हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ४९

06 अक्तूबर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (418 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ४९

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *उनचासवाँ - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


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*अड़तालीसवें भाग* में आपने पढ़ा :--


*और मनोरथ जो कोई लावे !*

*तासु अमित जीवन फल पावे !!*

*-----------------------------*


अब आगे :----


*चारों युग परताप तुम्हारा !*

*है पर सिद्ध जगत उजियारा !!*

*--------------------------*


*चारों युग* अर्थात सतयुग , त्रेतायुग , द्वापरयुग एवं कलयुग | *परताप* अर्थात प्रताप , तेज | ताप का अर्थ गर्मी होता है किंतु प्र उपसर्ग से यह अग्नि की गर्मी या तपन से हटकर प्रभाव के आशय को प्रकट करता है | मेरी समझ में *प्रताप* आध्यात्मिक नैतिक प्रतिष्ठा का व्यापक प्रभाव होता है जो दैहिक सीमा के परोक्ष में भी रहता है | प्राय: यह सुनने को मिलता है कि हमारे महापुरूषों ने कहा है कि "जब राजा सोता है तो ( प्रजा की रक्षा में) उसका *प्रताप* जागता है "! *पातंजल योग शास्त्र* में लिखा गया है *"अहिंसा प्रतिष्ठायां तत् सन्निधौ वैरत्याग:"* वह यदि राजा की नैतिक या न्यायिक प्रतिष्ठा का प्रभाव है तो यह आध्यात्मिक या योग सिद्धि की प्रतिष्ठा का प्रभाव है | यह दोनों ही तप , तेज या *प्रताप* ही है जो व्यक्ति के परोक्ष में भी प्रभावी होता है | इसी भावार्थ में यहां *हनुमान जी* के *प्रताप* का वर्णन किया गया है | जैसे राजा की न्यायिक व्यवस्था के भय से जो राज राजा के परोक्ष में भी भयभीत होते हैं उसी प्रकार के भाव में नाम *प्रताप* वर्णन में इसके पहले लिखा गया है *भूत पिशाच निकट नहीं आवे ! महावीर जब नाम सुनावे !* अब *तुलसीदास जी महाराज* लिख रहे है कि *चारों युग परताप तुम्हारा* अर्थात आपका *प्रताप* किसी एक युग में ही नहीं रहा है बल्कि चारों युगों में रहता है | त्रेतायुग व्यतीत हो गया , द्वापर युग भी चला गया परंतु हे *हनुमान जी* आपका *प्रताप* यथावत् है | इसीलिए *चारों युग परताप तुम्हारा* के बाद वर्तमान कालिक *है* शब्द दिया गया | *है* शब्द से अभिप्राय यह है कि यद्यपि युग व्यतीत हो गए हैं किंतु *हनुमान जी* तो चिरंजीवी है अतः *हनुमान जी का प्रताप* कैसे समाप्त हो सकता है | *है पर सिद्ध* अर्थात यह तथ्य प्रसिद्ध है सभी जानते हैं अतः बताने की आवश्यकता नहीं है |


*चार युग* में एक जिज्ञासा हो सकती है कि रामजी त्रेता युग में हुए तभी *हनुमान जी* का *प्रताप* प्रकट हुआ इसके बाद तो यह *प्रताप* द्वापर व कलयुग में बना हुआ है पर सतयुग तो पूर्व में ही व्यतीत हो चुका था तो उसमें *हनुमान जी का प्रताप* कैसे रहा ? रात दिन या सप्ताह के सात दिनों की भांति यहां पर बात समझ लेने की है कि युगों का चक्र तो क्रमश: चलता ही रहता है | कलियुग के बाद पुनः सतयुग का प्रारंभ हो जाएगा किंतु *हनुमान जी* की आयु कलियुग के साथ सीमित नहीं है | कालचक्र की गणना में एक सहस्त्र चतुर्युगियों का एक कल्प होता है , एक कल्प में चौदह मनु व इतने ही मन्वंतर होते हैं | प्रत्येक मन्वंतर में अधिकारी देवताओं (इन्द्रादि) का परिवर्तन होता है उनकी आयु इसी प्रकार समझनी चाहिए | अतएव *हनुमान जी* का *प्रताप* चार युगों में कह कर कोई अतिशयोक्ति नहीं कही गई है |


*जगत उजियारा* अर्थात विश्व प्रकाशित होता है | कहने का भाव है कि *हे हनुमान जी* जगत में आपसे उजाला है | श्री राम जी के लिए भगवान् शिव कहते हैं :- *जगत प्रकाश्य प्रकाशक रामू* इस प्रकार राम प्रकाशक हैं , जगत प्रकाशित है तो *हनुमान जी* प्रकाश (उजियारा) हैं |


*एक अन्य भाव देखिए*


*परताप तुम्हारा है परसिद्ध* अर्थात *हनुमान जी* साधु (सुसंत) भी स्वभाव से हैं इसीलिए भक्तों का दुख तत्क्षण दूर कर देते हैं उनका दुख सहन नहीं कर सकते | *श्री रामचरितमानस* में कहा है कि *कियेहुं कुवेशु साधु सनमानू ! जिमि जग जामवंत हनुमानू !!* अर्थात *हनुमान जी* कुवेश (वानर रूप धारण ) करके भी साधु हैं | यहाँ का भाव देखिये *पर* अर्थात दूसरे का *ताप* = दूसरे का दुख ही तुम्हारा दुख है | यही तो सन्त का लक्षण है | यथा :-


*संत हृदय नवनीत समाना !*

*कहा कविन्ह पर कहइ न जाना !!*

*निज परताप द्रवहिं नवनीता !*

*पर दुख दुखित संत सुपुनीता !!*


इस प्रकार दूसरों का *ताप* हरण करने वाले *हनुमान जी* की भक्तवत्सल का का भाव रखते हुए *तुलसीदास जी महाराज* ने लिख दिया *परताप तुम्हारा है प्रसिद्ध* |


*शेष अगले भाग में :---*



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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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