शिक्षक दिवस

04 सितम्बर 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (422 बार पढ़ा जा चुका है)

शिक्षक दिवस

शिक्षक दिवस

कल पाँच सितम्बर है – शिक्षक दिवस से सम्बन्धित बैठकों, काव्य सन्ध्याओं, साहित्य सन्ध्याओं और अन्य प्रकार के कार्यक्रम आरम्भ हो चुके हैं | सर्वप्रथम सभी को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ...

जीवन में प्रगति पथ पर अग्रसर होने और सफलता प्राप्त करने के लिए शिक्षा के महत्त्व से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता, और ये भी सत्य है कि न केवल जीव की बल्कि प्राणिमात्र की सबसे प्रथम गुरु माँ होती है | उसके बाद पिता और विद्यालय के शिक्षकों का भी बराबर का योगदान होता है | प्राचीन काल से ही गुरुओं का हमारे जीवन में बड़ा योगदान रहा है क्योंकि ये शिक्षक ही देश के भविष्य को आकार प्रदान करते हैं | गुरुओं से प्राप्त ज्ञान और मार्गदर्शन से ही हम सफलता के शिखर तक पहुँच सकते हैं | यही कारण है कि डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन 5 सितम्बर शिक्षक दिवस के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है - क्योंकि वे स्वयं एक शिक्षक भी थे और साथ ही देश के प्रथम उप राष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति होने के साथ साथ एक महान दार्शनिक भी थे |

वास्तव में शिक्षक ईश्वर का दिया हुआ वह उपहार है जो सदा ही किसी भी प्रकार के स्वार्थ और भेद-भाव रहित व्यवहार से बच्चों को अच्छे बुरे का ज्ञान कराता है | एक शिक्षक अपनी ज्ञान रूपी गंगा में स्नान करा कर व्यक्ति को अच्छा नागरिक बनाने की दिशा में प्रयास करता है | इसी कारण से हमारे यहाँ सदा से शिक्षक दिवस पर गुरुओं के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रथा गुरु पूर्णिमा के रूप में रही है | लेकिन कालान्तर में यह परम्परा केवल कलाओं के कुछ घरानों या संस्कृत पाठशालाओं तक सीमित होकर रह गई | क्योंकि जिस समय की ये परम्परा है उस समय शिक्षक बिना किसी धनादि के लोभ के शिक्षण कार्य किया करते थे और उन शिक्षकों के जीवन यापन का उत्तरदायित्व गृहस्थों पर हुआ करता था | आज प्रतियोगिता के युग में इतना सम्भव नहीं इसलिए शिक्षक दिवस आज वास्तव में बहुत अधिक प्रासंगिक जान पड़ता है - बशर्ते कि व्यावसायिक मनोवृत्ति से आज का शिक्षक स्वयं को मुक्त कर ले |

वास्तव में शिक्षक केवल ज्ञान का दीपक ही नहीं जलाते, वरन माता के समान शिष्य को अपने स्नेह की वर्षा से सींचते भी हैं तो किसी भूल पर पिता के समान ताड़ना भी करते हैं | जीवन संघर्षों से लड़कर विजयी होना भी सिखाते हैं तो आदर्श बनकर पथ प्रदर्शन भी करते हैं | शिक्षक स्वयं सदाचरण का पालन कर शिष्यों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं | इनकी छाया में उत्थान पलता है, पुष्पित होता है और अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है | एक ऐसा गुरु जो होता है चाणक्य, संदीपन और कन्हैया के जैसा - जिनसे चन्द्रगुप्त, कृष्ण और अर्जुन जैसे शिष्य जन्म लेते हैं | लेकिन बात फिर वहीं आ जाती है कि शिक्षा के व्यावसायीकरण से बचने की आवश्यकता है, तभी शिष्य गुरु का सम्मान करना सीखेंगे और तभी गुरु पूर्ण तल्लीनता से शिष्य का वर्तमान और भविष्य प्रकाशित कर सकेंगे |

आज कुछ माता पिता विद्यालयों और कॉलेजेज़ की बढ़ी हुई फीस के विरोध में स्वर मुखर करते हैं | करना भी चाहिए, क्योंकि जिस तरह से फीस में बढ़ोतरी होती जा रही है उस तरह से तो शिक्षा केवल पूँजीपतियों की जागीर बनकर रह जाएगी | एक औसत दर्ज़े की नौकरी करने वाला व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छे स्कूल कॉलेज में पढ़ाने का बस सपना भर ही देख पाएगा | लेकिन क्या इसके लिए माता पिता दोषी नहीं हैं ?

आज हमें अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए महँगी वातानुकूलित बसें चाहिएँ, वातानुकूलित क्लासरूम्स चाहिएँ, बढ़िया मल्टीक्यूज़िन कैफेटेरिया चाहिएँ स्कूल्स में | और तो और, आज किसी भी विद्यालय के अच्छा होने के सर्टिफिकेट के रूप में वार्षिकोत्सव के दौरान किसी बड़ी सेलिब्रिटी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाना, पिकनिक के लिए किसी ऐसे स्थान पर बच्चों को ले जाना जहाँ पाँच सितारा सुविधाएँ उपलब्ध हों, बढ़िया स्वीमिंग पूल्स होना इत्यादि आवश्यक योग्यताएँ बन गई हैं | अब इतनी सारी सुविधाएँ जो विद्यालय देगा उसकी फीस भी उतनी ही अधिक होगी - प्रबन्ध समिति या विद्यालय के मालिक लोग अपनी ज़ेबों से तो ये सारे ख़र्च उठाएँगे नहीं | पर इस तरह के सुविधासम्पन्न विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजकर उनका कितना बड़ा नुकसान हम कर रहे हैं इस विषय में कोई नहीं सोचता | घरों में भी सुविधाएँ और विद्यालयों में भी पाँच सितारा सुविधाएँ - बच्चा कैसे रफ एण्ड टफ बनेगा ? इसीलिए जब विद्यालयों से निकलकर संघर्ष के दिन आते हैं तो ये ही बच्चे डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं - क्योंकि धरातल पर तो हमने उन्हें रहने ही नहीं दिया |

इधर कुछ समय से एक और भी मानसिकता युक्त तथाकथित "इंग्लिश मीडियम" वाला वर्ग पनप रहा है | यदि किसी विद्यालय का नाम हिन्दी में है और वहाँ बच्चों को पुस्तकीय ज्ञान तथा परीक्षा में उत्तीर्ण होने के प्रयास के साथ साथ भारतीय संस्कारों और जीवन के क्रियात्मक तथा व्यावहारिक पक्ष को भी उन्नत करने का अवसर प्रदान किया जाता है तो उस विद्यालय के लिए मान लिया जाता है कि वह पिछड़ा हुआ विद्यालय है और वहाँ "अच्छे" परिवारों के बच्चों को नहीं जाना चाहिए | समझा जाता है कि उस विद्यालय में शिक्षा का स्तर अच्छा नहीं होगा |

हमारे समय में जब मौसम अनुकूल होता था तो बच्चों को क्लासरूम्स से निकाल कर विद्यालय के पार्क में किसी वृक्ष के नीचे पढ़ाने के लिए ले जाया जाता था | इस प्रकार के खुले वातावरण और प्रकृति के सान्निध्य में यदि बच्चों को शिक्षा प्रदान की जाएगी और पुस्तकीय ज्ञान के साथ साथ उनकी रचनात्मकता तथा व्यावहारिकता को निखारने का प्रयास किया जाएगा तो वह शिक्षा वास्तव में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की होगी और विपरीत परिस्थितियों में भी ऐसे बच्चे घबराए बिना आगे बढ़ते जाएँगे – कम से कम हमारा स्वयं का ऐसा ही मानना है |

किन्तु शिक्षा के इस व्यावसायीकरण के लिए और इस प्रकार की मानसिकता के लिए क्या केवल शिक्षक को ही दोषी मान लिया जाना चाहिए ? शिक्षक को भी अपने तथा अपने परिवारजनों के जीवन यापन के लिए धन चाहिए होता है | जैसे जैसे महँगाई अपने पाँव लम्बे करती जाएगी शिक्षक को भी उसी के अनुरूप वेतन की आवश्यकता होगी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए | अतः अध्यापक को दोष देने की अपेक्षा यदि हम इसके मूल में जाने का प्रयास करें तो उचित होगा |

ध्यान देंगे तो अनुभव होगा कि सबसे पहला दोष तो उन माता पिता का है जो बच्चों को ज़मीन से जुड़े नहीं रहने देना चाहते - जो समझते हैं कि जितने महँगे और सुविधासम्पन्न स्कूल होंगे उतना ही समाज में हमारा और हमारे बच्चे का सम्मान होगा - जो इस बात को बताने में गर्व का अनुभव करते हैं कि उनके बच्चे के साथ किन किन बड़ी हस्तियों के बच्चे पढ़ने आते हैं - या वे अपने बच्चे को कितने सौ रुपये हर दिन पॉकेट मनी के रूप में देते हैं - या उनका बच्चा अपने जन्मदिन पर स्कूल में दोस्तों को पार्टी देने में कितना पैसा ख़र्च करता है - और साथ में ये भी जोड़ देते हैं कि "क्यों न करे, आख़िर कमा किसके लिए रहे हैं |"

हम लोग जब पढ़ते थे उस समय जो बच्चा ट्यूशन जाता था उसके लिए माना जाता था कि वह पढ़ाई में कमज़ोर है | बच्चों को जो भी कुछ होम वर्क के नाम पर कार्य विद्यालय से दिया जाता था वो सब घरों में उनकी माताएँ ही पूरा करा दिया करती थीं | जहाँ माताएँ इतनी पढ़ी लिखी नहीं होती थीं वहाँ पिता या घर के अन्य लोग समय निकालते थे | यही कारण था कि समय के बच्चे एक ही तरह का कोर्स करते हुए भी कहीं न कहीं एक दूसरे से भिन्न योग्यता वाले होते थे – एक दूसरे से भिन्न लेकिन परिपक्व मानसिकता वाले होते थे | जैसे जैसे बड़ी कक्षाओं में आते जाते थे – स्वयं समय निकाल कर अपने नोट्स तैयार किया करते थे – न कोई ट्यूटर उन्हें इस कार्य में सहायता प्रदान करता था न ही परिवार के लोग – और ऐसा करते हुए बच्चों को अपने विषय का ठोस ज्ञान भी प्राप्त हो जाता था | साथ ही, बच्चों को अपनी पढ़ाई पूरी करके बाहर जाकर साथ के बच्चों के साथ खेलने कूदने का और अपनी क्रियात्मक अभिरुचियों को निखारने का अवसर भी प्राप्त होता था | जो उनके लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से भी आवश्यक है | ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों से दूसरे बच्चे दोस्ती नहीं करना चाहते थे | विद्यालय के किसी सांस्कृतिक या स्पोर्ट्स आदि के कार्यक्रमों में भी उन्हें प्रायः भाग लेने का अवसर नहीं प्राप्त होता था | क्योंकि उन्हें "फिसड्डी" माना जाता था |

जबकि आज स्कूल के बाद ट्यूशन जाना और उस पर पैसा ख़र्च करना एक प्रकार से "स्टेटस सिम्बल" भी बनता जा रहा है | माताएँ बड़े गर्व से बताती हैं कि उनका बच्चा स्कूल से आते ही जैसे तैसे जल्दी जल्दी अपना लंच करके ट्यूशन के लिए भागता है और इसी कारण से उन माताओं को भी समय नहीं मिल पाता क्योंकि उन्हें बच्चे को ट्यूशन या कोचिंग सेंटर तक पहुँचाना होता है | न ही बच्चों को घर से बाहर खेलने का समय मिल पाता है न किसी प्रकार की अन्य कलात्मक रुचियों को निखारने का अवसर प्राप्त हो पाता है | व्यावहारिक ज्ञान भी उनको नहीं प्राप्त हो पाता | किसी भी कठिन परिस्थिति में स्वयं को ढालने में ये बच्चे असमर्थ अनुभव करते हैं |

लेकिन हम कहेंगे कि इस स्थिति को पहुँचने के लिए उन माता पिताओं का ही दोष है - विशेष रूप से माताओं का - जिनके पास अपनी किटी पार्टीज़ में जाने के लिए समय है लेकिन बच्चों का होम वर्क कराने के लिए समय नहीं है | भला विद्यालयों के प्रबन्धक इस मानसिकता का लाभ क्यों नहीं उठाएँगे ? इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा के व्यावसायीकरण की शुरुआत यहीं से हो जाती है और बाद में जब ये सुरसा की भाँति बढ़ता चला जाता है तो हम शिक्षकों पर दोषारोपण करना आरम्भ कर देते हैं |

हम स्वयं एक शिक्षक रहे हैं और शिक्षकों के परिवार से ही आते हैं | अतः आप सभी से विनम्र निवेदन है कि ऐसा वातावरण परिवार और समाज में निर्मित कीजिये कि शिक्षक सम्मान प्राप्त करते हुए पूरी कर्तव्यनिष्ठता के साथ देश का भविष्य संवार सकें | तभी "शिक्षक दिवस" के उत्सव सार्थक माने जाएँगे, अन्यथा ये सब केवल एक रस्म अदायगी भर बनकर रह जाएगी...

डॉ पूर्णिमा शर्मा







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