ऋषि पंचमी :- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 अगस्त 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (280 बार पढ़ा जा चुका है)

ऋषि पंचमी :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरती पर जन्म लेने के बाद मनुष्य जाने अनजाने में अनेक प्रकार के पाप एवं पुण्य किया करता है , जिसका फल उसको प्राप्त ही होता है | सनातन धर्म में ऐसे सभी पापों के प्रायश्चित के लिए विधान बनाये गये है | इस संसार में मनुष्य जीवन भर समस्याओं से जूझता रहता है यह सनातन धर्म की ही दिव्यता है कि यहां प्रत्येक समस्या का समाधान शास्त्रीय विधि से बताया गया है | जहां प्रत्येक पाप कर्म का प्रायश्चित किसी न किसी विधि से बताया गया है वही अनेक प्रकार के पापों का प्रायश्चित करने के लिए "ऋषि पंचमी" का व्रत करने का विधान सनातन धर्म में है | भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाए जाने वाला "ऋषि पंचमी" का व्रत अपने आप में महत्वपूर्ण है | यह व्रत अपने आप में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ब्रह्म हत्या के पाप को भी शमन कर देता है | पूर्व काल में जब इन्द्र को ब्रह्महत्या लगी तब उसका एक अंश नारी को भी रजोधर्म के रूप में मिला | जब नारी रजस्वला होती थी तब उसको अपवित्र माना जाता था और वह घर के सारे कार्य करना बंद कर देती थी | यहां तक की वह एकवस्त्रा को कर एकांत में चार दिन बिताती थी | यदि उससे अनजाने में घर की कोई वस्तु अशुद्ध हो जाती थी तो उसका प्रायश्चित करने के लिए "ऋषि पंचमी" का व्रत करने का विधान बताया गया है | इसके अतिरिक्त पुरुषों के लिए भी यह महत्वपूर्ण है क्योंकि पुरुष भी वर्षभर जाने अनजाने अनेक पाप कर्म किया करता है | इन पाप कर्मों का प्रायश्चित करने के लिए "ऋषि पंचमी" का व्रत अवश्य करना चाहिए | पूर्व काल में इसे पुरुष एवं नारी दोनों करते थे परंतु आज के समय में या तो जानकारी का अभाव या फिर व्यस्तता के कारण पुरुष वर्ग इस व्रत को करना भूल गया है परंतु नारियां आज भी इस व्रत को प्रायश्चित के रूप में अवश्य करती हैं | सनातन धर्म में कोई ऐसा कृत्य नहीं है जिसके प्रायश्चित का विधान न बताया गया हो परंतु जानकारी का अभाव ही है जिसके कारण मनुष्य इन दिव्य व्रतों के विषय में नहीं जानता है और अपने द्वारा किए गए पाप कर्मों का प्रायश्चित ना करके उसके दुष्परिणाम भोगता रहता है |*


*आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन किया जाने वाला "ऋषि पंचमी" का दिव्य व्रत अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है परंतु आज का मनुष्य इन व्रतों के विषय में जानता ही नहीं है क्योंकि समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन करने वाले बुजुर्ग आज के समाज से उपेक्षित होते जा रहे हैं | एकल परिवार की बढ़ती मान्यताओं के चलते आज बुजुर्गों को या तो घर में ही उपेक्षित कर दिया गया है या फिर उनको वृद्धाश्रम में छोड़ दिया जाता है जिसके कारण नई पीढ़ी पुरातन विधान को नहीं जान पाती है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ऋषि पंचमी के विधान के विषय में बताना चाहूंगा कि आज ऋषि पंचमी के दिन प्रातः काल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहन कर सप्तर्षियों के साथ अरुंधति का भी पूजन करना चाहिए | अपने घर के पूजा घर में सप्त ऋषियों का आवाहन करके उनका पूजन करते हुए अपने पापों के प्रायश्चित की प्रार्थना करनी चाहिए | आज के दिन यदि संभव हो तो सप्तर्षियों के रूप में सात संत महापुरुषों को अपने घर में निमंत्रित करके उनकी धूप आरती करते हुए भोजन कराकर तृप्त करना चाहिए | अंततोगत्वा दक्षिणा दे करके उनको विदा करते हुए जाने अनजाने में हुई पाप कर्मों के प्रायश्चित के निमित्य इस व्रत को पूर्ण करना चाहिए | परंतु आज के युग में मनुष्य इतना आधुनिक हो गया है कि वह परिवार के लिए , समाज के लिए तो सदैव कार्य करता रहता है परंतु अपने लिए कुछ भी करने का समय उसके पास नहीं होता है या फिर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य को जानकारी ही नहीं है | ज्ञान के अभाव में वह जीवन भर अपने अनर्गल कृत्यों के कारण कष्ट भोगा करता है और उसका सारा दोष समाज , परिवार एवं ईश्वर को लगाता रहता है | कोई भी ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान ना हो , कोई भी ऐसा रोग नहीं है जिसकी चिकित्सा ना हो , आवश्यकता है उसके विशेषज्ञ से परामर्श लेने की | परंतु आज का मनुष्य स्वयं को इतना ज्ञानी समझने लगा है कि वह किसी के पास परामर्श लेने के लिए जाना ही नहीं चाहता यही कारण है कि आज चारों अनाचार एवं पापाचार का साम्राज्य दिखाई पड़ता है |*


*सनातन धर्म में कोई भी ऐसा कृत्य नहीं है जिसका समाधान या परिहार ना बताया गया हो परंतु हम आज अपने धर्म ग्रंथों का ना तो अध्ययन करते हैं और ना ही अपने बुजुर्गों के पास बैठकर उनके विषय में जानना ही चाहते हैं और अनेकों कष्ट भोगते हुए जीवन व्यतीत कर देते हैं |*

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