गीता और जैन दर्शन

26 अगस्त 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (294 बार पढ़ा जा चुका है)

गीता और जैन दर्शन

पर्यूषण पर्व चल रहे हैं, और आज भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण की परा शक्ति श्री राधा जी का जन्मदिवस राधा अष्टमी भी है – सर्वप्रथम सभी को श्री राधा अष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ...

गीता गायक भगवान श्री कृष्ण... पर्यूषण पर्व के चलते गत कुछ दिवसों से मन में विचार घुमड़ रहा था कि क्या गीता दर्शन और जैन दर्शन के विचारों में किसी प्रकार का साम्य कहीं दृष्टिगत होता है या दोनों दर्शन पूर्ण रूप से परस्पर विरोधी दर्शन हैं ? किन्तु फिर विचार उत्पन्न हुआ कि समस्त भारतीय दर्शन क्योंकि भारतीय विचारकों की सोच का ही परिणाम हैं इसलिये प्रत्येक भारतीय दर्शन का मूल तो निश्चित रूप से एक ही होगा | तो यही तथ्य गीता और जैन दर्शनों के साथ भी है | सम्भव है कुछ पाठकों को आश्चर्य हो कि “गीता और जैन दर्शन” – एक वैदिक दर्शन और दूसरा अवैदिक दर्शन – दोनों में भला क्या साम्य हो सकता है ? किन्तु इसी तथ्य ने मुझ जैसी सामान्य बुद्धि अध्येता को आकर्षित किया इस विषय पर ध्यान देने के लिये | क्योंकि भारत के विचारकों ने जगत्, जीव और ईश्वर के विषय में जो चिन्तन किया है उसकी एक अत्यन्त प्राचीन, विशाल एवं व्यापक परम्परा रही है | और इतना ही नहीं, यह चिन्तन निरन्तर विकासशील रहा है तथा भारत की सीमा के पार जाकर भी विकसित हुआ है | मानव की सतत जिज्ञासा निरन्तर उस परम तत्व को जानने का प्रयत्न करती रही है और आज भी उसका रहस्य जान लेने के लिये प्रयत्नशील है | यह परम तत्व एक ऐसी अनबुझ पहेली है जिसे सुलझाने के लिये ही विविध दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत हुए हैं |

आध्यात्मिकता का यह विकास और विस्तार क्रमिक रूप में हुआ | इस क्रम के प्रथम चरण में अविद्या और अज्ञान को मिटाने का प्रयत्न हुआ | दूसरे चरण में विशुद्ध ज्ञान की प्राप्ति का प्रयत्न हुआ | और तृतीय चरण में अन्तिम कारण की खोज की गई | अनेकों धर्माचार्यों और सम्प्रदायों ने इसमें अपना अपना योगदान दिया और परम सत्य के अन्वेषण का प्रयत्न किया | आचार्यों ने जिस जिस ढंग से सत्यान्वेषण किया उसी उसी व्यवस्था और शैली से अपने अपने मत का प्रतिपादन किया | इन सत्यान्वेषी सम्प्रदायों के दो प्रमुख वर्ग हैं : एक वे जो वेदों को प्रमाण मानने के कारण वैदिक सम्प्रदाय कहलाते हैं, और दूसरे वे जो वेदों की प्रामाणिकता न मानने के कारण अवैदिक सम्प्रदाय कहलाते हैं | सभी जानते हैं कि गीता वैदिक दर्शन का प्रतिपादन करती है और जैन दर्शन अवैदिक दर्शन माना जाता है |

भारतीय दर्शन में सर्वत्र दो अंश दृष्टिगोचर होते हैं : एक तर्क एवं कल्पनामूलक चिन्तन का, और दूसरा अनुभवमूलक चिन्तन का | बुद्धि तर्क और कल्पना के द्वारा जिज्ञासा का समाधान करती है | किन्तु जब यही समाधान आचरण और सद्भाव द्वारा होता है तब यह अनुभवमूलक उपलब्धि होती है | सभी दर्शनों का – चाहे वे वैदिक हों या अवैदिक – अन्तिम लक्ष्य बुद्धि, तर्क और कल्पना से भी ऊपर उठकर अनुभव द्वारा ही सत्यान्वेषण करना है | गीता और जैन दर्शन दोनों ही इस दृश्यमान जगत को किसी भौतिक द्रव्य से निर्मित स्वीकार करते हैं और वे इसे अनुभूयमान मानने के साथ साथ विज्ञान का स्वरूप भी मानते हैं | दोनों की ही दृष्टि में यह आरोपित सत्ता है और स्थूल स्तर पर इसमें जो भिन्नता दीख पड़ती है वह भिन्नता मायिक है | संसार के सभी पदार्थ मृग तृष्णा के जल अथवा स्वप्न की सृष्टि के समान केवल भ्रान्ति हैं | अतः मन, इन्द्रियों और शरीर के द्वारा होने वाले सभी कर्मों में कर्तापन के अभिमान से रहित होने का उपदेश दोनों ही दर्शनों में है | केवल परार्थ के लिये ही कर्म करना और सिद्धि असिद्धि दोनों ही में समता का भाव रखना दोनों ही दर्शन अनिवार्य मानते हैं | इस प्रकार निष्काम कर्म योग दोनों को ही स्वीकार है |

दोनों की ही धारणा है कि साधन के क्षेत्र में सभी का समान अधिकार है | सभी साधन परायण होकर परम गति को प्राप्त कर सकते हैं | कैवल्य ज्ञान और कैवल्य मोक्ष साधना के द्वारा कोई भी प्राणी प्राप्त कर सकता है | संसार में जन्म और मरण का एक स्वाभाविक क्रम है जो कर्मानुसार चलता रहता है | मुक्तात्मा का स्वरूप बताते हुए गीता का मत है कि जिसकी इन्द्रिय, मन और बुद्धि मोक्ष परायण हैं तथा जो इच्छा भय और क्रोध से दूर है वही मुक्त है | भगवान महावीर गीता की इस व्याख्या का साकार विग्रह ही हैं | गीता के अनुसार निष्काम भावना से कर्म करने वाला ही वास्तव में योगी है | जैन आचारांग सूत्र में भी मुनि और योगी की परिभाषा इसके समानान्तर ही है जिसके अनुसार पूर्ण रूप से समता का भाव आए बिना कोई भी सिद्ध योगी, सिद्ध भक्त अथवा सिद्ध ज्ञानी नहीं समझा जा सकता | जीव को भी भौतिक विकार, कूटस्थ नित्य और एकमात्र अखण्ड चेतना का उपाधिगत स्वरूप माना गया है | जीव तत्त्व सर्वोपरि प्रतिष्ठित और शाश्वत तत्व है | यह चेतन लक्षण वाला है, ज्ञाता-दृष्टा है और अनन्त गुणों से सम्पन्न है | चेतना वह प्रकाश है जिसमें चेतन-अचेतन सभी पदार्थों को प्रकाशित करने की शक्ति है |

ईश्वर के विषय में गीता और जैन दर्शन की मान्यताओं में कर्तृत्व के सम्बन्ध में अन्तर अवश्य है, पर ऐसा मतभेद तो सांख्य और मीमांसा भी प्रकट करते हैं – यद्यपि ये दोनों ही वैदिक दर्शन हैं | ये दोनों वैदिक दर्शन की उसी प्रकार कर्मवादी परम्पराएँ हैं जैसे जैन दर्शन | गीता सांख्य और मीमांसा में मतभेद नहीं मानती, अतः जैन सिद्धान्त से भी कर्मवाद के विषय में गीता का कोई तात्विक मतभेद नहीं माना जा सकता |

आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व दोनों को ही स्वीकार है | आत्मा जन्म मरण के चक्र में रहते हुए भी स्वयम् अपने स्वरूप में अखण्ड रहता है | जीव के परिणामी नित्यत्व पर घटने वाली यह उपमा दोनों स्थलों पर एक ही प्रतीत होती है | इसके द्वारा प्रत्येक जिज्ञासु और साधक अपने तर्क का समाधान यथार्थ रूप में पा लेता है | पुनर्जन्म दोनों स्वीकार करते हैं | देहान्तरप्राप्ति स्वाभाविक है | इसीलिये धीर पुरुष विसंवाद उत्पन्न नहीं होने देते | जैसे नाटक देखकर उसकी घटनाओं को आत्मसात् करने से दुःख सुख की अनुभूति तो होती ही है, स्वस्थ मनोरंजन भी होता है | सर्वज्ञ सभी हो सकते हैं – अतः किसी को यह धारणा बनाने का अधिकार नहीं है कि सर्वज्ञ कोई विशेष व्यक्ति ही हो सकता है | मुक्तात्माओं का पुनरागमन नहीं होता – गीता और जैन दर्शन दोनों ही इसे स्वीकार करते हैं |

दार्शनिक और सैद्धान्तिक दृष्टि से गम्भीर अभ्यासी को गीता और जैन दर्शन में ऐसा साम्य दिखाई देता है कि वह दोनों को एक दूसरे की आत्मा मान लेता है | इन दोनों में साधनात्मक समन्वय भी है | मोक्ष दोनों का ही लक्ष्य है | इस लक्ष्य की सिद्धि का साधन गीता के अनुसार अनासक्ति है और जैन दर्शन के अनुसार उसका पर्याय – त्याग | अनासक्त साधक सन्यास द्वारा मुनि पद प्राप्त करता है और निष्कर्म होकर परम सिद्धि को प्राप्त करके संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है | नियत कर्म की सफलता के प्रति भी जिसका विराग भाव ही रहता है वही कैवल्य ज्ञानी है |

गीता और जैन दर्शन दोनों ही समता दृष्टि को स्वीकार करते हैं | क्योंकि समभावी साधक वीर और स्थितप्रज्ञ होता है | स्थितप्रज्ञ अर्थात वह व्यक्ति जिसे ज्ञान की परम अनुभूति हो चुकी है | गीता और जैन दर्शन दोनों के ही अनुसार जो पुरुष मन में आने वाली सभी कामनाओं का त्याग कर अपने आत्म भाव में ही सन्तुष्ट रहता है, वह पुरुष स्थिरप्रज्ञ कहलाता है | जो सुख-दु:ख सभी परिस्थितियों में समान रहता है, जिसे न तो सुख लुभा सकता है, और न ही दु:ख विचलित कर सकता है, वह पुरुष जिसे सुख की अनुभूति के लिए बाहरी असत्य वस्तुओं पर आश्रित रहने की आवश्यकता नहीं है स्थिरप्रज्ञ कहलाता है | ज्ञान की इस अवस्था को प्राप्त पुरुष अपने अन्दर ही पूर्ण सुख की खोज कर लेता है | उसके लिए न तो कोई शुभ वस्तु प्रसन्नता लाती है और न ही दु:खी करने वाली वस्तु दु:ख का बोध कराती है | इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि स्थिरप्रज्ञ के जीवन में कोई रस ही नहीं होता । वस्तुत: जीवन में परम आनन्द की अनुभूति केवल स्थितप्रज्ञ को ही होती है, क्योंकि वह क्षणिक आनन्द देने वाली बाहरी वस्तुओं पर आश्रित नहीं है | अनासक्त होने के कारण हर्ष शोक से रहित होता है | निश्चल श्रद्धा दोनों में स्वीकार की गई है | वीरता, सत्य, ब्रह्मचर्य, विवेक, जागृति, अप्रमाद और सहिष्णुता से ही सम्यक् ज्ञान – (अर्थात सद्रूप का शंकाविहीन और वास्तविक ज्ञान - ऐसा ज्ञान जो हमें स्वयं का परिचय कराता है और पदार्थ को नहीं बल्कि परमार्थ को सुख मानता है - आत्मतत्त्व के अथवा वास्तविक कल्याण साधन के मार्ग का ज्ञान, तथा सम्यक् ज्ञान के द्वारा सम्यक् चरित्र - यथाशक्ति परहितसाधनपरायण रहना) - की उपलब्धि होती है |

स्याद्वाद जैन दर्शन का सर्वोत्तम अंग है | इसे अपेक्षावाद भी कहा जाता है | यह वाद पदार्थों की अलग अलग भूमिकाएँ व्यक्त करता है | इसी सन्दर्भ में अनेकान्तवाद साधक को यह अवसर देता है कि वह अपना दृष्टिकोण देखकर मान्यता भेद रखते हुए भी विरोधी सिद्धान्त को अविरोधी रीति से विकसित होने का अवसर दे | गीता के निष्काम कर्म का भी यही प्रयोजन है | और गीता के संन्यास का भी यही माहात्म्य है | तपश्चर्या, इन्द्रिय संयम, व्रत उपवास, एकान्तवास और आत्मलीनता, अपरिग्रह आदि दोनों ही साधक आवश्यक मानते हैं | “पिण्डे सो ब्रह्माण्डे” इस लोकोक्ति के अनुसार पिण्ड के विचार में आत्मौपम्य और ब्रह्माण्ड के विचार में आत्मैक्य की भावना को ही गीता और जैन दर्शन अध्यात्म विद्या की प्रेरक मानते हैं | आत्मौपम्य की दृष्टि समता की भावना लाती है | और आत्मैक्य की भावना से ब्रह्म भावना का विकास होता है | दोनों ही भावनाएँ अन्ततोगत्वा अहिंसा को सिद्ध करती हैं | जैन मान्यता के अनुसार प्रमत्तयोग से किसी भी प्राण के नाश का प्रयत्न और अनुमोदन – चाहे वह मन, वाणी या कर्म किसी से भी हो – जाने अनजाने जैसे भी हो – हिंसा ही कहलाएगा | कषायसहित अवस्था को प्रमाद कहते हैं । कषायसहित आत्मा का परिणाम प्रमत्त कहलाता है | इस प्रमत्त का योग अर्थात कषाय सहित परिणामों से मन-वचन-काय की क्रिया प्रमत्तयोग है । इसी प्रकार गीता भी स्थावर अथवा जंगम दोनों ही जीवों की हिंसा को हिंसा ही मानती है | अतः अहिंसा दोनों का ही लक्ष्य है |

सिद्धान्तों के अतिरिक्त कथनों की भी समानता है | जैसे आत्मा से ही आत्मा का उद्धार होता है, तथा आत्मा ही आत्मा का शत्रु है | आत्मदान करो | जब आत्मा ही आत्मा का शत्रु अथवा मित्र है तो बाहर उसकी खोज कैसी ? इत्यादि इत्यादि...

इस प्रकार गीता और जैन दर्शन दोनों ने जगत, जीव और ईश्वर के सम्बन्ध में समान दृष्टि से सम्यक् चिन्तन किया है | दोनों की शक्ति, भूमिका, दृष्टि और साधन भिन्न हो सकते हैं – परन्तु सत्य की शोध का आग्रह एक जैसा ही है

एक बार पुनः सभी को श्री राधा अष्टमी की अनेकशः हार्दिक शुभकामनाएँ... सभी समवेत स्वर में कहें...

मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी, त्रिवेदभारतीश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी |
रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी, ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते ||

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