हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ४७

04 अक्तूबर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (387 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ४७

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *सैंतालीसवाँ - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


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*छियालीसवें भाग* में आपने पढ़ा :--


*संकट ते हनुमान छुड़ावैं !*

*मन क्रम वचन ध्यान जो लावैं !!*

*-----------------------------*


अब आगे :----


*सब पर राम तपस्वी राजा !*

*तिनके काज सकल तुम साजा !!*

*------------------------------*


*सब पर राम*

*-----------*


*सब* का क्या अर्थ है ? *सब* अर्थात समस्त सृष्टि अर्थात अशेष ! जड़ चेतन ! अखिलाखिल ब्रह्मांड ! अर्थात उससे भी परे | यथा :-- *ईश रजाइ शीस सबही के* या फिर :-

*जेहि समान अतिशय नहिं कोई !*

*ताकर सील कस न अस होई !!*


सब पर है ! कौन ? भगवान श्री राम !! उन से ऊपर कोई नहीं फिर राम जी की आज्ञा या इच्छा को अन्यथा कौन कर सकता है ! भगवान शंकर तक यह कहकर मौन हो जाते हैं कि :-- *होईहै सोई जो राम रचि राखा ! को करि तर्क बढ़ावहिं साखा !!* अनेकानेक ऋषि मुनि महात्मा भी यही कहा करते हैं :- *विधि हरि शम्भु नचावन हारे* भगवान के परम भक्त कागभुशुण्डि जी ने भी कह दिया :- *जेहि बहु बार नचावा मोंहीं ! सोइ विहंगपति व्यापी तोही !!* कहने का तात्पर्य यह है कि *सब पर राम* वास्तव में सबसे ऊपर हैं |


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*तपस्वी राजा*

*-------------*


यहां पर *तुलसीदास जी महाराज* ने भगवान श्री राम को अयोध्या का राजा या ब्रह्माण्ड का राजा न कहकर *तपस्वी राजा* कहा है क्योंकि भगवान श्री राम *तपस्वी* हैं | माता कैकेयी का यही आदेश था की *तापस बेस विशेष उदासी ! चौदह बरिस राम वनवासी !!* माता कैकई ने राम को *तापस बेश* में भेजने के लिए क्यों कहा ? क्योंकि वह जानती थी कि *तपस्वी* में तपोबल होता है जिसकी शक्ति सभी प्रकार की शक्तियों से प्रबल होती है | जैसा कि कहा गया है कि :--

*तपबल रचई प्रपंच विधाता !*

*तपबल विष्णु सकल जग त्राता !!*

*तपबल शम्भु करइं संहारा !*

*तपबल शेष धरइं महिभारा !!*

*तप अधार यह सृष्टि भवानी !!*


अर्थात *तपस्या* के बल से कोई भी बल अधिक नहीं है परंतु श्री राम जी *तपस्वियों* से भी ऊपर हैं इसलिए *सब पर राम* लिखने के बाद *तुलसीदास जी महाराज* ने *तपस्वी राजा* लिख दिया | *तपस्वी और राजा* में विशेष भिन्नता होती है | *राजा* का बल सेना होती है और *तपस्वी* का बल होती है उसकी तपस्या | *राजा* का बल सबको दिखाई पड़ता है परंतु *तपस्वी* का बल अगोचर होता है और यहां पर भगवान श्री राम *तपस्वी* भी हैं और *राजा* भी हैं | *तपबल* को केवल *तपस्वी* ही जान सकते हैं परंतु *राजा* के बल को प्रजा जानती है | *राजा* का बल प्रताप होता है जबकि *तपस्वी* में अध्यात्म का बल होता है | *तपस्वी* वनों में कंदमूल के आहार पर जीवन निर्वाह करते हैं इसका उद्देश्य आत्मा का ज्ञान या आध्यात्मिक शक्ति का संचय करना होता है | *राजा* का ध्येय तो पूरी प्रजा का सुख होता है | प्रजापालन में सांसारिक सभी सुख-सुविधाओं का , सामाजिकता का जिससे प्रजा सुखी व संतुष्ट हो , यह उद्देश्य निहित होता है |


*तपस्वी* का क्या काम होता है ? इस पर विचार कर लिया जाय | उनका उदर पोषण वह भी जीवन के लिए अनिवार्य मात्र व उनकी *तपस्या* साधना एकांतवास में कोई विघ्न न हो | उनका कोई स्वयं का न काम होता है और न औरों के काम से वह कोई मतलब रखते हैं | बल्कि अलग निर्जन बन में रहना चाहते हैं | यहां *सब पर राम तपस्वी राजा* कहकर यह बताने का प्रयास *तुलसीदास जी* ने किया है कि राम जी *तपस्वियों* में भी सबसे ऊपर हैं और राम राज्य का कोई जोड़ ही नहीं है | *राजा* स्वयं साधन संपन्न होता है और *तपस्वी* आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न होता है | दोनों अपना काम करने में समर्थ होते हैं और भगवान श्री राम *तपस्वी एवं राजा* दोनों ही हैं इसलिए *तुलसीदास जी महाराज* ने लिख दिया *सब पर राम तपस्वी राजा* |


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*तिन के काज सकल तुम साजा*

*-------------------------------*


*तिनके* अर्थात राम जी के अर्थात सभी आशेष | *हनुमान जी महाराज* ने राम जी के सभी काम किये | राम जी *तपस्वी* भी सब पर अतिशय सर्व समर्थ भी व *राजा* भी फिर भी उनके काम *हनुमान जी* ने किए ! वे (राम जी) अपना कार्य स्वयं नहीं कर पाए ? कोई भी यह प्रश्न पूछ सकता है कि जब राम सर्व समर्थ से तो वे अपना काम क्यों नहीं कर सके ? इस पर यही कहना चाहूंगा राम जी अपने सभी कार्य स्वयं कर सकते थे परंतु लीला की शोभा जो मानवीय स्वभावाविकता का स्वरूप देते हुए हुई उसमें सारे कार्य *हनुमान जी* ने ही किया | इसलिए *गोस्वामी जी महाराज* ने यहां *साजा* शब्द लिखा है | राम जी के कार्यों को *सजाना* और वह कार्य सजाया *हनुमान जी* ने | *सजाना* जहां सेवा व स्नेह का सूचक है वहां योग्यता का भी | सभी कार्यों को *सजाना* कार्य , देशकाल परिस्थिति के अनुसार कितनी लग्न व योग्यता की अपेक्षा रखता है वह क्षमता *हनुमान जी* के अतिरिक्त अन्य किसी में भी नहीं है | उदाहरण के रूप में राम जी ने रावण के समान बलवान खर दूषण का संहार किया और थोड़े ही समय में किया | परंतु भक्तों के लिए भगवान का (मायाधिपतित्व) ऐश्वर्य ही सामने आया माधुर्य नहीं प्रकट हुआ | वैसे तो लखनलाल जी भी इतनी सामर्थ रखते थे कि :- *जग महुँ सखा निशाचर जेते ! लक्ष्मण हनइं निमिष महुँ तेते |* अर्थात सभी निशाचरों का संहार अकेले लक्ष्मण जी कर सकते थे परंतु :- *जग विस्तारहिं विसद अति राम जन्म कर हेतु* भला कैसे पूरा होता ? *हनुमान जी* को जब जामवन्त जी ने कहा :- *राम काज लगि तव अवतारा* तो *हनुमान जी* ने सोचा यदि राम जी से सीता को मिलाना ही राम काज है तो इसमें देर की क्या बात है | यह सेवा कार्य तो एक ही क्षण का है और तुरंत हनुमान जी बोल उठे *सहित सहाय रावनहिं मारी ! आनहुँ इहाँ त्रिकूट उपारी !!* पर प्रश्न यह था कि यदि कार्य करना होता तो खर दूषण के वध की भांति स्वयं श्री राम कभी का कर दिए होते परंतु वास्तव में बात है लीला के माधुर्य के विकास की | लीला कार्यों की *सजावट* अपनी ओर से कुछ भी नहीं करके राम जी केला मां का विकास उनकी इच्छानुसार करना | इसमें ही परम धैर्य व योग्यता की आवश्यकता थी | अतः *हनुमान जी* ने यही कार्य संपन्न किया , इसलिए यहां *तुलसीदास जी महाराज* को लिखना पड़ा *तिनके काज सकल तुम साजा* |


*शेष अगले भाग में :---*



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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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