कहानी (चटोरी जिव्हा को साधु का दंड)

30 सितम्बर 2020   |  Sarita bisht   (420 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी - "चटोरी जिव्हा को महात्मा का दंड"


घने जंगल में, एक छोटी सी झोपड़ी जो चारों ओर से विशाल वृक्षों से घिरी हुई थी।मन्त्रोच्चारण से उस शांत वन में संगीत की लहरें-सी उठती रहती थी और जिसे सुनकर पशु-पक्षी भी अपना सुर भूल जाते थे।ऐंसे संस्कृत के श्ल़ोकों का मधुर उच्चारण और कोई नहीं एक वयोवृद्ध महात्मा के मुख से प्रस्फुटित होते थे।

बहुत सालों से वह महात्मा उस झोपड़ी में वेदों, पुराणों,उपनिषदों और भागवतपुराण का निरन्तर स्वाध्याय कर रहे थे।नगरों की चकाचौंध उन्हें छू तक नहीं गई थी।हफ्ते में एक दिन वे अपना कमंडलु उठाते और भिक्षा माँग कर ले आते तथा जरूरत पड़ने पर जंगल के ही कंद-मूल फल खा लेते।परन्तु अब की बार वे महात्मा उन शास्त्रों के अध्ययन में इतना खो गए कि भूख और भिक्षा का भी उन्हें ध्यान नहीं रहा।बहुत दिन बाद जब वे उस कुटिया से बाहर निकले तो उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज़ था जिसने उनके व्यक्तित्व को एक नया ही रूप दे दिया था।

आज वे कमंडलु पकड़कर नगर की तरफ जा रहे थे तो जंगल की चिड़ियाँ भी उनके पीछे चीं-चीं करती जा रही थी।उन्हें प्रतिदिन उनके मंत्रों को सुनने की आदत जो हो गई थी।वे समझ रही थी कि ये आज हमें छोड़कर जा रहे हैं।तब महात्मा जी ने भी प्यार से "आता हूँ" ये शब्द कहकर उन्हें धीरज बँधाया और आगे बढ़ गए।

राजा सूर्यांश को जैसे ही यह खबर मिली कि कोई तेजस्वी महात्मा नगर में आए हुये हैं।वे महल के द्वार पर उनको लेने के लिये स्वयं पहुँच गए।जब महात्मा वहाँ पहुँचे उन्होंने उनके चरण छूकर, 'अहो भाग्य हमारे, आप जो पधारे 'कहकर महल में ले गए।राजा ने उनका खूब आदर सत्कार किया।जब महात्मा भोजन करने लगे तब उन्हें खाने के अनेक व्यंजनों में से कढ़ी सबसे ज्यादा पसंद आई और उन्होंने उसे खूब खाया।कुछ देर आराम करने के बाद वे राजा को आशीर्वाद देकर अपनी कुटिया की तरफ चल दिये।बहुत दिनों बाद उनकी जीव्हा ने मशालों से युक्त भोजन किया था इसलिए रास्ते में भी उन्हें भोजन का ही ध्यान आ जाता और सबसे ज्यादा तो भीनी-भीनी खुशबू वाली कढ़ी का।जैसे-तैसे करके उन्होंने अपना मन वहाँ से हटाया और कुटिया पर पहुँच गए।संध्या वंदन करने के लिये जैंसे ही बैठे उन्हें कढ़ी का ख्याल आ गया।फिर वे जोर-जोर से मन्त्रों का उच्चारण करने लगे परन्तु फिर भी स्वादिष्ट कढ़ी का स्वाद उनके मुँह में पानी ले आता।ऐन-केन प्रकारेण उन्होंने अपनी पूजा पूरी की और सो गए।अगले दिन सूर्य उगते ही साधु ने अपनी पूजा संक्षिप्त रूप में की और चल पड़े नगर की ओर।राजा ने फिर उनका स्वागत किया और 'अहो भाग्य हमारे आप जो पधारे' कहकर महल में ले गए।

राजा कुछ पूछता इससे पहले ही साधु ने ही कहा, हम भोजन करेंगे और केवल कढ़ी का।राजा ने हाथ जोड़कर आज्ञा शिरोधार्य की और रसोईयों से कढ़ी बनाने के लिए कहा।थोड़ी देर होने पर महात्मा जी राजा से बोले कितनी देर लगेगी।राजा बोला, महात्माजी बन रही है थोड़ी देर लगेगी।दो घड़ी बीतने पर जब महात्मा जी के सामने कढ़ी परोसी गई तब उन्होंने कहा हम बड़े बर्तन में खायेंगे।राजा भी थोड़ा हैरान- परेशान होने लगा कि क्या बात हो गई है ,महात्मा जी इस तरह का व्यवहार क्यों कर रहे हैं।तब एक बड़े पतीले में, राजा ने कढ़ी मँगाई।पतीले में गरम-गरम कढ़ी देखकर महात्मा जी मुस्कराए और अपनी जीव्हा बाहर निकाल कर उसे गरम-गरम कढ़ी खिलाने लगे।जब तक जीव्हा पर छाले न पड़ गए तब तक वे कढ़ी कहते गए और साथ -साथ कहते जाते ले कढ़ी खा, ले कढ़ी खा।महल के सभी लोग यह देखकर दंग रह गए।महल से झोपड़ी की तरफ जाते समय महात्मा ने लड़खड़ाती आवाज़ में राजा से कहा कि हे राजन! इस जीव्हा ने स्वाद के कारण मेरी वर्षों की तपस्या और स्वअध्ययन में विघ्न डाला है इसलिए आज मैंने इसे स्वादहीन बना दिया है ताकि यह पुनः किसी अन्य स्वाद में न पड़ जाए और मेरा मन उसी चीज़ का चिंतन न करने लगे क्योंकि मन ही हमारा मित्र है और मन ही हमारा शत्रु है।यह कहकर महात्मा ने राजा को आशीर्वाद दिया और जंगल की ओर चले गए तथा राजा ने भी एक नई सीख जीवन में अपना ली।

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