हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ६५

24 नवम्बर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (423 बार पढ़ा जा चुका है)

हनुमान चालीसा !! तात्विक अनुशीलन !! भाग ६५

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‼️ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼️


🟣 *श्री हनुमान चालीसा* 🟣

*!! तात्त्विक अनुशीलन !!*


🩸 *विश्राम - भाग* 🩸


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*गतांक से आगे :--*


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*चौंसठवें भाग* में आपने पढ़ा :--


*पवन तनय संकट हरण मंगल मूरति रुप !*

*राम लखन सीता सहित हृदय बसहुँ सुरभूप !!*

*×××××××××××××××××××××××××××××*


के अन्तर्गत :-


*राम लखन सीता सहित , हृदयँ बसहुँ*

*×××××××××××××××××××××××××*

अब आगे :--


*सुरभूप*

*×××××*



*सुरभूप* का सन्धि विच्छेद किया जाय तो :- *सुर = देव* तथा *भूप = राजा* अर्थात देवताओं के राजा देवों में श्रेष्ठ देवराज इत्यादि |


*सामान्य भाव है !*


*यह विशेषण भगवान श्रीराम के लिए है या हनुमान जी के लिए इस पर विचार करना आवश्यक है |*


*इस स्तोत्र का नाम *श्री हनुमान चालीसा* है और इसके मुख्य देवता *हनुमानजी* हैं इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि *सुरभूप* का शब्द *हनुमान जी* के लिए ही है | परंतु काव्य में अन्वय से *रामजी* के लिए भी लग सकता है | पर प्रश्न है कि

*हनुमानजी देवराज कैसे हैं !*

*रामजी* के लिए *सुरभूप* कहा गया है तो *रामजी* भी *सुरभूप* होते हुए भी *नरभूप* ही के अवतार हैं | इसलिए इस पर विचार करना परम आवश्यक है | यदि *भगवान श्री राम* के लिए *सुरभूप* माना जाय तो विचार करना होगा |


*श्री राम के सुरभूप पर विचार*


*भगवान* देवताओं के रक्षक व पालक है | इस भाव से हुए *सुरभूप* हुए | देवराज या *सुरभूप* इंद्र को कहा जाता है | *भगवान* इंद्र की रक्षा के लिए एक बार यह पद संभाल चुके हैं इसी से भगवान को *उपेन्द्र* भी कहा जाता है *उपेन्द्र* होने से भी *श्री राम भगवान* को *सुरभूप* कहा जा सकता है | देवताओं की भूमि अर्थात स्वर्ग का पालन करने वाले देवताओं की रक्षा के लिए अवतार लेने के कारण भी *भगवान श्रीराम* को *सुरभूप* कहा जा सकता है |


*हनुमान जी के लिए सुरभूप पर विचार कर लिया जाय*


*भूप* को श्रेष्ठता के भाव में लिया जाने पर *हनुमान जी महादेव है*

*पवन तनय* कहकर *सुरभूप* कहा कि देवताओं के पुत्र देवता हुए व अन्य सभी देवताओं ने *रावण* के समक्ष समर्पण कर दिया उस समय भी *रावण* एकमात्र *हनुमान जी* से भय का खाता था | जैसा कि *मानस* में वर्णन है |

*××××××××××××××××××××*

*है कपि एक महा बलशीला !*

*×××××××××××××××××××*

*रावण* का पुत्र *इंद्रजीत* ( मेघनाद ) ने यद्यपि नाम के अनुसार देवताओं के राजा इंद्र को जीत लिया था किंतु *हनुमान जी* देवताओं के प्रतिनिधित्व में ही युद्ध कर रहे थे पर *मेघनाद* भय के मारे उनके निकट नहीं आता था | यथा :---

*××××××××××××××××××*

*बार-बार पचार हनुमाना !*

*निकट न आव मरम सो जाना !!*

*××××××××××××××××××××*

इस प्रकार देवताओं में श्रेष्ठ *हनुमान जी* को लिखा गया


*भू = भूमि !*

*प = पालन करने वाले !*

*सुरभू = देवताओं की भूमि का !*

*प = पालन करने वाले !*


देवताओं की भूमि स्वर्ग स्थल नहीं बल्कि वे दैवी संपद् गुण जिस पर देवत्व टिका रहता है अर्थात *सतोगुण* | रावण के शासनकाल में देवता व्याकुलता बस अपने मूल गुणों से अथवा दैवी संपद भूमिका से विचलित हो गए थे | *रजोगुण* युक्त अस्थिरता द्वन्द व भय इन में व्याप्त हो गया था | इनकी यह स्थिति कई अवसरों पर दिख चुकी थी |


*उदाहरण स्वरूप :--*


*रामजी* के राज्याभिषेक के समय भगवती सरस्वती से प्रार्थना करके उसमें विघ्न उपस्थित करना |

*भरत मिलाप* के समय कभी *भरत* को सेवा से प्रसन्नता का प्रयत्न तो कभी उसकी भी बुद्धि में माया जन्य मोह करवाने का प्रयत्न |

अंत में *अवधवासियों* के मन में उच्चाटन पैदा कर देना |

*युद्ध लीला* में भी थोड़ा भी रावण का पलड़ा भारी देखकर भयभीत हो जाना व उल्टी-सीधी प्रतिक्रियाएं कर अपनी अधीरता का परिचय देना तथा *राम जी* की सर्व सामर्थ्यता पर से भी विश्वास डगमगाते रहना |

ऐसे समय पर जब *सुरभू* अर्थात देवत्व गुण डगमगा जाए तो उसकी रक्षा - पालन - पुष्टि करना *सुरभूपत्व* ही तो है | इसलिए *हनुमान जी* को *सुरभूप* कहा गया है |


देवताओं का पालन पोषण यज्ञ आहुति देने से होता है | अग्नि *पवन तनय* (वायेरग्नि ) ही तो है | *रावण* ने भी देवताओं को क्षीण बल करने के लिए अपनों अनुचरों से देवयज्ञों में बाधा डालने का आदेश दिया था ! *पवन तनय* के साथ *सुरभूप* कहना *तुलसीदास जी* को उचित लगा |


जीवात्मा का विषयों में संयोग होने में चार पदार्थ होते हैं | विषय , विषय करण अर्थात इंद्रियाँ , सुर व जीव स्वयं | विषय भोगवव जीव भोक्ता है पर साधन रूप इंद्रियां व देवता ही हैं | परस्पर एक दूसरे से इनकी स्थिति या जागृत होती है | यथा :--

*×××××××××××××××××××*

*विषय करण सुर जीव समेता !*

*सकल एक ते एक सचेता !!*

*×××××××××××××××××××*

इनमें जीवात्मा के भोक्ता स्वरूप में साधन के रूप में करण (विषयकरण अर्थात इन्द्रियों) के स्वामी तो *हनुमान जी* को पूर्व में कह चुके हैं | यथा :--

*×××××××××××××××××××*

*जय जय जय हनुमान गोसाई !*

*×××××××××××××××××××*

गोसाँईं (गो = इन्द्रियाँ , साँईं = स्वामी) अब *सुर = देवताओं के स्वामी* अर्थात *सुरभूप* कहकर *हनुमान जी* का व्याप्त वैभव कहा गया है |


*लेखक की ओर से:----*



*इस प्रकार भगवान व भक्त के गुणानुवाद के साथ स्तुति की विधा तथा आदर्श जीवन ध्येय को गोस्वामी जी ने इस सिद्ध स्तोत्र के ब्याज से समझाने का प्रयत्न किया | और हमने भी इस दिव्य हनुमान चालीसा के तात्विक अनुशीलन में प्रत्येक शब्द की व्याख्या करने का सूक्षम प्रयास करके अपने जीवन को धन्य किया , साथ ही अपने पाठकों को भी इसका रसास्वादन कराने का प्रयास किया |*


*इस पूरे हनुमान चालीसा के तात्विक अनुशीलन में यदि कहीं कोई त्रुटि हो गई हो तो उसे विद्वत समाज अवश्य क्षमा करेंगे |*


*जय जय श्री सीताराम !* 🙏🙏

*जय जय श्री हनुमान* 🚩🚩🚩



🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷


आचार्य अर्जुन तिवारी

पुराण प्रवक्ता/यज्ञकर्म विशेषज्ञ

संरक्षक

संकटमोचन हनुमानमंदिर

बड़ागाँव श्रीअयोध्या जी

9935328830


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