हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ५३

09 अक्तूबर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (426 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ५३

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *तिरपवनवाँ - भाग* 🩸


🏵️💧🏵️💧🏵️💧🏵️💧🏵️💧🏵️💧


*गतांक से आगे :--*


➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖


*बावनवें भाग* में आपने पढ़ा :--


*राम रसायन तुम्हरे पासा !*

*सदा रहउ रघुपति के दासा !!*

*---------------------------*


अब आगे :----


*तुमरो भजन राम को भावै !*

*जनम जनम के दुख विसरावै !!*

*------------------------------*


*तुमरो भजन राम को भावै*

*--------------------------*


*तुमरो* अर्थात तुम्हारा ! *भजन* का अर्थ है सेवा ! *भावै* अर्थात प्रिय लगता है या अच्छा लगता है | *हनुमान जी* का *भजन* सेवा भी राम जी को प्रिय लगता है अर्थात यदि कोई व्यक्ति *हनुमान जी* की सेवा करता है तो राम जी का भी प्रिय बन जाता है | *भजन* तुम्हारा व प्रियता राम जी की | *हनुमान जी* की सेवा ही राम जी को अच्छी लगती है | जैसी सेवा आपकी उन्हें प्रिय लगती है वैसे किसी अन्य की सेवा नहीं लगती , क्योंकि *हनुमान जी* आप ही ऐसे हैं जिन्हें राम जी की सेवा के अतिरिक्त और कुछ अच्छा नहीं लगता | *श्री रामचरितमानस* में लिखा है ऐसे भक्तों के हृदय में ही भगवान का निवास होता है | जैसे कि :--

*जाहि न चाहिअ कबहुँ किछु तुम सन सहज सनेहु !*

*सो राउर निज गेहु !!*


विचार कीजिए कि अपना घर किसे नहीं अच्छा लगता है ? इस प्रकार भगवान श्री राम *हनुमान जी* के हृदय में निवास करते हैं क्योंकि वे आपकी सेवा के वशीभूत हैं |


➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖


*जनम जनम के दुख बिसरावैं*

*----------------------------*


जीव यदि *हनुमान जी* का *भजन* करने लगता है तो राम का प्रिय होकर जन्म जन्मांतरों के दुखों को भूल जाता है | ध्यान देने की बात है कि *जन्म* शब्द ही दो बार यहां लिखा गया है | भाव यह है कि यद्यपि *जन्म एवं मृत्यु* दोनों के दुखों को भूल जाता है पर *मृत्यु* शब्द शेकप्रद है | स्वभाव से ही व *मृत्यु* शब्द ना भी कहे तो भी *जन्म* के बाद पुनः *जन्म* कहने पर पूर्व देह की *मृत्यु* का भाव स्वत: ही अंतर्निहित तो हो जाता है | इसलिए *जन्म मृत्यु* के दुख को *जन्म जन्म* का दुख कह दिया है |

*जनमत मरत दुसह दुख होई*

के अनुसार *जन्म एवं मृत्यु* दोनों समय ही दुख दुख होता है पर मन का स्वभाव है कि वह सामने उपस्थित भय या निकट अनुभूत दुख ही स्मरण करता है या कर सकता है | इसीलिए किसी भी देहधारी को सामान्य प्राकृतिक नियम से पूर्व देह की समाप्ति का दुख नवीन देह प्राप्ति के बाद स्मरण नहीं रहता | देहांतर पूर्व का दुख स्वत: ही विस्मरण हो जाता है | यदि भयंकर दुख निकटतम पूर्व अनुभूत रहता है तो इस *जन्म* का ही , वह भी आगे सुख प्राप्त हो जाने पर भूल जाता है | राम जी के भक्तों को *मृत्यु* दुख नहीं होता क्योंकि उन्हें देह आसक्ति नहीं रहती है या फिर *मृत्यु* प्राप्ति नहीं होती है | यथा :--

*××××××××××××××××××××××*

*समय पाय तन तजि अनयासा*


*या फिर*


*बालि कीन्ह तन त्याग !*

*सुमन माल जिमि कण्ठ ते गिरत न जानइ नाग !!*


*××××××××××××××××××××××*


या फिर वह जीव *हनुमान जी* की ही भांति वह भी अजर - अमर - चिरंजीवी हो जाता है | दुख तो अनागत है जो राम प्रिय होने के कारण आएगा ही नहीं , पर जो *जन्म* हो चुका है व दुख देखा है वह भी भूल जाता है ! अर्थात बार-बार *जन्म* लेने के चक्कर से छूट जाता है तो समस्त *जन्मों* के समस्त दुख भूल जाता है | *जन्म* पुनः ना होने से उसका दुख नहीं रहेगा , *मृत्यु* दुख तो अभी अप्राप्त है अतः उसे *तुलसीदास जी महाराज* ने यहाँ ना लिखते हुए स्पष्ट लिख दिया कि *जनम जनम के दुख बिसरावैं* |


*शेष अगले भाग में :---*



🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷


आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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अगला लेख: हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ३०



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