शिक्षक के व्यवसाय का महत्त्व

11 नवम्बर 2020   |  अशोक सिंह 'अक्स'   (459 बार पढ़ा जा चुका है)

शिक्षक के व्यवसाय का महत्त्व

शिक्षक के व्यवसाय का महत्त्व


शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक के व्यवसाय का ऐसा ही महत्त्व है जैसे कि ऑपरेशन करने के लिए किसी डॉक्टर अर्थात सर्जन का महत्त्व होता है। शिक्षक सिर्फ समाज ही नहीं बल्कि राष्ट्र की भी धूरी है। समाज व राष्ट्र सुधार और निर्माण के कार्य में उसकी महती भूमिका होती है। शिक्षक ही शिक्षा और शिष्य के उद्देश्य पूरे करते हैं। इसलिए किसी भी शिक्षा प्रणाली या शिक्षा योजना की सफलता या असफलता शिक्षा क्षेत्र के सूत्रधार शिक्षकों के रवैये और उनके व्यवहार पर निर्भर करती है। भारत सरकार द्वारा लागू की गई सभी शिक्षा नीतियों व योजनाओं में शिक्षकों की भूमिका के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। जैसे कोठारी आयोग की रिपोर्ट (1964-66), शिक्षा नीति (1968), शिक्षा पर पंच वर्षीय योजना की रिपोर्ट और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) – में शिक्षक के व्यवसाय के महत्व की पहचान की गई है। इतना ही नहीं हालही में घोषित राष्ट्रीय शिक्षानीति -2020 में भी शिक्षकों की भूमिका और नवोपचार को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है।

किसी भी राष्ट्रीय शिक्षानीति या योजनाओं की सफलता शिक्षकों के सक्रिय क्रियान्वयन व कर्तव्यों के निर्वहन पर ही केंद्रित होता है। इस तथ्य को और स्पष्ट करने के लिए प्राथमिक स्कूल के शिक्षण व्यवसाय का उदाहरण लिया जा सकता है जिसे विश्व में सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय माना गया है क्योंकि प्राथमिक स्कूल के शिक्षक छोटे बच्चों को ज्ञान और जीवन के मूल्य उन्हें समझ आने लायक भाषा में प्रदान करते हैं ताकि इन छोटे बच्चों का भविष्य सुरक्षित और सुनहरा बन सके। जोकि अपने आप में अत्यंत कठिन व मुश्किल कार्य है। इसी अवस्था में छात्रों को जिन आदतों की लत या आदत लग जाती है वो आजीवन बनी रहती है। अब क्योंकि आज के बच्चे कल के देश का सुनहरा भविष्य हैं तो बच्चों को आज अच्छी शिक्षा देने का अर्थ यह है कि कल के देश के सुनहरे भविष्य का निर्माण करना है और इस कार्य में प्राथमिक स्कूल के शिक्षक निरंतर सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। इस संबंध में राष्ट्रपिता गाँधीजी ने स्पष्ट शब्दों में अपना विचार व्यक्त किया है कि कच्चे घड़े को सही आकार प्रदान किया जा सकता है, एक बार यदि घड़ा पक्का हो गया तब उसके आकार को नहीं बदला जा सकता है।


आगे चर्चा करें तो इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्राथमिक स्कूल के बाद माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल भी छात्र-छात्राओं के व्यक्तित्व व चरित्र निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं और जब हम किसी स्कूल की बात करते हैं तो वास्तव में उस स्कूल में कार्यरत विभिन्न विषयों के शिक्षक ही उस स्कूल में पढने वाले सभी छात्र-छात्राओं को अर्थपूर्ण शिक्षा प्रदान करते है। दरअसल माध्यमिक और उच्चमाध्यमिक स्तर का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है, इस अवस्था में छात्र-छात्राओं का जोश व उमंग सातवें आसमान पर होता है। ऐसे में अनुशासन के महत्त्व को सीखना बहुत आवश्यक हो जाता है क्योंकि यही वह पड़ाव होता है जहाँ से छात्र-छात्राओं के पथभ्रष्ट होने की अधिक संभावनाएँ रहती है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राथमिक शिक्षकों की तरह माध्यमिक व उच्चमाध्यमिक स्तर के शिक्षकों की भी जिम्मेदारी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है।


एक कदम और आगे बढ़ने पर जब अच्छी शिक्षा देने की बात आती है तो विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले सभी शिक्षक इसके प्रणेता नजर आते हैं और सभी के उत्तरदायित्व उतने ही महत्त्वपूर्ण और आवश्यक होते हैं। शिक्षा, शिक्षक और शिष्य के आत्मीय और निकटतम सम्बन्ध की श्रृंखला व कड़ी को कभी तोड़ा नहीं जा सकता है। इसी श्रृंखला की मजबूती हमारे समाज और राष्ट्र को सुदृढ़, सशक्त और उन्नत बनाता है।


आज भले ही आधुनिक युग में शिक्षा का स्वरुप दिन प्रति दिन बदलता जा रहा है और दूरस्थ शिक्षा प्रणाली जैसे इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, यशवंतराव चव्हाण मुक्त विश्वविद्यालय, आइडल, ऑनलाइन शिक्षा के साथ-साथ इंटरनेट पर अत्यधिक शिक्षण वेब पोर्टल होने के बावजूद भी “क्लासरूम शिक्षा और शिक्षक का महत्व” सर्वोच्च मुकाम पर है। आज के परिवेश में अर्थात कोरोना काल में तो धड़ल्ले से ऑनलाइन शिक्षा को चलन में लाया गया और विविध संसाधनों के प्रयोग से शिक्षा के कार्य को सुचारू रूप से चलाने का दावा किया गया। पर फिर भी प्रात्यक्षिक अर्थात क्लासरूम शिक्षा व शिक्षक के योगदान की कमी स्पष्ट रूप से झलक रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि छात्र-छात्राओं के चरित्र-निर्माण व व्यक्तित्व विकास के लिए कर्तव्यपरायण शिक्षकों की आवश्यकता थी, आज भी है और भविष्य में भी उतना ही महत्त्व रहेगा। लोग भले ही कुछ कहें पर शिक्षक के व्यवसाय का महत्त्व कभी कम नहीं होगा… बल्कि स्वरूप व परिस्थितियों के बदलने के साथ जिम्मेदारियाँ और अधिक बढ़ सकती हैं, जैसे कि कोरोना काल के परिपेक्ष्य में ऑनलाइन शिक्षा। अतः शिक्षकों को इस तरह के अनअपेक्षित चुनौतियों के लिए सदैव तैयार रहना होगा और डटकर अपनी भूमिका को निभाना होगा।

➖अशोक सिंह 'अक्स'

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