इतनी बड़ी सज़ा

23 अगस्त 2020   |  Shashi Gupta   (312 बार पढ़ा जा चुका है)

इतनी बड़ी सज़ा



इतनी बड़ी सज़ा
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शहर की उस तंग गली में सुबह से ही तवायफ़ों के ऊपर तेजाब फेंके जाने से कोहराम मचा था। मौके पर तमाशाई जुटे हुये थे। कुछ उदारमना लोग यह हृदयविदारक दृश्य देख -- " हरे राम- हरे राम ! कैसा निर्दयी इंसान था.. ! सिर्फ़ इतना कह कन्नी काट ले रहे थे। "
एक दरिंदा जो इसी इलाके का हिस्ट्रीशीटर था। उसने इन चारों में से सबसे ख़ूबसूरत तवायफ़ को हिदायत दे रखी थी कि वह सिर्फ़ उसकी है। जिसके प्रतिउत्तर में तवायफ़ ने इतना ही कहा था-- उनके धंधे में सारे ग्राहक एक जैसे हैं और वे अपने सौदे में मिलावट नहीं किया करती हैं । इसी से नाराज वह युवक रात में छत की मुंडेर पर चढ़कर तेजाब फेंककर भाग गया था।
सभ्य समाज में तवायफ़ की मदद केलिए हाथ बढ़ाना संदेह के नज़रिए से देखा जाता है । भद्रजनों के शब्दकोश में उन्हें पतित प्राणी जो कहा गया है। जिनकी परछाई मात्र से दूसरों का धर्म भ्रष्ट हो जाता है। अतः कुछ तो यह भी कह अपनी प्रसन्नता जता रहे थे कि चलो ग्रह कटा, पूरे मुहल्ले में इन नर्तकियों ने गंदगी फैला रखी थी।
थोड़े ही देर में पुलिस संग मीडियाकर्मी भी पहुँच गये थे। उनके लिए यह आज की सबसे बड़ी मसालेदार ख़बर थी। सो, वे खंडहरनुमा गंदगी से भरे मकान में नाक दबाये जा घुसे। सारे दृश्यों को फोटोग्राफर दनादन अपने कैमरे में कैद किये जा रहे थे और तेजाब कांड से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश होने लगी थी। पुलिस भी झुलसी हुईं नर्तकियों को अस्पताल पहुँचा आगे की कार्रवाई में जुट गयी थी ।
उधर ,अस्पताल बूढ़ी बाई के करुण क्रंदन से काँप उठा था । मानों चारों लड़कियाँ उसकी सगी पुत्रियाँ हो, वैसे भी इन चारों का इस बाई के अतिरिक्त और कोई हितैषी नहीं था। ज़िस्मफरोशी के दलदल में फंसने के बाद वे अपने जन्मदाता तक को भूल चुकी थीं।
और आज उसी की आँखों के समक्ष इनमें से एक ने दम तोड़ दिया तो दूसरी भी तड़प रही थी। बचना उसका नामुमक़िन था, फिर भी यह बूढ़ी औरत वार्ड में कभी डाक्टर से तो कभी नर्सों से उसकी रक्षा केलिए मिन्नतें करती रही। वे तवायफ़ थी,अतः इनके प्रति उनमें भी कोई सहानुभूति नहीं थी।
कोठे पर जो लोग उनकी जूतियाँ सीधी किया करते थे। गुलाबो, चमेली और पारो जैसे सुंदर सम्बोधन से इन्हें लुभाते थे। उनमें से एक भी सहायता केलिए नहीं दिख रहा था। जनता के वे रहनुमा जो चर्चित घटनाओं पर आश्वासनों की गठरी लिए मौके पर पहुँच जाते हैं। उनके लिए भी ये सभी ग़ैर थीं ,क्यों कि वे इंसान नहीं तवायफ़ थीं ।
झुलसी हुई इन लड़कियों की चीख-पुकार और अपनी बेबसी पर बूढ़ी बाई के आँखें बार-बार छलछला उठती थीं। बड़ी ही दीनता के साथ उस बुढ़िया ने पत्रकारों की ओर देखा , परंतु वे तो इसलिए वार्ड का चक्कर मार रहे थें कि दूसरी वाली नर्तकी के दम तोड़ते ही ख़बर अपडेट करा सकें, क्यों कि डाक्टरों ने बता रखा था कि नब्बे प्रतिशत बर्न है।
उधर, अन्य दो नर्तकियाँ जो कम जली हुई थीं। वे भयभीत आँखों से चारों ओर इसतरह से देख रही थीं , मानों वह शैतान यहीं कहीं छिपा हो । वे कभी अपने बदसूरत हो चुके ज़िस्म पर नज़र डाल विचलित हो चींख उठतीं तो कभी ख़ामोश आँखों को ऊपर की ओर टिका देती थीं । जैसे पूछ रही हो - " ख़ुदाया ! हम दीनों को तू इतना क्यों सता रहा है ? "
उनके अश्रुपूरित नेत्रों में अनेक प्रश्न थे। वे जानना चाहती थीं कि क़िस्मत ने उन्हें जिस ज़िस्मफरोशी के धंधे में ला पटका , क्या उसमें उन्होंने किसी प्रकार की मिलावट की ,जो यह भयानक दण्ड मिला ?
हाँ, जीविका केलिए वे कुछ रुपये पैदा करती हैं,परंतु उन तवायफ़ों ने ज़िस्म के सौदे में ग्राहकों संग कोई मिलावट तो नहीं किया । वे राजा - रंक दोनों को एक जैसा बिना भेदभाव के अपना ज़िंदा गोश्त परोसती हैं। अपनी सिसकियों को छुपा कर अपना ज़िस्म हर रोज़ इनके समक्ष बिखेरती हैं। शरीर भले ही उनका मैला हो चुका हो, परंतु ग्राहकों संग सौदा उनका उतना ही साफ़ होता है।
और वे लोग जो उनकी कोठियों पर पूरी रात पशुओं की तरह उनके बदन को निचोड़ते हैं। इनमें से कोई अफ़सर तो कोई संत होता है। इनके दोहरे चरित्र पर किसी ने नहीं धिक्कारा, इन्हें तो मान-प्रतिष्ठा और सभी भौतिक सुख प्राप्त है, जबकि वे तवायफ़ इस मिलावट से दूर रह कर भी समाज केलिए कलंक हैं ..?
हाँ, वे सवाल करती हैं- " यह कैसा न्याय है तुम्हारा ईश्वर ! और आज तुम इतने निर्दयी कैसे हो गये। जो दो मर गयीं ,वे तो तुम्हारी इस मिलावटी, दिखावटी और बनावटी दुनिया से मुक्त हो गयीं , परंतु अब हमदोनों का क्या होगा ? इज्ज़त भरी ज़िदगी की ख्वाहिश तो हमारी तुमने कभी पूरी नहीं की। हम जब कली से कुसुम भी न बनी थीं , तब तुम्हारे इसी सभ्य संसार के भद्रजनों के पाँवों तले रौंदी गयी थीं और अब झुलसा हुआ यह बदसूरत ज़िस्म लिए हम अपने एकमात्र आश्रयस्थल इस कोठे से भी बाहर सिर्फ़ और सिर्फ़ भीख मांगने को विवश होंगे ? बोलो, क्यों मिली हमें इतनी बड़ी सज़ा ? "
उनके सवाल वार्ड की दीवार से टकरा कर लौट आ रहे थे, शायद ईश्वर के पास भी उसका जवाब नहीं था..।

-व्याकुल पथिक

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