हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ३८

04 अक्तूबर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (368 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ३८

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *अड़तीसवाँ - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


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*सैंतीसवें भाग* में आपने पढ़ा :


*तुम्हारो मंत्र बिभीषण माना !*

*लंकेश्वर भए सब जग जाना*

*---------------------------*


अब आगे :---


*युग सहस्त्र योजन पर भानु !*

*लील्यो ताहि मधुर फल जानू !!*

-**************************


*युग सहस्र योजन पर भानू*

*--------------------------*


इस प्रसंग में अनेक प्रकार की शंका उत्पन्न होती हैं , परंतु यह शंका तभी उत्पन्न होती है जब भगवान की अनंतानंंत , ब्रम्हांडनायक अखिलाखिल ब्रह्मांडों के कारण स्वरूप का विस्मरण हो जाता है | तथापि सामान्य स्थिति में व्यापक होने के कारण उनकी चर्चा करना अनुपयुक्त नहीं होगा | लोग प्राय: विचार करते हुए प्रश्न कर देते हैं कि :--


*👉 सूर्य तो आग का गोला है व इसमें इतनी गर्मी है कि इसके सामने कुछ भी कठोर द्रव्य पिघल कर द्रव हो जाता है फिर हनुमान जी ने इसे कैसे निगल लिया ?*

*👉 सूर्य तो संपूर्ण पृथ्वी से भी कई करोड़ गुना बड़ा है तो हनुमान जी ने पृथ्वी पर खड़े होकर उसे कैसे निकल लिया ?*

*👉 पृथ्वी से सूर्य की दूरी दो चार हजार योजन की ही नहीं है फिर उक्त कथन को कैसे सही माना जाय ?*

*👉 यह कोई अत्युक्ति पूर्ण उपमा हो सकती है जिसका स्वरूप भी प्रतीकात्मक हो !*


इन सब शंकाओं के समाधान में यही कहना चाहूंगा की वास्तविक बात तो यह है कि सभी ये सभी शंकायें गोचर सीमा से आवद्ध व्यवहारिक स्थल पर उत्पन्न होती हैं जबकि विषय वस्तु इससे सर्वथा भिन्न है | जिस स्थल पर ये शंकायें उत्पन्न होती हैं उस पर भगवान की सीमा , स्वरूप , शक्ति एवं लीलाएं सामान्य की सीमा से बाहर या अधिक नहीं रहती जबकि तथ्य यह है कि उस अनन्त की किसी भी क्षेत्र में सीमा नहीं है | उक्त शंकाओं - आशंकाओं के धरातल पर केवल यही प्रसंग शंका स्थल नहीं है बल्कि भगवान की लीलाओं का पद पद आश्चर्यजनक शंकाओं से भरा पड़ा है | क्या शास्त्रीय निष्ठा एवं आध्यात्मिक स्तर की बुद्धि के अतिरिक्त व्यावहारिक स्तर की बुद्धि इस तथ्य को आत्मसात कर पाती है कि *रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मांड* यदि हां तो *हनुमान जी* के सूर्य निगलने की बात *ब्रम्हांडनायक शिव* के अवतार के लिए कोई शंका नहीं रह जाती है | *भगवान शिव* के स्वरूप में जहां *चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय* कहा जाता है वहां *हनुमान जी* को *शिव का अवतार* समझ लेने के बाद सूर्य की गर्मी विशालता एवं दूरी की सभी शंकायें समाप्त हो जाती हैं |


पृथ्वी के छोटी होने से भी विचार करने के बाद कोई शंका नहीं रह जाती क्योंकि पृथ्वी ने तो *सूर्य* को निगला नहीं व *हनुमान जी* का कोई आकार निश्चित नहीं है | यह तो *मनसा स्वरूप* है जब चाहे जितना चाहे बिना किसी हिचक के आकृति धारण कर सकते हैं | सुरसा का प्रसंग भी यहाँ स्मरण किया जा सकता है | पृथ्वी पर तो पैर मात्र टिकने थे यहां तो *हनुमान जी* ने सूर्य को निगला तो आकाश में उड़कर गए थे | आकाश तो अनन्त है ही उसमें तो संपूर्ण ब्रह्मांड लटके रहते हैं यहां पृथ्वी के छोटे या बड़े होने का कोई व्यवधान *हनुमान जी* के सूर्य के निगलने में नहीं होना चाहिए | तत्वों की दृष्टि से *अग्नि* क्या है ? वायु के पुत्र *(वायोरग्नि)* *हनुमान जी* भी वायु के पुत्र हैं | अग्नि को अग्नि क्या करे ? यहां उष्णता के कारण नहीं निगल सकने की शंका नहीं रह जाती है | वैसे भी अग्नि *हनुमान जी* को जला नहीं सकती है ऐसा उनको वरदान है |


पृथ्वी से दूरी के प्रश्न को भी थोड़ा समझने की आवश्यकता है कि *हनुमानजी* तो आकाश में थे (निगलते समय) अत: पृथ्वी से सूर्य की दूरी यहाँ विचारणीय प्रश्न ही नहीं है | *हनुमान जी* ने जिस समय सूर्य को ग्रहण किया उस समय *हनुमान जी* से सूर्य मंडल की दूरी कितनी दूरी दो या चार हजार योजन की थी | इतने विशाल मण्डल के ग्रहण हेतु इतनी दूरी पर्याप्त रही होगी | जो भी हो सूर्य की दूरी *हनुमान जी* से *युग सहस्त्र योजन पर भानु* है जिसे पृथ्वी से कल्पना इसी दृष्टिकोण से की जाती है कि *हनुमान जी* पृथ्वी पर खड़े थे आकाश स्थित *हनुमान जी* की दूरी से कुछ भी हो सकती है |


*शेष अगले भाग में :---*



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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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अगला लेख: हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग १७



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