खुदको बदल पाओगी

15 सितम्बर 2020   |  विवेक भारद्वाज   (456 बार पढ़ा जा चुका है)

मै जानता हूँ सब बदल जायेगा।

आज जान हो कल अंजान हो जाओगी।

मेरे घर के हर कमरे की मान थी, अब मेहमान कहलाओगी।

मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या खुद को बदल पाओगी।

आज अम्बर धरती झील नदिया सब पूछते है जहाँ कल तक दोनो का नाम दिखाया करती थी, क्या अब उनकी भी खबर रख पाओगी।

मै जानता हूँ सब बदल जायेगा, क्या रिश्ते बदल पाओगी।

आज हर हिचकी पर याद करता हूँ तुम्हे, पेज-2

तुम्ही कहो कल मै तुम्हे भूल जाऊँ ऐसा असर कर पाओगी।

अब रास्ते अंजान से लगते है मुस्कुराते हर दिल बेईमान से लगते है,

दूर रहूँ तो आसान है खुद को खुद मे समेट लेना अगर मिल गया बेगाने रास्ते पर तो खुदके अशमंजस को मुझे सहज कर पाओगी।

मै जानता हूँ सब बदल जायेगा ये जुदाई के गम बदल पाओगी।

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