हनुमान चालीसा (तात्विक अनुशीलन) भाग ५८

18 नवम्बर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (447 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा (तात्विक अनुशीलन) भाग ५८

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *अट्ठावनवाँ - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


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*सत्तावनवें भाग* में आपने पढ़ा :--


*जय जय जय हनुमान गोसाई !*

*कृपा करहुं गुरुदेव की नांईं !!*


*के अंतर्गत*


*जय जय जय हनुमान गोसाईं*

*×××××××××××××××××××*


अब आगे :---


*जय जय जय हनुमान गोसाई !*

*कृपा करहुँ गुरुदेव की नाई !!*


के अंतर्गत :---


*कृपा करहुँ गुरुदेव की नाई*

*×××××××××××××××××*


*कृपा करहुँ*

*×××××××*


*गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज* कहते हैं *हे हनुमान जी* आप हम पर *कृपा* करो ! *कृपा* के प्रकार की होती है किस प्रकार की *कृपा* की कामना *तुलसीदास जी* कर रहे हैं आगे लिखते हुए स्पष्ट करते हैं कि *गुरुदेव की तरह* अर्थात जैसी *कृपा गुरुजी करते हैं* वैसी ही *कृपा* आप मुझ पर कीजिए क्योंकि भवसागर से पार उतार देने की *कृपा गुरु* ही कर सकते हैं | *गुरु* के अतिरिक्त और कौन है जो ऐसी *कृपा* कर सके | माता-पिता जन्म देंगे , स्नेह देंगे तो पोषण करेंगे , पितरों के रूप में *कृपा* करेंगे तो वंश वृद्धि कर देंगे | भगवान बिना *गुरु* के *कृपा* करता नहीं एवं करता तो वो बंधन में डालता ही क्यों ? देवता तो स्वयं बेचारे कर्माधीन हैं वे देंगे तो अपने क्षेत्र का सुख दे देंगे , समृद्धि दे देंगे | *गुरुजी* इन सब से विरक्त तो कर सकते हैं पर भवबन्धन से भी मुक्त होने का मार्ग दिखा देंगे |


➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖


*गुरुदेव*

*×××××*


*गुरु* और *देव* दोनों शब्द यहां दिए गए हैं | जिसके भाव कुछ इस प्रकार कहे जा सकते हैं :--

*गुरु* की दिव्यता के लिए *देव* का विशेषण *तुलसीदास जी महाराज* ने दिया है |

*गुरु* शब्द के साथ सम्मान सूचक शब्द *देव* देकर अपने *गुरु* के प्रति शिष्टाचार की भावना प्रकट की गई है | *गुरु* शब्द के अन्य अर्थ भी होते हैं यथा :- भारी , गरिष्ठ आदि | अतः निश्चित दिव्य भावार्थ को प्रकट करने के लिए *देव* शब्द के साथ कहा गया | *गुरु* का देह सान्निध्य जहां लौकिक है वही *कृपा* प्रभाव की अलौकिकता दैविक , शक्तिवत् है अतः दोनों को दोनों शब्दों से स्पष्ट कर दिया गया है | देवताओं में आप *गुरु* अर्थात महान देव है , कोई अन्य देवता आपकी समता नहीं कर सकता अतः है , आप *गुरुदेव महादेव* हैं | देवता का क्षेत्र सीमित होता है परंतु महादेव विभु हैं , महादेव आशुतोष है | ये सभी भाव *गुरुदेव* शब्द के लेखन में आ गए |


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*गुरुदेव की नाई*

*××××××××××*


*हनुमान चालीसा* के प्रथम दोहे में *श्री गुरु चरण* की व्याख्या करने में हमने एक बात कही थी कि *गुरु* मनुष्येतर प्राणी नहीं हो सकता | आजकल कुछ साधुओं व उपदेशकों के द्वारा *गुरु* परंपरा की सनातन विधि की उपेक्षा की जाती है या कहा जाता है हमारे तो *गुरु हनुमान जी* हैं | आजकल *गुरु* योग्य तो मिलते नहीं हैं इससे तो अच्छा है कि *हनुमान जी* को ही *गुरु* बना लें | कहने वाले यह भी कहते हैं कि *गोस्वामी तुलसीदास जी* ने भी *हनुमान जी* को अपना *गुरु* माना था प्रमाण देने के लिए :-- *कृपा करहुँ गुरुदेव की नाई* यही चौपाई प्रस्तुत कर देते हैं | यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि *तुलसीदास जी महाराज* ने *हनुमान जी* को *गुरु* नहीं बनाया बल्कि *गुरु* की भांति *कृपा* करने की प्रार्थना की है | अन्यथा *गुरुदेव की नाई* न लिखकर वह यहां यह लिख सकते थे कि *कृपा करहुँ गुरुदेव गोसाई* परंतु यहां *नाईं* शब्द लिख कर के *गुरुदेव* की तरह *कृपा* करने की प्रार्थना की है | पितृवत् व मातृवत् स्नेह करना व पिता माता होना दोनों में बड़ा भेद है | *गोस्वामी जी* के *गुरु* श्रुति परंपरा से *श्री स्वामी नरहरिदास* या *नरहर्यानंद जी* थे | *मानस* के मंगलाचरण में उन्होंने सुंदर ढंग से अपने *गुरु की वंदना* की है और लिख दिया है :---


*वन्दऊँ गुरु पद कंज , कृपासिंधु नर रूप हरि !*

*महामोह तम पुंज , जासु वचन रबि कर निकर !!*

*×××××××××××××××××××××*

यहां पर यदि *नरहर्यानंद जी* का नाम *नर रूप हरि* नहीं माना जाए तो *नर* रूप में *हरि* तो माना ही जाएगा | जिसका अभिप्राय है कि चाहे स्वयं हरि ही हो पर *गुरु* रुप में पधारे हैं | भवसागर से पार होने के लिए *गुरु* की आवश्यकता शास्त्रों ने भी माना है | यहां पर *गुरुदेव* क्यों लिखा है इसके लिए *एक अन्य भाव* भी प्रकट करने का प्रयास कर रहा हूं |


नर रूप में *गुरुदेव* का सानिध्य सुलभ होता है पर दिव्य देवताओं का दुर्लभ | *गुरुदेव* की भांति *हनुमान जी* का भी सानिध्य मुझे मिले ऐसी कामना की गई है |

माता जैसे वात्सल्य प्रधान होती है , पिता स्नेह प्रधान होता है वैसे ही *गुरु* हित प्रधान होता है | मेरा हित किसमें है यह मैं नहीं जानता आप *(हनुमान जी)* मेरे हित की रक्षा करते हुए *गुरुवत्* कृपा करते रहे |

देवता केवल प्रसन्न होकर वरदान देते हैं पर हित अनहित का दायित्व उनका नहीं होता और ना ही विचार करते हैं | पर *गुरु* ऐसा नहीं कर सकते यदि ऐसा करें तो धर्म नष्ट हो जाता है | *तुलसीदास जी महाराज* ने *गुरुदेव* की भाँति कहकर *गुरु व देव* से प्रार्थना की कि दोनों ओर से वरदान की रक्षा करते रहिए जिससे मनोरथ भी पूर्ण हो वह हमारा हित भी होता रहे `


*हनुमान जी* को *गुरुदेव की नाईं* लिखा इसके *एक अन्य भाव* पर भी दृष्टि डाला जाय


भगवान से जो मिला दे वही *गुरु* होता है और *हनुमान जी* राम जी से मिलाने में समर्थ है इसलिए *गुरुदेव* लिख दिया |

शंकर भगवान को *जगद्गुरु* कहा जाता है और *हनुमान जी* उन्हीं के अवतार हैं इसलिए *तुलसीदास जी* महाराज ने *गुरुदेव* लिखकर संकेत कर दिया है कि आप कौन हैं ? उसी प्रकार आप आशुतोष बने रहिए |

इस प्रकार कहां तक गिनायें ? कितने ही दिव्य भाव इस चौपाई के कथन में निहित है जिनका वर्णन कर पाना हम जैसे तुच्छ मनुष्यों के लिए संभव नहीं है |


*शेष अगले भाग में :---*



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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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अगला लेख: हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ६४



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