हनुमान चालीसी !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ५६

30 अक्तूबर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (432 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसी !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ५६

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *छप्पनवनवाँ - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


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*पचपनवें भाग* में आपने पढ़ा :--


*और देवता चित्त ना धरई !*

*हनुमत सेई सर्व सुख करई !!*

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अब आगे :----


*संकट कटै मिटै सब पीरा !*

*जो सुमिरै हनुमत बलबीरा !!*

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*संकट कटे (हटै)*

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*संकटों* का हटना ही वास्तव में युक्तिसंगत है *पीरा* (पीड़ा) व *संकट* शब्दों के सामान्य अर्थ जहां समान कष्ट ही समझने में आते हैं वहीं यदि इसे गंभीरता से देखा जाए तो दोनों में भारी अंतर है | संकट मानसिक या दैविक भयद कष्ट के लिए प्रयोग किया जाता है या इस अर्थ को प्रकट करता है | वहीं *पीड़ा* शब्द कायिक कष्ट के लिए प्रयोग में आता है | *संकट* मन व मस्तिष्क पर आघात करता है तथा छाया रहता है *पीड़ा* चोट आदि से शरीर में अनुभव की जाती है | उदाहरण के लिए कांटे के बाद की कसक भी *पीड़ा* तो है पर वह *संकट* नहीं है | अकाल , दुर्भिक्ष आदि दैविक *संकट* है इससे *पीड़ायें* हो सकती हैं व उन अनागत *पीड़ाओं* के प्राप्त होने का आतंक ही *संकट* है | वर्तमान में कायिक सुख सुविधा के होने पर भी संभावित कष्ट का आतंक *संकट* ही तो है | अनागत किन्तु निश्चित कष्ट प्राप्ति का अनुमान *संकट* है जबकि *पीड़ा* प्राप्त कष्ट है | इसीलिए यहाँ *संकट कटै* के स्थान पर *संकट हटै* ही अधिक उपयुक्त होगा , क्योंकि इस *संकट* का कटना तो स्वत: काल क्रम का स्वभाव है फिर इसमें *हनुमान जी* के स्मरण की क्या महत्ता रह गई ? सुख दुख दोनों पुण्य पाप कर्मों के फल है जो कि *कटते* हैं भुगत कर ही | ज्यों - ज्यों या जो जो फल भोगकर समाप्त हो रहे हैं वे कर्म का *कटना* कहा जाएगा | लोग दुख भोगते समय कहते हैं कि *कर्म काट रहे हैं* बंदी कैद सजा का काल व्यतीत करते हुए यही कहता है कि *जेल सजा काट रहा हूं* जितनी भोग चुका *कट* गई वह निरंतर कालगति के साथ *कट रही है* पर *हट नहीं रही है* | न्यायाधीश से यदि उसी कैदी की सजा *हटा* दी जाए तो *काटने* की आवश्यकता नहीं रही | *संकट कटै* कहने पर भोगने का अभिप्राय सामने आता है जबकि *हटै* कहने पर न भोगे हैं व न वे प्राप्त होंगे क्योंकि जीवन पथ से *हट* ही चुके है तो हमारे मार्ग में उनकी अप्राप्ति निश्चित हो गई | युद्ध में सामने से तो रिपुदल *कट* रहा है तो वह *हट* रहा है तो दोनों स्थिति में जो अंतर का आशय बुद्धि में प्रकाशित हो रहा है वहीं यहां *संकट कटे या हटे* में समझ लेना चाहिए | अतः *हनुमान जी* के बल का प्रताप है कि *संकट कट* ही जाते हैं | *कटने* की स्थिति तब आए जब मार्ग में अड़ जाएं | प्रताप की महत्ता जो *हटने* में है वह *कटने* में नहीं | यहां *हनुमान जी* का प्रताप वर्णन किया गया है अतः *हटना* ही संकट का युक्तिसंगत है व पाठ भी अधिक सुना जाता है | *कटे* शब्द अपभ्रंश प्रतीत होता है |


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*मिटे सब पीरा*

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*पीड़ा* तो प्राप्त वर्तमान कष्ट है | इसके तो मिटने से ही शान्ति मिल सकती है *कट* कर समाप्त हुई तो इसमें किसी दैविक शक्ति का क्या निहोरा हुआ ? अत: यहां भी *मिटना* कहा है | यदि *पीड़ा* मिटने के स्थान पर हट गई तो पुनः प्राप्त होने की आशंका रूप *संकट* बन गया यदि *संकट* कांटा है तो *पीड़ा* उसकी प्राप्ति का परिणाम है | इसे तो *मिटना* ही श्रेयस्कर है | इसलिए *मिटे सब पीरा* लिखा गया है अनागत *पीड़ा* का जो *संकट* का रूप है का टल जाना या हट जाना ही *हनुमान जी* के स्मरण का फल व उसकी महत्ता है | इसके पूर्व की चौपाइयों में जहां *सर्व सुख करई* कहा है वहीं पर अब दुख का मिटना भी लिख दिया | दुख के दोनों स्वरूपों से *हनुमान जी* का स्मरण मुक्ति दिलाने का भाव स्पष्ट करने हेतु *संकट* (अनागत भाव दुख का भय स्वरूप जो मानस को विचलित कर देता है ) के *हट* जाने पर परिणामों में से दुख जो काया या देह से संबंध रखते हैं उनका *मिटना* यहां कहा गया है | सीता जी को अशोक वाटिका में कोई शारीरिक चोट नहीं थी बल्कि बिरह की मानसिक वेदना को *संकट* कहकर प्रार्थना की गई है :-


*दीन दयाल विरुद संभारी !*

*हरहु नाथ मम संकट भारी !!*


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*जो सुमिरै*

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*जो सुमिरै* से अभिप्राय है कि यहाँ कोई भेदभाव नहीं है जो भी स्मरण करेगा वह *संकट* से मुक्त हो जाएगा | पुनः *सुमिरै* कहकर अत्यधक सरलतम साधन बताया | यह साधन :-- *सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा* *पीड़ा* तीक्ष्ण वेदना का द्योतक है व *संकट* दीर्घकालीन आपत्ति निवारक उपायों की अनुपलब्धता या दुर्लभता लिए रहता है | तीक्स्ण वेदना में कुछ भी साधन व्याकुलता के कारण संभव नहीं होता तो अति भयानक या निराशाजनक परिस्थितियों अर्थात *संकट* में भी दीर्घकालीन साधना , अनुष्ठान , यज्ञ , जप तप आदि असंभव हो जाते हैं परंतु *स्मरण* मात्र तो हो ही सकता है ! इसमें तो किसी उपकरण या अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है | यहां तक कि यह तो क्रिया भी मानसिक ही है जिसमें हाथ जोड़ना या सर झुकाना आदि अशक्तता के समय भी हो सकता है | इससे सरल साधन और क्या हो सकता है ? अतः लोक कल्याणार्थ सरलतम सुलभ साधन से सिद्धि कह कर अशक्तता का भी समाधान *तुलसीदास जी* ने करते हुआ लिख दिया कि प्राणी को कुछ भी नहीं करना है तो *सुमिरन* कर ले क्योंकि *जो सुमिरे* उसके *संकट कटे मिटे सब पीरा*


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*हनुमत बलबीरा*

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यहां *तुलसीदास जी महाराज* ने *हनुमान जी* के बलशाली स्वरूप का *स्मरण* मात्र कराया है जिससे कि मानसिक भय की निवृत्ति कर आशा का स्रोत मानस में भी बल की भी वृद्धि कर दे | *अंजनी सुत वीरा* कहीं-कहीं पाठ मिलता है इसका अभिप्राय यह है कि दीनों पर दया करने की माता की आज्ञा का स्मरण भी *हनुमान जी* को हो जाता है जिसका अर्थ है कि है *हनुमान जी* आप माता की आज्ञा पालन रूप कर्तव्य हेतु भी हमारी सहायता करेंगे | इस प्रसंग में यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि *हनुमानजी* असुरों की , दुष्टों की रक्षा नहीं करते वह साधु सज्जनों की रक्षा करते हैं जो साधु सज्जनों को कष्ट देने के लिए स्वयं उलझन में पड़कर *संकट* का अनुभव करते हैं यहां ऐसे लोगों को *हनुमान जी* के *असुर निकंदन* विशेषण को नहीं भूलना चाहिए |


*शेष अगले भाग में :---*



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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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