गिरनार की चढ़ाई (संस्मरण)

23 नवम्बर 2020   |  अशोक सिंह 'अक्स'   (439 बार पढ़ा जा चुका है)

गिरनार की चढ़ाई (संस्मरण)


समय-समय की बात होती है। कभी हम भी गिरनार की चढ़ाई को साधारण समझते थे पर आज तो सोच के ही पसीना छूटने लगता है। आज से आठ वर्ष पूर्व एक विशेष राष्ट्रीय एकता शिविर (Special NIC Camp) में महाराष्ट्र डायरेक्टरेट का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। पूरे बारह दिन का शिविर था। मेरे साथ दस SD कैडेट्स और सात SW कैडेट्स ने हिस्सा लिया था। जनवरी का महीना था, हल्का गुलाबी ठंड पड़ रही थी। वैसे वहाँ पर भी ठंडी में भी तापमान लगभग 17℃ ही था। इसलिए कुछ विशेष परेशानी नहीं हुई। इस तरह के शिविरों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों व दार्शनिक स्थलों के भ्रमण पर ही विशेष जोर दिया जाता है। तीसरे दिन से ही प्रतियोगिताएँ शुरू हो गई थी। पूरे भारत से कुल सत्रह डायरेक्टरेट ने हिस्सा लिया था।

हमारा बेस कैम्प जूनागढ़ में था। इसके आस-पास के इलाके हमने भ्रमण के लिए शामिल किए थे। जिसमें सोमनाथ मंदिर, द्वारिकापुरी, जूनागढ़ किला, गिरनार की ट्रेकिंग और गिरि सफारी मुख्य रूप से शामिल था।

वैसे तो ऐसे शिविर मजेदार होते हैं और यादगार बन जाते हैं। गिरनार की चढ़ाई के एकदिन पहले डिनर के समय मेस में केरला की जीसीआई ने कहा, 'एके सर, यदि आप गिरनार की चढ़ाई चढ़ गए तो मेरी तरफ से आपको मुँहमाँगा ईनाम....'

इतना सुनते ही सभी लोग हाँ में हाँ मिलाने लगे कि हो जाए। मैं भी अख्खड़ राजपूत, पीछे कहाँ हटने वाला। वो भी किसी हिरनी की चुनौती सिंह को स्वीकार न हो..। उत्साह वैसे ही जबरदस्त था क्योंकि बसंती ने चुनौती दिया था। वैसे भी मेरी और उसकी जमती थी। अक्सर हमारे प्रैक्टिस भी साथ हुआ करते थे। उनके यहाँ के एक अधेड़ मेजर भी थे। वो अधेड़ था अर्थात पचास पार, कहने लगे, 'सिंह सर मैं आपका साथ दूँगा।'

बाद में पूछने पर पता चला कि बसंती उनको भाव नहीं देती, इसलिए थोड़े से खफ़ा हैं जनाब।

दूसरे दिन हम सभी तैयार होकर हल्का नाश्ता किए और रवाना हो गए। मेरी पैदल चलने की आदत से यहाँ फायदा हुआ। सीढ़ियों की ऊँचाई अधिक होने के कारण थोड़ी सी परेशानी हो रही थी। पाँच हजार सीढ़ी चढ़ने के बाद केरला वाले मेजर साहब तो साथ छोड़ दिए अर्थात जवाब दे दिए और वहीं देरासर में बैठ गए। मैं अपने सत्रह कैडेट व गुजरात डायरेक्टरेट के दस कैडेट के साथ धीरे-धीरे दस हजार सीढियों को कैसे पार कर गया... मुझे पता ही नहीं चला। लेकिन मुकाम तक पहुँचने में मुझे लगभग साढ़े तीन घंटे का समय लग गया था। बहुत से कैडेट्स ढाई से तीन घंटे में ही ऊपर पहुँच गए थे। वहाँ पर लगभग तीस साल से सेवारत महंत जी विराजमान थे, उनसे मिलकर बेहद खुशी हुई। परिचय होने पर पता चला कि वे ब्राह्मण नहीं हैं बल्कि कछवां के यदुवंशी हैं। पर अब पूरी तरह से जूनागढ़ और गिरनार के होकर रह गए थे। दरअसल सात हजार सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद शायद मैं रुक जाता पर कैडेट्स का सहयोग और बसंती की चुनौती ने मुझे हमेशा एक कदम आगे बढ़ाते रहने को उत्साहित किया, जिसकी बदौलत किला फतह करने में सफलता मिली। ऊपर पहुँचने के बाद तो लोग थके-माँदे दिखाई दे रहे थे पर मेरा उत्साह तो सातवें आसमान पर था। आप भी समझ सकते हैं कि जहाँ चुनौती हो... तो बात कुछ और ही होती है। दूसरी तरफ ये भी भावना मन में थी कि चुनौती पूरा न होनें पर साथी मेस में अवश्य उपहास करेंगे। चोटी पर पहुँचने के बाद इसी बात की खुशी थी कि अब मजाक का पात्र नहीं बनूगा।

दोपहर दो बजे के बाद उतरने का उपक्रम शुरू हुआ। रवानगी के समय महंत जी ने एक सोटी (लाठी) दिया और बोले, 'कैप्टन साहब, उतरने में आपकी मदद करेगी।'

सच में उतरते समय मुझे आभास हुआ कि लाठी से काफी सहायता मिल रही थी। बहुत से लोंगों के पैर थरथरा रहे थे। नीचे अम्बाजी के पास बसंती भी मिली, थकी-मांदी, हताश, चेहरे पर बारह बजा हुआ था। वो प्यासी भी थी। उसे नींबू पानी पिलाया।

बोलने लगी, 'मुझे यकीन नहीं हो रहा है। क्या! आपने सच में... पूरा कर लिया।'

सभी के लिए हैरानी का विषय था क्योंकि मेरा वजन निन्यानबे किलो था। पर हो गया।

"हाथ कंगन आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या...।" जीता जागता प्रमाण सामने था। गवाही में तो पूरी जमात खड़ी थी।

अनायास मेरे मुँह से निकल गया - 'घबराइए मत, मेरी फरमाइश से आपको शर्मिंदगी महसूस नहीं होगी।' कोई ऊंट-पटांग फरमाइश नहीं होगी।

उसका चेहरा खिल उठा, एक अलग तरह की चमक दिखाई दी। आँखे जैसे कृतज्ञता ज्ञापित कर रही हों। ऐसी अदा जैसे पूरी तरह से समर्पित हो। मुझे भी ऐसा एहसास हो रहा था जैसे वो जिंदगी में पहली बार शरमा रही हो। शाम को पाँच बजे तक सभी लोग नीचे आ गए थे। वहाँ पर सभी के लिए नींबू-पानी की व्यवस्था की गई थी। कुछ लोंगों को ग्लूकोज़ भी दिया जा रहा था। कुछ तो लंगड़ा कर चल रहे थे, उनकी जांघे छिल गई थी। कांछ लग गई थी। थोड़ी सी समस्या केरला वाले मेजर साहब के साथ हो गई थी। वे उतर नहीं पा रहे थे तो उनके लिए डोली की व्यवस्था की गई। तीन हजार रुपए डोली वाले को दिया गया तब कहीं जाकर मेजर साहब नीचे उतरे और कैम्प खत्म होने तक चलने की हालत में नहीं थे।

बसंती को मेजर साहब का उड़ाने का मौका मिल गया था। रह रहकर चुटकी ली ही लेती थी।

डिनर के समय मेस में आधे से कम लोग ही थे। सभी रोबोटिक चाल चल रहे थे। हमारी व्यवस्था सूबेदार मेजर साहब ने कर दी थी सो थकान महसूस नहीं हुई। बड़े आराम से रात कटी। दूसरे दिन सुबह नाश्ते पर मेस में ही सभी से मुलाकात हुई। सभी उकसाने लगे, सिंह सर की तो चाँदी ही चाँदी है... माँगो जो माँगना है। लोंगों ने क्या-क्या कल्पनायें की थी। पर सब पर पानी फिर गया। पर हुआ कुछ ऐसा जिसके बारे में कोई सोचा नहीं था और न तो किसी को भनक थी।

मेरे मुँह से निकला,'शर्त पूरा करने के लिए बसंती को डांस करना होगा। मैं जानता हूँ बसंती बहुत अच्छा डांस करती है।'

सभी हैरान।

मैंने कहा, 'हाँ, बिल्कुल सही सुना आपलोंगों ने। दरअसल कैडेट्स के रिहर्सल के दौरान मैंने बसंती को डांस करते देखा था।'

रही सही कसर मेजर ने पूरी कर दी थी, पहली बार उन्होंने ही बताया था कि बसंती एक अच्छी डांसर है।

बहुत ही अच्छी डांसर रह चुकी थी। बहुत पहले उसने डांस का कोर्स भी किया था।

सहमति बन गई। बसंती ने भी शरमाते हुए हाँ में हामी भर दी। हालांकि उसने अकेले में कई बार पूछा, 'आपको किसने बताया कि मैं डांस जानती हूँ।'

इस बात को अंत तक मैंने रहस्य ही रहने दिया और हर बार एक ही जवाब रहता कि मैंने रिहर्सल के दौरान देखा था।

डिनर के बाद हम सभी लोग रिहर्सल स्पॉट रंगमंच पर पहुँच गए। उसके बाद बसंती ने जो धमाकेदार डांस किया देखकर सभी दंग रह गए। गजब के लटके झटके और अदाकारी के साथ प्रस्तुति। सभी ने वाह-वाह किया।

पर बसंती ने पास आकर कहा, 'आपने तो मेरी जान ही निकाल ली। हाय मार डाला।'

सच ही कहा उसने, गिरनार की चढ़ाई के दो ही दिन के बाद ऐसा प्रदर्शन, लाज़वाब था। जहाँ एक तरफ लोग तीन-चार दिन तक टेढ़े होकर चल रहे थे वहीं बसंती ने जादू सा कर दिया और सब के चेहरे खिल गए।

दस दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।

खैर इस दौरान हमनें ज्योतिर्लिंग सोमनाथ और तीर्थधाम द्वारकाधीश के अलौकिक दर्शन प्राप्त किए। हालांकि हमारे एक साथी हिमाचल प्रदेश के थे, द्वारिकधाम में किसी पंडा के चँगुल में फँस गये थे और उन्हें दस हजार का चूना लग गया था। जब तक मामला मेरे पास तक आया तबतक देर हो चुकी थी, कहने का मतलब ये कि हमारे पास भी समय की पाबंदी थी और वो कौन सा पंडा था उसको ढूँढने में समय लगता। सो उस प्रकरण को अनसुलझा ही छोड़ दिए। हुआ यूँ कि जब हम बाहर आकर गाड़ी में बैठकर भेंट द्वारका के लिए रवाना हुए तब उस घटना के बारे में बताया गया। इसलिए आपसी सहमति बनी कि लौटकर जाना बेवकूफी होगी।

भले ही सब अलग-अलग प्रांत से आते हैं पर दस-बारह दिन में ही ऐसी जुगलबंदी हो जाती है कि बिछुड़ते समय आँखों में आँसू भर आना और सिसकना तो आम बात हो जाती है। हम सब कितने जल्दी एक दूसरे के साथ घुलमिल जाते हैं, एक दूसरे के विश्वास को जीत लेते हैं, एक दूसरे के बन जाते हैं।

काशः! ऐसा ही व्यावहारिक जिंदगी में हो और हमसब अपने आस-पास अड़ोस-पड़ोस में भी इसी तरह का लगाव व विश्वास बनाए रखें तो सारे गिले शिकवे मिट जाए।

जिंदगी में कुछ ऐसे पल और लम्हें होते हैं जो बहुत ही छोटे होते हैं पर अविस्मरणीय और यादगार बन जाते हैं। उसके कुछ छाप हमारे मानस पटल पर आजीवन के लिए अंकित हो जाते हैं, ये बात और है कि समय के थपेड़ों के साथ धूमिल अवश्य होते जाते हैं। वैसे ही ये विशेष शिविर भी दो वजह से यादगार बन गई, एक तो बसंती की डांस और दूसरी तरफ लौटने का आरक्षण न हो पाने के कारण जो सफर के दौरान उत्पन्न अनुभव किसी त्रासदी से कम नहीं थी, इसने इसे अविस्मरणीय बना दिया।

➖ अशोक सिंह 'अक्स'

#अक्स

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