हनुमान चालीसा (तात्विक अनुशीलन) भाग ५९

18 नवम्बर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (422 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा (तात्विक अनुशीलन) भाग ५९

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *उनसठवाँ - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖


*अट्ठावनवें भाग* में आपने पढ़ा :--


*जय जय जय हनुमान गोसाई !*

*कृपा करहुं गुरुदेव की नांईं !!*

*××××××××××××××××××*


अब आगे :-----


*यह सत बार पाठ कर जोई !*

*छूटै बंदि महा सुख होई !!*

*××××××××××××××××××*


*यह*

*×××*


*यह* शब्द किस को इंगित करता है ?? इसमें दो बातें हैं एक तो अभी-अभी जिसका कथन किया गया है दूसरे जिसका वर्णन किया जा रहा है , व पूर्ण करेंगे | प्रथम में भी दो पक्ष हुए एक तो प्रारंभ से लेकर अब तक का सारा पाठ *(श्री गुरु चरण सरोज से लेकर गुरुदेव की नाईं तक)* व दूसरा केवल एक ही चौपाई जो पूर्व की है अर्थात :--


*××××××××××××××××××××*

*जय जय जय हनुमान गोसाई !*

*कृपा करहुँ गुरुदेव की नाईं !!*

*×××××××××××××××××××*


दूसरे में पूरा *हनुमान चालीसा* का पाठ करने का संकेत है जो कि कहा जा रहा है | अभी *चालीसा* की दो चौपाईयाँ शेष है इसके बाद एक बार पुनः कहा है :-- *जो यह पढ़े हनुमान चालीसा* यहां *चालीसा* शब्द नहीं कहकर *यह पाठ* मात्र कहा गया है | *यह* शब्द दोनों चौपाइयों में समान रूप से आया है परंतु वहां स्तोत्र का नाम कह दिया गया है और यहां *यह* शब्द का गुप्त अर्थ *गोस्वामी तुलसीदास जी* ने रख लिया है | दोनों ही पाठ ( पूरे स्तोत्र व पूर्व कथित चौपाई मात्र का ) फलदायक है |


➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖


*सत बार*

*××××××*


*यह* में जो भी पाठ अभिप्रेत हो उसकी आवृत्तियाँ कितनी की जाय इस संबंध में *गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज* निर्देश देते हैं कि *सत बार* अर्थात *सात बार* या *शत* के तत्सम रूप में *सत* मानकर *सौ* पाठ किया जाय | कुछ भक्तों का कथन है कि सामान्य कार्य हो तो *सात पाठ* व जटिल या कठिन कार्य हो तो *सौ पाठ* करना चाहिए | कुछ का कथन है कि जब तक कार्य सिद्ध ना हो जाय नित्य *सात या सौ* पाठ करने चाहिए | *सत बार* के विषय में अनेक विद्वानों के भाव देखने को मिलते हैं कुछ लोगों का कथन है एक बार में एक ही पाठ हो यह आवश्यक नहीं है एक बार में *सौ पाठ* हो तो *सात बार* पाठ अर्थात *सात सै पाठ* करने से कथित फल की प्राप्ति होती है | नित्य *सात पाठ* व अनुष्ठान के लिए *सौ पाठ* करना चाहिए |


*इस विषय में मेरा भाव है कि*


*गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज* ने *सत बार* कह कर काल की उपयोगिता व *जोई* कहकर पात्र की योग्यता को व्याप्त कर दिया है | कोई *हनुमान जी* का पाठ होने से मंगलवार को या शनिवार को ही करना चाहते हैं | परंतु यहां आतुर काल की मर्यादा में सभी दिन पाठ के लिए उपयोगी सिद्ध करने के लिए *सत वार* कहा गया है | क्योंकि *वार अर्थात दिन* सात ही होते हैं | किसी भी *वार* (दिन) में यह पाठ किया जा सकता है | अतएव यह *सत बार पाठ कर जोई* कहकर बताने का प्रयास किया गया है कि इस स्तोत्र का पाठ केवल मंगलवार को ही नहीं अपितु किसी भी *वार* से किया जा सकता है *वार सात ही होते हैं* व शनिवार का अभिप्राय *सातों वारों* में अर्थात नित्य पाठ करें यह भाव हो सकता है | *जोई* का अभिप्राय है कि कोई भी व्यक्ति हो उसमें किसी भी प्रकार का कोई वर्ग प्रतिबंध नहीं है अर्थात जिसकी श्रद्धा वह सभी *सातों वारों* में कभी भी *हनुमान जी* का पाठ *हनुमान चालीसा* के माध्यम से कर सकते हैं |


➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖


*छूटै बंदि महा सुख होई*

*××××××××××××××××*


*गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज* फल श्रुति अर्थात पाठ करने का रोचक फल बताते हुए कह रहे हैं कि इससे बंदी व्यक्ति छूट जाता है | मेरे विचार से दैवाधीन अधर्म युक्त किसी भी प्रकार के बंधन में फंसा व्यक्ति *हनुमान चालीसा* का पाठ करने से छूट जाता है | *महा* शब्द मध्य में लिखकर *सुख व बन्धन* दोनों शब्दों का विशेषण बना दिया गया है , जिसका अभिप्राय है कि *बंधन* कितना भी महान हो *छूट* जाता है व अल्प सुख नहीं सुख भी महान अतिशय प्राप्त होता है | उपरोक्त विधि से पाठ करने पर केवल *बंधन छूटना* ही फल होता तो कोई नित्य पाठ क्यों करें ? जब कोई *बंधन* पड़े तभी पाठ करने का फल प्राप्त कर के *बंधन* से मुक्त हो जाय | यहां इसलिए कहा गया है कि *बंधन है तो छूट जाएगा* व *बंधन नहीं है* तो सुख की महत्ता सीमा काल आदि की वृद्धि हो सुख भी महान हो जाएगा | यद्यपि माया से बड़ा कोई *बंधन* मनुष्य के लिए नहीं होता | अविद्यादि क्लेशों से मुक्त हो भगवान राम की प्राप्त से बढ़कर सुख इस संसार में कोई दूसरा नहीं है | इन दोनों की चर्चा हम पूर्व में कर चुके हैं *हनुमानजी*

*विद्यावान गुनी अति चातुर* है अत: अविद्या या तज्जनित *बंधन* इनके पाठ करने से कैसे रह सकते हैं ? क्योंकि *हनुमान चालीसा* का पाठ करने से *हरहुँ कलेश विकार* के अनुसार अनेक प्रकार की कष्ट / क्लेशों से छुटकारा पाकर जीव

*××××××××××××××××××*

*अंत काल रघुबर पुर जाई !*

*जहां जन्म हरिभक्त कहाई !!*

*××××××××××××××××××*

का फल प्राप्त कर लेता है और यह फल तभी प्राप्त हो सकता है जब मनुष्य *माया जनित बंधनों* से छुटकारा पा करके महान सुख को प्राप्त कर लेता है |


*शेष अगले भाग में :---*



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आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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अगला लेख: हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ६४



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