शिक्षक समाज का स्तंभ

06 सितम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (433 बार पढ़ा जा चुका है)

शिक्षक समाज का स्तंभ

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आदर्शों की मिसाल है शिक्षक


आदर्श स्तंभ है शिक्षक

ज्ञान प्रचारक है शिक्षक
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सच्ची शिक्षा एवं मानव समाज

सारा ज्ञान बाँट- लाता है अगाज़
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धन्य है वो लोग जिनको गुरु के संपर्क में आने का सौभाग्य मिला है तथा उनके सानिध्य में जीवन मे कुछ ज्ञान और शिक्षा ग्रहण करने का सुअवसर प्राप्त मिला पूर्णत्व हेतु।
गुरु शब्द और गुरु महात्म्य का प्रगाढं संबंध जीवन समुद्र की गहराई से है, अद्भुद अंतरंगता है; नैसर्गिक है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है कलम वा वाणी के माध्यम से।
"सब धरती कागज करूँ
लिखनी सब वनराय
सात समुंदर मसि करूँ
गुरु गुण लिखा ना जाये"
गुरु का महत्व -
सात द्वीप नौ खंड में
गुरु से बड़ा ना कोय
करता करे न कर सके
गुरु करे सो होय
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गुरु का हाथ पकड़ने की बजाय अपना हाथ गुरु को पकड़ा दो क्योंकि हम गुरु का हाथ गलती से छोड़ सकते हैं, किन्तु-वे कदापि नहीं।
गुरु हाथ पकड़ेंगे तो वे कभी नहीं छोड़ेंगे, श्रिंखलाबद्ध रहेंगे अनवरत
🙏 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
गुरु ही ब्रम्हा गुरु ही विष्णु

गुरु देवो महेश्वरः।
गुरुरेव साक्षात परब्रह्म

तस्मै श्री गुरुवै नमः।।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
गुरु के बिना ज्ञान है अधुरा,

गुरु हीं हमें सही राह हैं दिखाते।
शिष्य गुरु आज्ञा वर सहज सत् पथ पर अग्रसारित हो जाते।।
श्रीराम एवं श्री कृष्ण को भी गुरु के पास शिक्षा प्राप्त करना पड़ी थी।
गुरु भक्ति के कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में हैं।। गुरुश्रेष्ठ वे अवतरिक मुक्त आत्मयें हैं जो महाकौल हैं और शिष्य को सत पथ का निर्देशन कर जागतिक् ज्ञान-विज्ञान के अलावा ब्रह्मज्ञान के माध्यम से मुक्ति मोक्ष का मार्ग प्रसस्त करते हैं। ये हीं कहलाते हैं सद्गुरु, महासंभूति, महाकौल वा तारकब्रह्म। इनका कोई गुरु नहीं होता। इनमें शिव और कृष्ण धराधाम पर अवतरित हो विशाल टोली बनाये सच्चे गुरुओं वा शिक्षकधर्म प्रचारकों की और गुरुकुल की उच्चस्तरीय परंपरा चली। परन्तु आज, मानव समाज का दुर्भाग्य- हमारी सैक्षणिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में नैतिकशास्त्र का पठन-पाठन और नैतिकवान बनने का व्यवहारिक मार्ग दर्शनपरिवेश शुन्यप्राय है। हमारे जीवन में शिक्षा का महत्व डिग्री वा शोधकार्य वा शीर्षस्थ पद प्राप्त करना हीं नहीं वरन साधना सेवा और त्याग के सुपथ पर चल कर महान बनना है, एक नैतिकवादी बन दग्ध मानव समाज का बहुआयामीय विकास भी करना है।
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सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चिद् दुख भागभवेत।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
शुभम्! इति!!
🌺🌺🌺🌺🌺🌺
डॉ. कवि कुमार निर्मल
बेतिया, बिहार


मैं घोषणा करता हूं कि मेरी रचना पूर्णता मौलिक एवं स्वरचित हैं____✒️


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