद वह स्वर्ग सिधार जाता है। दस दिन के भीतर ही सबकुछ खत्म। क्या कहेंगे…? सुनते ही पैर के नीचे की जमीन खिसक गई। ये क्या हो गया। ऐसे में तो डर लगना व डरना स्वाभाविक है।

एक लड़का छह महीने पहले मुंबई से अपने गाँव उत्तरप्रदेश चला गया था। वहीं वाराणसी में काम करता था। उसके छोटे भाई का तिलक सात जुलाई को था जिसके लिए वह घर पर आया था। एक सप्ताह के लिए घर पर ही रुक गया। पंद्रह जुलाई के आसपास एकदिन बारिश हो रही थी और वह भीग गया। उसे सर्दी जुखाम हो गया। छींक पर छींक आने लगा। लोकल डॉक्टर से दवा लिया पर हालत खराब होती गई। साँस लेने में तकलीफ होने लगी। अस्पताल में भर्ती किया गया। लगभग बीस दिन तक अस्पताल में ईलाज चला हालत में सुधार भी हुआ। अस्पताल से छुट्टी भी दे दिया गया। पर घर आने के लगभग आठ दस घंटे बाद साँस लेने में तकलीफ होने लगी और अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही निधन हो गया। उसकी भी आयु सिर्फ तीस वर्ष की थी। अब क्या कहेंगे आप…? ऐसे ही अनगिनत मामलें आ रहे हैं।

लोंगों को तो अब अस्पताल पर भी भरोसा नहीं हो रहा है। कई मामले में तो परिजनों ने अस्पताल में तोड़फोड़ किया, अस्पताल पर ही आरोप लगा डाले कि सही तरीके से ईलाज नहीं हुआ...आदि-आदि। पर ज्यादातर मामलों में मौत ब्रेथलेस होने के कारण हो रही है। कहने का मतलब ये है कि कोरोना महामारी के कारण फेफड़ा संक्रमित हो जाता है। साँस की तकलीफ होने लगती है। शरीर से ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगती है और अंततोगत्वा मौत हो जाती है।

अतः ये कहें कि अब जीवन अपने ही हाथ में है या तो फिर ईश्वर के हाथ में है। पर ईश्वर के भरोसे रहना मतलब आज के दौर में बेमौत मरना। इसलिए दूसरा रास्ता अपनाना उचित है। मुँह पर मास्क पहनकर रखिए। हाथ को नियमित अंतराल पर धोते रहिए। लोंगों से दूरियाँ बनाकर रखिए। आवश्यकता होने पर ही घर से बाहर निकलना चाहिए। कम खाओ, घर में रहो, आवश्यकताओं को सीमित रखो, निश्चित ही खतरे से दूर रहोगे। जो भी हमारे हाथ में है, एहतियातन उसे महत्त्व देना चाहिए। यदि हम अपनी सुरक्षा व बचाव के लिए प्रयासरत रहेंगें तो ईश्वर भी हमारा साथ अवश्य देंगे। सकारात्मक सोच के साथ नियमित रूप से योग करते हुए समय-समय पर गरम कुनकुने पानी का सेवन करना चाहिए। हो सकता है कि स्थिति और बदतर हो...हमें इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए….ये बात और है कि ऐसा भी दिन आएगा हमनें कभी सोचा न था… पर आज देख रहे हैं और झेल रहे हैं।


➖ प्रा.अशोक सिंह ...✒️

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