एकादशी व्रत निर्णय :- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 नवम्बर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (426 बार पढ़ा जा चुका है)

एकादशी व्रत निर्णय :- आचार्य अर्जुन तिवारी

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*‼️ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼️*


🚩 *एकादशी व्रत निर्णय* 🚩


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*दशम्येकादशी यत्र तत्र नोपवसद्बुध: !*

*अपत्यानि विनश्यन्ति विष्णुलोकं न गच्छति !!*


यह परमावश्यक है कि एकादशी दशमीविद्धा (पूर्वविद्धा) न हो ! हाँ द्वादशीविद्धा (परविद्धा) तो हो ही सकती है क्योंकि नारदपाञ्चरात्र में कहा गया है :- *‘पूर्वविद्धातिथिस्त्यागो वैष्णवस्य हि लक्षणम्’* लेकिन वेध-निर्णय का सिद्धान्त भी सर्वसम्मत नहीं है |


निम्बार्क सम्प्रदाय में स्पर्शवेध प्रमुख है | उनके अनुसार यदि सूर्योदय में एकादशी हो परन्तु पूर्वरात्रि में दशमी यदि आधी रात को अतिक्रमण करे अर्थात् दशमी यदि सूर्योदयोपरान्त ४५ घटी से १ पल भी अधिक हो तो एकादशी त्याग कर महाद्वादशी का व्रत अवश्य करे |


यथा—


*अर्धरात्रमतिक्रम्य दशमी दृश्यते यदि !*

*तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत् !!*


(कूर्मपुराण)


परन्तु *कण्व स्मृति* के अनुसार अरुणोदय के समय दशमी तथा एकादशी का योग हो तो द्वादशी को व्रत कर त्रयोदशी को पारण करना चाहिये |


यथा—


*अरुणोदयवेलायां दशमीसंयुता यदि !*

*तत्रोपोष्या द्वादशी स्यात्त्रयोदश्यां तु पारणम् !!*


यहाँ पुराण और स्मृति के निर्देश में भिन्नता पायी जा रही है अतः शास्त्र-सिद्धान्त से स्मृति-वचन ही बलिष्ठ होता है अतः यही सिद्धान्त बहुमान्य है |


अपने *रामानन्द-सम्प्रदाय* का मत है कि वैष्णवों को वेध रहित एकादशी का व्रत रखना चाहिये | यदि अरुणोदय-काल में एकादशी दशमी से विद्धा हो तो उसे छोड़कर द्वादशी का व्रत करना चाहिये—


*एकादशीत्यादिमहाव्रतानि*

*कुर्याद्विवेधानि हरिप्रियाणि !*

*विद्धा दशम्या यदि साऽरुणोदये*

*स द्वादशीन्तूपवसेद्विहाय ताम् !!*


(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ६७)।


*उदाहरणार्थ :- भाद्रपद शु. ११ रविवार २०७० को उदया तिथि में एकादशी तो है पर पूर्ववर्ती दिन (शनिवार) दशमी की समाप्ति २८:४६ बजे हो रही है जो सूर्योदय (५:५२ बजे) से मात्र १घंटा ६ मि. अर्थात् पौने तीन घटी पहले है अतः अरुणोदय काल (२८:१६ बजे) में यह एकादशी दशमी-विद्धा है | फलतः इसे त्यागकर भाद्रपद शु. १२ सोमवार को पद्मा एकादशी का व्रत विहित है |


*यह वेध भी चार प्रकार का होता है-*


(१) सूर्योदय से पूर्व साढ़े तीन घटी का काल अरुणोदय वेध है

(२) सूर्योदय से पूर्व २ घटी का काल अति-वेध है

(३) सूर्य के आधे उदित हो जाने पर महावेध काल है तथा

(४) सूर्योदय में तुरीय योग होता है।


यथा—


*घटीत्रयंसार्द्धमथारुणोदये*

*वेधोऽतिवेधो द्विघटिस्तुदर्शनात् !* *रविप्रभासस्य तथोदितेऽर्द्धे*

*सूर्येमहावेध इतीर्यते बुधैः !!* *योगस्तुरीयस्तु दिवाकरोदये*

*तेऽर्वाक् सुदोषातिशयार्थबोधकाः !*


(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७१-७२)


सूर्योदयकाल से पूर्व दो मुहुर्त संयुक्त एकादशी शुद्ध है और शेष सभी विद्धा हैं—


*पूर्णेति सूर्योदयकालतः या*

*प्राङ्मुहूर्तद्वयसंयुता च!*

*अन्या च विद्धा परिकीर्तिता बुधै:*

*एकादशी सा त्रिविधाऽपि शुद्धा !!*


(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७३)।


*शुद्धा एकादशी के भी तीन भेद हैं। यथा—*



*एका तु द्वादशी मात्राधिका ज्ञेयोभयाधिक !*

*द्वितीया च तृतीया तु तथैवानुभयाधिका !!*

*तत्राद्या तु परैवास्ति ग्राह्या विष्णुपरायणैः !*

*शुद्धाप्येकादशी हेया परतो द्वादशी यदि !!*

*उपोष्य द्वादशीं शुद्धान्तस्यामेव च पारणम् !*

*उभयोरधिकत्वे तु परोपोष्या विचक्षणैः !!*


(श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर, ७४-७६)


अर्थात्, एक वह जिसमें केवल द्वादशी अधिक हो, दूसरी जिसमें दोनों अधिक हों तथा तीसरी जिसमें दोनों में कोई भी अधिक न हो। (अब इनमें से किसे ग्रहण किया जाय ?

*जगद्गुरु आद्य रामानन्दाचार्य-चरण का आदेश है –)*


*इनमें से वैष्णवों को प्रथम एकादशी अर्थात् द्वादशी मात्र का ग्रहण करना चाहिये, यदि परे द्वादशी की वृद्धि हो तो शुद्ध एकादशी भी छोड़ देनी चाहिये ! विज्ञ-जनों को एकादशीरहित शुद्ध षष्ठीदण्डात्मक द्वादशी में उपवास कर अगले दिन अवशिष्ट द्वादशी में ही पारण भी कर लेना चाहिये | दोनों की अधिकता में पर का उपवास करना चाहिये |*


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*यथा सम्भव प्रयास*


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