संतान सप्तमी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 अगस्त 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (263 बार पढ़ा जा चुका है)

संतान सप्तमी :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा देश भारत एवं हमारी भारतीय संस्कृति इतनी दिव्य है जिसका वर्णन कर पाना असंभव है | हमारे पूर्वज महापुरुषों ने मानव मात्र के कल्याण के लिए इतने नियम एवं विधान बता दिए हैं जिसे करने के बाद मनुष्य को और कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं हैं | जीवन के प्रत्येक अंग , जीवन की प्रत्येक बिधा के लिए हमारे महर्षियों ने विधान बनाये हैं | यह विधान हमको पर्व / त्यौहार एवं व्रत के रूप में प्राप्त होते हैं | इसी के अंतर्गत आज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को "संतान सप्तमी" का व्रत किया जाता है | संतान की प्राप्ति एवं आजीवन उनकी रक्षा के लिए माता पिता के द्वारा बड़ी ही भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है | प्रातःकाल सूर्योदय होने पर यह व्रत प्रारम्भ किया जाता है | स्नान करके भगवान शिव पार्वती की मूर्ति स्थापित कर विधिवत उनका पूजन करने के बाद उनकी मूर्ति पर एक रक्षासूत्र लपेटा जाता है | यह पूजन करके तब साधक मध्याह्नकाल में जलपान कर सकता है | सायंकालीन बेला एक बार पुन: भगवान शिव पार्वती का पूजन करके अपने व्रत का समापन करें तथा शिव पार्वती की मूर्ति पर बंधा हुआ रक्षा सूत्र खोल कर अपनी संतान के हाथों में बांध देना चाहिए | "संतान सप्तमी" का व्रत करके संतान तो प्राप्त ही किया जा सकता है साथ ही संतान की रक्षा / सुरक्षा के लिए भी यह व्रत परम कल्याणकारी है | किसी भी व्रत का परिणाम मनुष्य की श्रद्धा एवं भक्ति के ऊपर निर्भर करता है जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसको वैसा ही फल मिलता है | "संतान सप्तमी" का व्रत हमारे पुराणों में वर्णित है | स्वयं भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि हे युधिष्ठिर जब कंस के द्वारा हमारी मैया देवकी के पुत्रों का वध किया जा रहा था तब लोमश ऋषि ने वसुदेव देवकी को "संतान सप्तमी" का व्रत करने का निर्देश दिया था | तब मेरे माता-पिता अर्थात वसुदेव देवकी ने "संतान सप्तमी" का व्रत किया और मेरे साथ साथ अपने सभी मृत पुत्रों को भी पुनः प्राप्त कर लिया | इस प्रकार "संतान सप्तमी" का व्रत अपने आप में सनातन संस्कृति का अनुपम उदाहरण है |*


*आज प्रत्येक मनुष्य आधुनिकता की चकाचौंध में जीवन व्यतीत कर रहा है ` आज का मनुष्य करना तो सब चाहता है , पाना सब चाहता है परंतु श्रद्धा का अभाव सबके ही हृदय में है | आज प्रत्येक मनुष्य प्रायः यह शिकायत करता रहता है कि हमने यह व्रत किया परंतु इसका यथोचित परिणाम नहीं प्राप्त हुआ | यदि किसी भी व्रत का यथोचित परिणाम नहीं प्राप्त होता है तो यह मान लेना चाहिए की कमी उस व्रत में नहीं बल्कि हमारे हृदय की श्रद्धा एवं हमारे विधान में हो गई है | सनातन धर्म के व्रत एवं पर्व स्वयं में दिव्य एवं अलौकिक हैं इनका पालन करके हमारे पूर्वजों ने बहुत कुछ प्राप्त किया है | आज यदि हमको कुछ भी नहीं प्राप्त हो पा रहा है तो उसका कारण हम स्वयं हैं , हमारे हृदय से खिसकती हुई श्रद्धा एवं विश्वास है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के युग में देख रहा हूं कि लोग अनेकों व्रत एवं पर्व करते तो हैं परंतु उनके हृदय में श्रद्धा और विश्वास का अभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है | किसी भी अनुष्ठान एवं व्रत को आज भव्यता तो प्राप्त हुई है परंतु हृदय में श्रद्धा की कमी भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है | आज अधिकतर व्रत एक दूसरे की देखा देखी एवं दिखावे के लिए किए जा रहे हैं | चलिए यह भी ठीक है कम से कम दिखावे के लिए व्रत किया तो जा रहा है परंतु परिणाम तब तक नहीं प्राप्त हो सकता है जब तक हृदय में पूर्ण श्रद्धा एवं व्रत के प्रति दृढ़ विश्वास ना हो | किसी भी व्रत को यह सच्ची श्रद्धा एवं पूर्ण विश्वास के साथ किया जाय तो उसका फल मानव मात्र को अवश्य प्राप्त होता है |*


*"संतान सप्तमी" का व्रत स्वयं में दिव्य है , किसी भी प्राणी को यह फल प्रदान करने में सक्षम है | जिस प्रकार देवकी मैया के मृतक पुत्रों को वापस करने में यह व्रत सक्षम था उसी प्रकार आज भी यदि कोई विधि विधान के साथ इस व्रत को करता है तो उसका फल अवश्य प्राप्त होता है |*

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